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13 अप्रैल, 2021|1:00|IST

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जब दूध को मिली लंबी जिंदगी 

जब दूध को मिली लंबी जिंदगी 
साल-दर-साल दुनिया में हम इंसानों ने एक लंबा सफर तय किया है। हम ऐसे-ऐसे खराब दौर से निकल आए हैं कि आज जिनकी कल्पना भी मुमकिन नहीं। एक वह दौर था, जब चीजों को सहेजकर रखना सबसे मुश्किल था। एक जगह से दूसरी जगह जाते ही या कुछ समय बीतते ही चीजें खराब होने लगती थीं। लोग खाने-पीने की बहुत कम ही चीजों को सही सहेज पाते थे। बाद में जब खाने-पीने की चीजों का व्यापार होने लगा, तब यही समस्या व्यापारियों पर भारी पड़ने लगी। सबसे मुश्किल था, तरल चीजों का व्यापार। पूरा पैसा लगाकर वे कहीं से सामान खरीदते और दूसरी जगह ले जाते ही सामान खराब निकलने लगता था, तनाव और नुकसान का सिलसिला बना रहता था। 
तब यूरोप में राजाओं के बीच भी काफी सामान का आदान-प्रदान होता था, जो चीजें उन्हें बहुत अच्छी लगतीं, उन चीजों को उपहार में देने का उनका शौक था। जब त्योहार आते, तब बड़े पैमाने पर अंगूर के रस या वाइन का आदान-प्रदान होता था। फ्रांस के राजा नेपोलियन तृतीय ने बडे़ पैमाने पर रस की भेंट ब्रिटेन भेजी, बहुत तारीफ के साथ भेजी गई खेप अपनी मंजिल पर खट्टी निकली। ऐसा एकाधिक बार हुआ, तो राजा के सम्मान पर बन आई। राज परिवारों के बीच शिकायत से तनाव का माहौल बन गया। ऐसे में, मजबूर होकर नेपोलियन तृतीय ने देश के एक रसायन वैज्ञानिक को पत्र लिखा कि सुना है, आप इसी दिशा में काम कर रहे हैं। क्या रस या तरल खाद्य पदार्थों को खराब होने से बचाया जा सकता है? अगर बचाव की ऐसी कोई विधि नहीं है, तो आप ईजाद कीजिए।
यह उस युवा वैज्ञानिक के लिए प्रशंसा व महत्व का दुर्लभ क्षण था। जिंदगी में पहली बार किसी राजा का पत्र मिला था और यकीन के साथ एक जिम्मेदारी भी। यह पत्र एक ऐसे युवा वैज्ञानिक को मिला था, जिसे स्कूल के दिनों में मंद बुद्धि तक कहा गया था। पिता ने सबसे महंगे स्कूल में दाखिला कराया, लेकिन बेटे का मन पढ़ने में नहीं लगता था। शिक्षक जो पढ़ाते थे, वह सिर के ऊपर से निकल जाता था। कला में स्नातक करने के बाद समझ में आया कि दिमाग तो विज्ञान की सेवा के लिए बना है, और तब शुरू हुई विज्ञान की पढ़ाई। और आज वह दिन है, जब राजा का पत्र मिला है। फ्रांस में वैज्ञानिक तो और भी हैं, पर राजा की नजर उस पर पड़ी है। वह वैज्ञानिक खुद को धन्य मानते हुए फूले नहीं समा रहा था। 
खत ऐसा था कि दिल में बात बैठ गई, खुद को साबित करने का वक्त आ गया है। विज्ञान को कागजों और सिद्धांतों से बाहर लाकर व्यावहारिक रूप देना है। क्लास रूम व लैब से निकलकर खेतों-कारखानों के काम आना है। राजा की ओर से मिला वह पत्र प्रेरणा की ऐसी खुराक बना कि उस वैज्ञानिक ने अपने आप को आविष्कार में लगा दिया और कामयाबी कदम चूमने लगी। करीब दो साल बाद राजा के यहां से बुलावा आया, जहां अपनी खोज का प्रदर्शन करना था। वहां वह वैज्ञानिक लुइस पाश्चर पूरे साजो-सामान के साथ पहुंचे और देश के दिग्गजों को समझाया कि कैसे चीजें खराब होती हैं और कैसे उन्हें बहुत दिनों तक सहेजकर रखा जा सकता है। चीजों में जीवाणु भी होते हैं, जो बचाने-सहेजने की कोशिश करते हैं और रोगाणु भी पनपते हैं, जो सब कुछ खत्म-खराब करने की कोशिश में लगे रहते हैं। जरूरी नहीं कि कोई चीज खुद खराब हो जाए। किसी चीज का खराब होना रासायनिक प्रक्रिया के बजाय एक जैविक प्रक्रिया का परिणाम है। 
पाश्चर ने दुनिया को बताया कि पूरी स्वच्छता रखते हुए किसी द्रव्य को एक निश्चित सीमा तक गरम किया जाए और फिर ठंडा करके रखा जाए, तो उसमें रोगाणु विकसित होने की आशंका बहुत दिनों के लिए टल जाती है। सूक्ष्म जीव विज्ञान के अनुसार, जरूरी है कि किसी भी द्रव्य के संरक्षण के लिए उसे हवा, खमीर व रोगाणु से बचाया जाए। ध्यान रहे, हवा रोगाणुओं का समूह लिए बहती है। पाश्चर की यह विधि पाश्चुरीकरण कहलाती है। आज पाश्चुरीकरण की सबसे बड़ी मिसाल दुग्ध उद्योग है। पूरी दुनिया में दूध की पैकेजिंग इसी विधि से होती है। दूध को खराब होने से पहले करीब 70 डिग्री तक गरम करके फिर ठंडा किया जाता है और उसके बाद उसकी पैकेजिंग-वितरण का काम आसान हो जाता है। पाश्चर की यह खोज सूक्ष्म जीव विज्ञान की बुनियाद बनी, जिस पर आगे काम करते हुए पाश्चर ने रेबीज जैसी खतरनाक बीमारी का टीका तैयार करके दुनिया को हमेशा के लिए आभारी बना दिया। आज 27 दिसंबर लुइस पाश्चर (1822-1895) की जयंती है। हम जब भी कोई डिब्बा या बोतल या थैली बंद सामान इस्तेमाल करते हैं, तब हमारे पहले आभार पर लुइस पाश्चर का अधिकार है। 
 प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

 

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  • Web Title:Hindustan Meri Kahani Column 27 december 2020