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भारत में फिर बहने लगी दूध की नदी

बहती होगी देश में कभी दूध की नदी, पर राजाओं-शासकों ने उसे अपनी काहिली से धीरे-धीरे सुखा दिया। जब देश आजाद हुआ, तब बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे, जिन्हें चम्मच पर दूध भी नसीब नहीं था। दूध खरीदने...

भारत में फिर बहने लगी दूध की नदी
Amitesh Pandeyवर्गीज कुरियन, दुग्ध क्रांति के जनकSat, 25 Nov 2023 11:01 PM
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बहती होगी देश में कभी दूध की नदी, पर राजाओं-शासकों ने उसे अपनी काहिली से धीरे-धीरे सुखा दिया। जब देश आजाद हुआ, तब बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे, जिन्हें चम्मच पर दूध भी नसीब नहीं था। दूध खरीदने वालों ने दूधियों का और दूधियों ने दुधारू  पशुओं का ऐसे निर्मम शोषण किया कि पूरा दुग्ध तंत्र कराहने लगा। धीरे-धीरे पशुपालकों का मनोबल टूटने लगा था। दूध के साथ समस्या यह भी है, उसे ज्यादा समय पास रख भी नहीं सकते, औने-पौने में जल्दी दूध बेचना मजबूरी थी। 
अंगे्रजों के जमाने में स्थापित एक दुग्ध कंपनी ऐसे भूखे दलालों के भरोसे चलती थी, जो गरीब किसानों से दूध छीनने के साथ ही उनका खून भी खूब पीते थे। शोषण का सिलसिला लंबे समय से चल रहा था और भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों ने किसानों को इस शोषण से बचाने के लिए सहकारिता का रास्ता आजमाना शुरू कर दिया था, पर नेता भी दूध के आगे बेबस हो जाते थे। जरूरी था कोई ऐसा समर्पित योग्य व्यक्ति, जो अपने साफ हाथों से किसानों के दूध को संजो लेता। 
कहा गया है, आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। गुजरात के आनंद में एक केरलवासी इंजीनियर की नियुक्ति हुई। इंजीनियर का काम था डेयरी विकास को बल देना, पर वह जिस दिन आनंद रेलवे स्टेशन पर उतरे थे, लौटने के दिन गिनने लगे थे। छात्रवृत्ति ने फंसा दिया था। दरअसल, इंजीनियर साहब को इसी शर्त पर अमेरिका में इंजीनियरिंग के लिए छात्रवृत्ति मिली थी कि वह लौटकर कम से कम तीन साल सरकारी विभाग में सेवाएं देंगे। खैर, वह इंजीनियर खुद को बंधुआ मजदूर मानकर ही दिन काटने लगे। मन में आया कि तीन साल नौकरी करने के बजाय 30,000 रुपये चुकाकर चल पड़ें। अफसोस, इतने पैसे न थे, तो जल्द मुक्ति एक सपना थी। उन्हें गांव में कोई घर देने को तैयार न था, एक गैराज का जुगाड़ किसी तरह से हुआ। बहरहाल, कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो डूबकर काम करते हैं। इंजीनियर के साथ भी यही हुआ। समस्याओं का अंबार लगा हुआ था। दुग्ध उत्पादकों का खूब शोषण होता था। इसमें भी जो उत्पादक निम्न जाति के थे, उनके दर्द का बयान मुश्किल था। सबसे बड़ी समस्या कि स्थानीय लोग विश्वास ही नहीं करते थे, तो इंजीनियर साहब विश्वास जीतने की कोशिश में लग गए। विश्वास जीतने की कवायद में ही एक ऐसा मोड़ आया, जब एक गरीब दुग्धपालक का बच्चा बीमार पड़ा। वह गरीब भागकर इंजीनियर साहब के पास पहुंचा। डेयरी की पढ़ाई में जरूरी दवाओं के बारे में पढ़ाया तो गया था, पर इंसान का इलाज और वह भी एक छोटे बच्चे का इलाज जोखिम भरा था। जोखिम उठाते हुए इंजीनियर साहब कुछ पल के लिए डॉक्टर बन गए। बच्चे को एक इंजेक्शन दे दिया, जिससे उसका ज्वर सुबह तक उतर गया। यह चर्चा गांव में आग की तरह फैली और विश्वास जम गया। इंजीनियर साहब अब अकेले नहीं थे, गांव के लोगों के जुड़ने का सिलसिला बढ़ता चला गया। सहकारिता की शुरुआत हो गई, गरीबों को अपने दूध का अधिकतम भाव मिलने लगा। पशुओं की चिंता के साथ ही पशु आहार की चिंता का तंत्र खड़ा होने लगा। किसानों और दुग्ध उत्पादकों का खून चूसने वाले मुंह की खाने लगे। गांव-देहात में खुशियों का सूरज उगने लगा।
हालांकि, तब तक इंजीनियर साहब का इरादा यही था कि कुछ दिन डेयरी का काम करके परमाणु भौतिकी के अपने काम में लौट जाना है, पर भला हो तत्कालीन नेता त्रिभुवनदास पटेल का, जो एक तरह से पीछे ही पड़ गए, ‘वर्गीज कुरियन जी, आप यहीं ठहर जाइए। आपके आने से किसानों के जीवन में जो बहार आई है, वह आपके जाने से एकाएक खत्म हो जाएगी? शोषण करने वाले फिर हमला बोल देंगे। गरीबों के लिए जैसे आप लड़ते हैं, वैसे कौन लड़ेगा? आप कहीं जाकर नौकरी ही करेंगे, तो दुग्ध सोसायटी ही आपको नौकरी पर रख लेगी, रुक जाइए।’
जिस दिन वर्गीज कुरियन (1921-2012) ने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिया, उसी दिन दुग्ध सोसायटी ने उन्हें प्रबंधक बनाकर नियुक्त कर लिया और तब शुरू हुई भारत में दुग्ध या श्वेत क्रांति। अमूल एक बेहतरीन ब्रांड बनकर उभरा। सहकारी डेयरी विकास का उनका मॉडल आज भारत भर में 200 बड़ी डेयरियों से एक करोड़ से ज्यादा किसानों को जोड़ता है, जो हर दिन दो करोड़ लीटर दूध देश को देते हैं। 26 नवंबर को जन्मे कुरियन कहते थे कि मैं जीवन भर किसानों का कर्मचारी रहना चाहता हूं। उन्हीं का कमाल है कि भारत दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है और यहां प्रतिव्यक्ति साढ़े चार सौ ग्राम से ज्यादा दूध उपलब्ध है। फिर दूध की नदियां बह रही हैं। उनके जन्मदिन पर भारत हमेशा दुग्ध दिवस मनाएगा और उन्हें याद करेगा। 
     प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय 

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