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8 अप्रैल, 2021|10:24|IST

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जंगल से संसद तक बेमिसाल

आप देखते रह जाते हैं और किस्मत अचानक पलट जाती है। तत्कालीन बिहार या छोटानागपुर क्षेत्र के उस वनवासी लड़के के लिए यह अपने आप में बड़ी बात थी कि उसे अंग्रेजों के स्कूल में पढ़ने का मौका मिला था। साथ ही, सच्चे अभिभावक जैसे एक अंग्रेज फादर मिले थे, जो स्कूल के प्रिंसिपल थे। ब्रिटिश शासन के दौर में अत्यंत धार्मिक और दया से भरपूर पढ़े-लिखे अंग्रेज के साथ होना ही अपने आप में किस्मत का खुलना था। वैसे फादर उन दिनों बूढे़ हो चले थे और स्कूल का कार्यभार संभाले नहीं संभल रहा था। उन्होंने अपने घर इंग्लैंड जाने की गुहार लगाई, जिसे काफी हठ-मनुहार के बाद मंजूर कर लिया गया। 
यह तय हो गया कि फादर केनन इंग्लैंड लौट जाएंगे और उस वनवासी बच्चे के सिर से बेहतरीन अभिभावक का साया उठ जाएगा, लेकिन होनी में कुछ और दर्ज था। फादर ने एलान कर दिया कि वह 15 वर्षीय वनवासी लड़के को अपने साथ ले जाएंगे। तब लड़का कौतूहल और खुशी से भर गया था। एक ऐसे देश को देखने का मौका मिलने वाला था, जो लगभग आधी दुनिया पर राज कर रहा था। आगे की पढ़ाई, फादर केनन का संरक्षण और सुख-सुविधा को लेकर लड़के के मन में कोई शंका नहीं थी। वह जाने से इनकार के बारे में सोच भी नहीं सकता था। पहले ही फादर के खूब एहसान थे और वह साथ ले जाकर जिंदगी संवारने वाले थे। फादर ने न केवल फैसला ले लिया था, बल्कि वह उसे लागू करने के लिए दृढ़ थे। पहले तो उनका खुद का स्वदेश लौटना मुश्किल लग रहा था, बमुश्किल मंजूरी मिली थी और अब वह एक वनवासी लड़के को भी साथ ले जाना चाहते थे। बिशप ने साफ इनकार कर दिया कि किसी को अपने साथ यहां से ले जाना अच्छी बात नहीं होगी। उस लड़के की जिम्मेदारी कौन उठाएगा? वह इंग्लैंड जाकर क्या करेगा? यहां उसके माता-पिता और समाज के लोग कैसे तैयार होंगे? लेकिन फादर केनन ने तो तय कर लिया था, जिस लड़के को पूरे मन से संवारना शुरू किया है, उसे बीच में कैसे छोड़ जाएं। उसे संवारने का काम इंग्लैंड में और बेहतर ढंग से हो सकता है। लड़के को पीछे छोड़ दिया, तो उसके जीवन की दशा और दिशा कैसे सुधरेगी, इंग्लैंड जाकर भी मुझे चैन नहीं आएगा। फादर ने आखिर बिशप को मना ही लिया। इसके बाद उस आदिवासी लड़के अर्थात जयपाल सिंह मुंडा की जिंदगी में कदम-कदम पर नए मुकामों का सिलसिला शुरू हुआ। पहली बार सूट पहना, पहली बार रेल और पहली बार पानी जहाज से यात्रा। पहली बार ढेर सारे अंग्रेजों को एक साथ देखने और सुनने का मौका मिला। रांची से इतनी जल्दी निकलना हुआ था कि अपने गांव जाने या माता-पिता से मिलने का मौका भी नहीं मिला। किस्मत का पहिया तेजी से ऊंचाइयों पर बढ़ने-चढ़ने लगा। उस दौर में बहुत से लोग इंग्लैंड जाने का सपना देखते थे। बहुत से लोग खूब प्रयास के बावजूद इंग्लैंड नहीं जा पाते थे, लेकिन जयपाल सिंह मुंडा (1903-1970) के जीवन में इंग्लैंड यात्रा एक झटके में साकार हुई। इंग्लैंड पहुंचकर फादर ने एक अमीर परिवार की जिम्मेदारी में जयपाल सिंह मुंडा को सौंप दिया। शानदार पढ़ाई का क्रम चला और साथ में हॉकी में भी हाथ खुलता गया। ऑक्सफोर्ड में पढ़ते हुए हॉकी के बेहतरीन खिलाड़ी के रूप में वह पहचाने जाने लगे। इंडियन सिविल सर्विसेज के लिए चुने गए, पर उन दिनों ओलंपिक का आयोजन होना था और पहली बार भारतीय हॉकी टीम ओलंपिक में हिस्सा लेने वाली थी। उन्हें कप्तान बनाया गया। कई खिलाड़ी भारत से आने वाले थे और दो-तीन इंग्लैंड में ही थे, जिनमें वनवासी जयपाल सिंह मुंडा भी शामिल थे। 17 में से 16 लीग मैचों में मुंडा के नेतृत्व में ही भारतीय हॉकी टीम को विजय हासिल हुई और एक मैच ड्रॉ हुआ। गुलाम भारत के लिए यह बड़ी कामयाबी थी, भारतीय टीम के कुछ खिलाड़ियों के पास पूरे कपड़े भी नहीं थे। अभावग्रस्त खिलाड़ियों में ध्यानचंद भी शामिल थे, लेकिन उस टीम ने तमाम दिग्गज टीमों को धूल चटाकर देश के लिए पहला स्वर्ण जीतकर एलान कर दिया कि भारत किसी से कम नहीं है। जयपाल सिंह मुंडा का नाम दुनिया भर में गूंजने लगा। कट्टर अंग्रेजों को अंदाजा नहीं था कि गुलाम भारत से आई टीम स्वर्ण जीत लेगी, जाहिर है, मुंडा को इंडियन सिविल सर्विसेज का मोह छोड़ देश लौटना पड़ा। जो 1918 में जंगल से निकले, वह 1928 में भारतीय हॉकी टीम के कप्तान के रूप में छाए। 1938 में झारखंड की धरती पर लौटकर आदिवासियों के सर्वमान्य नेता बने और 1948 में संविधान सभा के सदस्य रहते आदिवासी हित में कामयाब सिंह गर्जना की कि हां, हम जंगली हैं, हमें हमारा हक चाहिए।  
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

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  • Web Title:hindustan meri kahani column 24 january 2021