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गांव से आई दुनिया में गूंजती आवाज

अमृतसर, लाहौर की वह फिजा ही अलहदा थी, जिसमें प्यार और संगीत का रस-रंग घुला हुआ था। कभी सूफी संत बुल्ले शाह के बोल गूंजते थे, मस्जिद ढा दे, मंदिर ढा दे, ढा दे जो कुछ दिसदा, पर किसी दा दिल न ढावीं...

गांव से आई दुनिया में गूंजती आवाज
Pankaj Tomarमोहम्मद रफी, गायकSat, 23 Dec 2023 10:38 PM
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अमृतसर, लाहौर की वह फिजा ही अलहदा थी, जिसमें प्यार और संगीत का रस-रंग घुला हुआ था। कभी सूफी संत बुल्ले शाह के बोल गूंजते थे, मस्जिद ढा दे, मंदिर ढा दे, ढा दे जो कुछ दिसदा, पर किसी दा दिल न ढावीं, रब दिलान विच वसदा।  कभी सूफी वारिस शाह पुकारते थे, सानूं रब्ब ने यार मिला दिता भुल गये पयार अलबेलियां दे...। प्यार और सद्भाव को लालायित वह समाज वाकई अजूबा था। बेशक, एक अच्छा समाज ही बेहतर कवि-लेखक पैदा करता है और फिर उन्हें गाने-सुनने वाले आम लोग भी अच्छे ही निकलकर आते हैं। इस देश में तब अच्छा सुनाने वालों के संगठित समुदाय होते थे, इन समुदायों के मिरासी गायक कुछ न कुछ गाते हुए, मांगते हुए गांवों से गुजरते थे। उन्हीं गांवों में से एक गांव था कोटला सुल्तान सिंह, अमृतसर के पास ही। वहां से भी मिरासी गाते हुए अक्सर गुजरते थे और उनकी नकल करते हुए एक बालक फीकू भी क्या खूब गाता था, सानूं रब्ब ने यार मिला दिता...।
फीकू के परिवार के पास ज्यादा जमीन तो थी नहीं, तो उनका बड़ा परिवार लाहौर आ गया। फीकू अपने भाई के साथ एक सैलून में सेवाएं देने लगे। जितने चाव से बाल काटते थे, उतने ही लगाव से गीत गुनगुनाते थे। गंवई मिरासियों ने हीर-रांझा के प्रेम-विरह को मानो फीकू के दिल और गले में बसा दिया था। मीठी रसभरी मर्दानी आवाज में फेंक भी थी और गूंज भी, सीधे कलेजे में उतर आती थी। उम्र सतरहवें पड़ाव पर थी और निकाह दो साल पहले ही हो गया था। ससुर ने बेटी विदा नहीं की थी कि पहले जंवाई राजा कुछ कमाने लगें, तो गौना कर देंगे। फीकू के पिता का गीत-संगीत में ज्यादा यकीन नहीं था, मगर मरासियों, फकीरों ने ऐसी आदत लगा रखी थी कि फीकू के दिल से गीत फूट पड़ते थे, ठीक वैसे ही, जैसे मरासी कोशिश करते हैं, गांव के एक छोर पर सुर छेड़ दें, तो दूसरे छोर तक सुनाई पड़े। 
फीकू एक दिन ऐसे ही गा रहे थे और लाहौर आकाशवाणी के अधिकारी जीवनलाल मट्टू उधर से गुजर रहे थे। वह आवाज सुनकर ठिठक गए, शायद वारिस शाह के हीर की ही पंक्तियां थीं- मिली रांझे नूं हीर ते...। अद्भुत पुकारती जादुई आवाज। जीवनलाल गीत सुनते हुए पास पहुंच गए। लड़का हजामत बनाते हुए क्या गजब गा रहा है! लफ्जों का पोर-पोर करीने से परोसते हुए। आवाज में कैसे उतर रहा है और कैसे फिर चढ़ रहा है। ऐसे तो कोई नहीं गाता। जीवनलाल जी ने पूछ लिया, ‘तुम्हारा नाम क्या है?’ खुशनुमा चेहरे के साथ जवाब मिला, ‘जी, मुझे मोहम्मद रफी कहते हैं।’ कुछ और बातचीत हुई, तो जीवनलाल जी ने पूछा, ‘क्या रेडियो के लिए गाओगे?’ मोहम्मद रफी ने जवाब दिया, ‘जी मौका मिला, तो जरूर गाऊंगा।’ जीवनलाल जी ने कहा, ‘मैं आकाशवाणी में कार्यक्रम अधिकारी हूं, तुम कल आकाशवाणी दफ्तर आ जाओ, एक टेस्ट ले लेते हैं।’
फिर क्या था, दूसरे ही दिन फीकू ने मोहम्मद रफी बनने की ओर कदम बढ़ा दिया। आकाशवाणी में पहली ही स्वर परीक्षा में परीक्षकों ने पास कर दिया। लाहौर आकाशवाणी का दफ्तर तब के कलाकारों बेगम अख्तर, इनायत हुसैन का पसंदीदा ठिकाना था। जीवनलाल मट्टू स्वयं बहुत उम्दा कलाकार थे, उन्होंने भी मोहम्मद रफी को सिखाया और दूसरे गुरुओं-उस्तादों के पास भी भेजा। राग पहाड़ी से भैरवी, बसंत, मल्हार तक रफी की आवाज संवर उठी। मार्च 1943 में रफी रेडियो के लिए गाने लगे और रेडियो पर उनका गायन सुनकर ही उन्हें संगीत निर्देशक श्याम सुंदर ने पंजाबी फिल्म गुल बलोच में गाने का मौका दिया, सोनिए नी, हीरिए नी, तेरी याद ने सताया। इस गीत ने रफी के लिए मुंबई के दरवाजे खोल दिए। वह अगले साल मुंबई पहुंचे और 1945 में हिंदी फिल्मों में उनके गीतों का शानदार सफर शुरू हुआ। लाहौर में कमाई 25 रुपये थी, पर मुंबई में प्रति गीत 500 रुपये मिलने लगे। मुंबई में पांव जम गए। 
दिल से बेमिसाल भले इंसान रफी को भारत की आबोहवा से बहुत प्यार था, विभाजन के बाद उन्होंने परिवार को भी मुंबई बुला लिया। नया भारत बनाने में उनकी आवाज का भी बहुत योगदान है। जय रघुनंदन जय सियाराम  के साथ ही दुनिया में मेरी आबरू रखना मेरे अल्लाह... को वह ऐसे डूबकर गाते थे कि लोग बोल पड़ते थे, अल्लाह या ईश्वर का अगर कोई घर होगा, तो फरिश्ते ऐसी ही आवाज में गाते होंगे। 24 दिसंबर को जन्मे मोहम्मद रफी (1924-1980) आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। उनकी आवाज में हीर का दिल है, तो रांझा की रूह भी। वह आज नहीं हैं, पर उनकी आवाज उनके गांव में ही नहीं, पूरी दुनिया में गूंज रही है, सौ बार जनम लेंगे, सौ बार फना होंगे, ऐ जान-ए-वफा फिर भी, हम तुम न जुदा होंगे।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय 

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