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Hindi News ओपिनियन मेरी कहानीसाधुओं से डरने की अब जरूरत नहीं

साधुओं से डरने की अब जरूरत नहीं

अपने देश में भांति-भांति के साधु हैं। चंद चोर साधु वेशधारियों का कमाल है कि साधुओं की छवि समग्रता में स्नेहिल नहीं है। साधुओं पर जल्दी भरोसा नहीं होता है। ऐसे में, साधु और किसी काम भले न आएं...

साधुओं से डरने की अब जरूरत नहीं
Pankaj Tomarश्री योगेंद्र, आधुनिक योग गुरुSat, 22 Jun 2024 08:38 PM
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अपने देश में भांति-भांति के साधु हैं। चंद चोर साधु वेशधारियों का कमाल है कि साधुओं की छवि समग्रता में स्नेहिल नहीं है। साधुओं पर जल्दी भरोसा नहीं होता है। ऐसे में, साधु और किसी काम भले न आएं, पर बच्चों को डराने के काम जरूर आते हैं। कहा जाता है, साधु आते हैं, बड़ी-सी झोली अपनी लंगोट में छिपाए हुए, जैसे ही कोई बच्चा दिखेगा, वे झोली खोलेंगे और पलक झपकते बच्चे को झोली में डाल नौ दो ग्यारह हो जाएंगे। 
उस दिन सूरत के पास एक गांव की गली में कनफटे साधु, एकदम अक्खड़, केवल लंगोट बांधे चले आ रहे थे। बमुश्किल पांच साल का बच्चा घर से बाहर खड़ा देखे जा रहा था। साधु अपनी तूफानी गति से चले आ रहे थे। वे पास पहुंचे ही थे कि दो हाथों ने पीछे से बच्चे को लपककर उठाया और दरवाजे से अंदर खींच लिया। बच्चे ने गौर किया, दादी ने उठा रखा है, बहुत डरी हुई हैं कि आज तो यह अबोध साधुओं की झोली में चला जाता। बच्चे को तो कुछ भी समझ नहीं आया। कौन हैं ये साधु? क्यों है उनके प्रति इतना भय? ये ऐसे क्यों रहते हैं? ये भगवान के सेवक हैं, तो इन्हें कैसे रहना चाहिए? साधुओं को लेकर बड़े-बड़े सवाल मन में गहरे पैठ गए? ऐसा ही होता है कि बच्चों को जिस चीज से दूर रखने की चेष्टा होती है, वे उसी चीज के प्रति ज्यादा आकर्षित होते हैं। बच्चे को डराया गया कि इन साधुओं के पास त्रिशूल होता है, जो जरूरत पड़ने पर विकराल हो जाता है। ये साधु धुन के पक्के होते हैं, केवल आगे बढ़ना जानते हैं, कभी एक कदम भी पीछे नहीं खींचते। कहीं स्थिर नहीं रहते और हमेशा सीधे देखते हुए चलते हैं। साधुओं को लेकर गांठ मन में बन गई। उसने मन ही मन ठान लिया कि एक दिन साधुओं की दुनिया में झांककर सब कुछ देखना है। 
वह एक दिन आया, तब बच्चा उम्र के दो दशक पार कर चुका था। शिक्षक पिता चाहते थे कि सुपुत्र महोदय लंदन चले जाएं, प्रशासनिक सेवा की परीक्षा दें, पर सुपुत्र का मन स्थिर न था, वह तय नहीं कर पा रहे थे कि उन्हें आनंद कहां मिलेगा। ऐसी मन:स्थिति में वह एक दिन अपने मित्र के साथ माधव बाग धर्मशाला पहुंच गए। वहां एक बड़े महात्मा आए हुए थे, सिंध के कलक्टर भी जिनके मुरीद थे और कराची के लोगों ने जिन्हें शकरिया बाबा नाम दे रखा था। खूब लंबी कद-काठी, चुस्त शरीर, सुंदर दाढ़ी और प्रेम से विभोर आंखें। ऐसे सुदर्शन साधु से जैसे ही नजरें मिलीं, तत्काल एहसास हुआ कि यह तो महान हैं। कौन कहता है कि साधु खूंखार होते हैं, लंगोट बांधे डरावने होते हैं, जिनकी आंखों की नसों में लहू दौड़ता रहता है। यहां तो सामने मीठी गोली देने वाले शकरिया बाबा माधवदासजी इतने प्यारे लग रहे थे कि क्या कहा जाए, बस देखते रहा जाए। 
दोनों परस्पर प्रेम से सराबोर ऐसे मिले, मानो कभी अलग ही न हुए हों। एक ही नजर में शिष्य को सिद्ध गुरु और गुरु को पट शिष्य मिल गए। साधुओं को लेकर बनी बाल सुलभ स्मृति एक ही भेंट में गायब हो गई। साधु तो ऐसे होते हैं, साधुता से सराबोर। एक ही भेंट में बात पढ़ाई से काफी आगे निकल गई। दूसरे दिन कदम फिर गुरु की ओर बढ़ चले। गुरु ने शुभ दिन देख शिष्य को समाधि की दीक्षा दी। नामकरण हुआ, शिष्य महोदय मणिभाई हरिभाई देसाई से श्री योगेंद्र हो गए। गुरु ने दूसरे ही दिन सबके सामने मुट्ठी भींचते हुए कह दिया, ‘ऐसे गुणी को देखकर मुझे भी ताकत मिलती है।’ 
पुत्र के पढ़ाई छोड़कर योग सीखने के फैसले से पिता बहुत निराश हुए। तब गुरु ने पिता को पत्र लिखा और मिलने के लिए बुलाया। पिता को सामने बैठकर समझाया, पर यहां फिर एक निर्णायक मोड़ आया, पुत्र ने घोषणा कर दी, परिवार और पिता के अरमानों पर पानी फेरकर साधु बनने का कोई सार नहीं। मैं गुरु जी को भी अब कभी नहीं छोड़ूंगा और पिताजी से भी मुंह नहीं फेरूंगा। तब पिता की आंखों में खुशी के आंसू थे और गुरुदेव की आंखें भी अचरज व गर्व से इतरा रही थीं। ऐसा शिष्य मिला है कि साधुता का ढांचा ही बदल जाएगा!
नर्मदा किनारे गुरु की छत्रछाया में श्री योगेंद्र (1897-1989) ने अपने अद्भुत उर्वर शरीर में तमाम योगासनों और यौगिक क्रियाओं को सहर्ष उतार लिया। वह अपने गुरु के सबसे सिद्ध शिष्य और उत्तराधिकारी हुए। उन्होंने 25 दिसंबर, 1918 को मुंबई में वर्सोवा समुद्र तट पर योग संस्थान का श्रीगणेश किया और हर इच्छुक को सिखाना शुरू किया। योग जगत में उनका अनुपम योगदान है। रहस्यमय योगियों के पास केंद्रित योग विधा को आम लोगों तक सुलभ कराने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। गुजराती साहित्य में भी उनका बड़ा नाम है और वह आधुनिक योग के सिद्ध भारतीय पितामहों में गिने जाते हैं। 
  प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय 

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