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Hindi News ओपिनियन मेरी कहानी‘मैं कौन हूं’ जानने वह भारत आ गए

‘मैं कौन हूं’ जानने वह भारत आ गए

कभी राम आए थे। अवतार हुआ था, उन्होंने मर्यादापुरुषोत्तम स्वरूप को साकार किया और फिर एक दिन अयोध्या में सरयू में लीन हो गए। संसार में मानव जीवन का श्रेष्ठतम व्यावहारिक भाव - रामभाव संसार में सदा ...

‘मैं कौन हूं’ जानने वह भारत आ गए
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSat, 20 Jan 2024 10:43 PM
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कभी राम आए थे। अवतार हुआ था, उन्होंने मर्यादापुरुषोत्तम स्वरूप को साकार किया और फिर एक दिन अयोध्या में सरयू में लीन हो गए। संसार में मानव जीवन का श्रेष्ठतम व्यावहारिक भाव - रामभाव संसार में सदा के लिए रह गया, वह चले गए, पर राम कौन थे? राम अर्थात साक्षात नारायण, जो राम रूप से पहले परशुराम रूप में विराजमान हुए थे और राम के बाद कृष्ण रूप में अवतरित हुए, तो हम ठीक से जानते हैं कि तपस्वी राजा राम कौन थे, पर हममें से कितनों ने सोचा है कि मैं कौन हूं? 
‘मैं मौरिस फ्राइडमैन हूं,’ यही तो वह विद्वान यहूदी इंजीनियर मानते आए थे। बाकी लोग भी यही मानते हैं, हम बस वही हैं, जो माता-पिता ने नाम रखा है। कोई पीटर है, तो कोई प्रकाश, कभी यह सवाल ही नहीं पैदा होता कि यह पीटर कौन है और प्रकाश क्या तत्व है? मौरिस फ्राइडमैन भी कभी नहीं सोचते थे कि वह कौन हैं? पर मन में एक बेचैनी-सी बनी रहती थी, अपनी यहूदी शैली को पूरा खंगाल लिया, फिर चर्च में चैन तलाशने लगे, पर उनके जीवन में क्रांति तब हुई, जब एक सज्जन लेखक पॉल बं्रटन की पुस्तक ए सर्च इन सीक्रेट इंडिया  हाथ लगी। उसमें एक प्रसिद्ध भारतीय संत रमन महर्षि के विचार थे, जिन पर पॉल ब्रंटन ने बहुत भक्ति भाव से लिखा था। पुस्तक में यह प्रश्न पुरजोर उठता है, ‘मैं कौन हूं?’ इस प्रश्न ने मौरिस को झकझोर कर रख दिया? वह सोचने लगे, यह तो आज तक जान नहीं पाया कि मैं कौन हूं। और तो और, यह प्रश्न ही कभी मन में नहीं आया। क्या गजब प्रश्न है, मैं कौन हूं? तो कैसे और कहां मिलेगा, इसका उत्तर? तब मौरिस के मन में भारत जाने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई। वह भारत पहुंचने के लिए एकदम बेचैन हो उठे। कहा जाता है, आप दिल से इच्छा कीजिए, तो इच्छा ही अपनी राह तैयार करने लगती है। ऐसा ही हुआ। सौभाग्य से भारत में ही इंजीनियरिंग का एक काम निकल आया और मौरिस भारत पहुंच गए। यहां उन्होंने संतों के साथ मिलना शुरू किया। 
रमन महर्षि से भी दिव्य भेंट हुई, पहले ही संवाद में बहुत गहरा असर हुआ। मौरिस ने निवेदन किया कि मुझे शिष्य बना लीजिए। रमन महर्षि एक विदेशी को शिष्य बनाने से पहले कुछ इंतजार करना चाहते थे, पर मौरिस को लग रहा था कि बहुत समय गंवा दिया और अब जब कुछ समझ आई है, तो आगे एक भी पल गंवाना ठीक नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है - अबलौं नसानी, अब न नसैहौं। राम-कृपा भव-निसा सिरानी, जागे फिरि न डसैहौं।  बहुत जल्दी मच गई कि साधु हो जाएं, संत भाव को समर्पित हो जाएं, ताकि पता तो चले कि मैं कौन हूं। संत रामदास जी से उन्होंने दीक्षा ले ली, नाम हो गया स्वामी भरतानंदा। 
विद्वान, स्नेहिल और व्यवहारकुशल भरतानंदा अपने समय के तमाम दिग्गज व्यावहारिक संतों के सत्संग में रहते थे। तमाम तरह के अंधविश्वास से दूर, हर चीज को इंजीनियरिंग के पैमाने पर परखते हुए। अध्यात्म-ज्ञान ध्वजवाहक जे कृष्णमूर्ति के साथ उनकी तीखी बहस होती थी, तो संत निसर्गदत्त के साथ घंटों वह भगवद् प्रेम में डूबे रहते थे। मित्रवत मार्गदर्शक संत रमन महर्षि अक्सर कहते थे कि मौरिस मूलत: भारतीय हैं, बस पश्चिम में पैदा हो गए थे और अब स्वदेश लौट आए हैं। 
वाकई भरतानंदा पर संतई और भारतीयता का रंग बहुत आसानी से चढ़ गया। सदा जाप, ध्यान, सत्संग में रहने लगे। जीवन में कम से कम बाह्य चीजों का सहारा लेने लगे। फिर जो खुशी उन्हें मिली, उसका आनंद उनके चेहरे पर मुखर रहने लगा। 
वह एक दिन जब गांधीजी से मिले, तब उन्हें चरखा दिखा। उन्होंने अपने इंजीनियरिंग ज्ञान से ऐसे चरखे बनाए, जो ज्यादा तेजी से सूत कात सकते थे, तो गांधीजी का काफी समय बचने लगा। गांधीजी ने उन्हें सदा भरतानंदा नाम से ही पुकारा। दस से ज्यादा भाषाओं के ज्ञाता मौरिस फ्राइडमैन अर्थात भरतानंदा  (1901-1976) ने एक पुस्तक की रचना की, ‘जो मैं हूं।’ ‘हू आई एम’ के जवाब में ‘दैट आई एम’। वह भारत में ही रहते हुए किसी विद्वान ऋषि की तरह गूढ़ पद्य लिखने लगे। पश्चिम में जन्में व्यक्ति का सौभाग्य देखिए, जब वह प्रसन्नचित्त संसार से विदा हुए, तब भारत के बड़े संतों की गोद उन्हें हासिल थी।   
उन्होंने लिखा है, ‘हम तब परिपक्व होते हैं, जब हम बहने से इनकार कर देते हैं, ...जब अंतदृर्ष्टि से पैदा हुआ वैराग्य सहज हो जाता है, जब खोज - मैं कौन हूं? - ही एकमात्र ऐसी चीज बन जाती है, जो मायने रखती है, जब हम केवल एक मशाल बन जाते हैं और लौ ही महत्वपूर्ण हो जाती है, तो इसका मतलब यह होगा कि हम तेजी से पक रहे हैं। हम उस परिपक्वता को तेज नहीं कर सकते, पर हम भय और लालच, आलस्य और कल्पना, पूर्वाग्रह और गर्व की बाधाओं को दूर कर ही सकते हैं।’ 
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय 

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