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11 अप्रैल, 2021|12:35|IST

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सौ रुपये और भारत रत्न

केवल अपना ही नहीं, बल्कि समाज, गांव की भी सेहत का हाल बुरा था। बॉम्बे और पूना खासतौर पर बुबोनिक प्लेग से त्रस्त थे। न विद्यालय खुलते थे और न विश्वविद्यालयों में कोई आता था। ऐसे में, पिता कॉलेज भेजने को तैयार न थे। दसवीं करने के बाद आगे की पढ़ाई ही नहीं, बल्कि जिंदगी भी ठहर गई लगती थी। पुजारियों का परिवार था, पर पिता अपने हठ से वकील बन गए थे और चाहते थे कि बेटा भी कानून की पढ़ाई कर ले। पिता ने घर पर ही पढ़ाना शुरू किया, पर उस पढ़ाई में रस नहीं आता था। तो करें क्या?  आखिरकार उस किशोर ने हाथ खडे़ कर दिए और बॉम्बे के विल्सन कॉलेज के पिंसिपल को पत्र लिखा। उसने सुन रखा था कि प्रिंसिपल बड़े दयालु हैं। पत्र में प्रिंसिपल से पूछा गया था, ‘क्या मुझे अनुपस्थित छात्र के रूप में कॉलेज में प्रवेश दिया जा सकता है, ताकि मेरी पढ़ाई जारी रहे। ठहरे हुए जीवन पर आपकी कृपा बरस जाए। यदि नामांकन हो जाए, तो पढ़ाई फिर शुरू हो जाएगी।’ दयालु प्रिंसिपल ने जवाब दिया कि ‘हां, नामांकित किया जा सकता है। आप 36 रुपये शुल्क चुका दो और प्रवेश ले लो। महामारी चरम पर है, कॉलेज अभी नहीं खुलेगा, लेकिन छात्रों की अनुपस्थिति को माफ किया जा सकता है।’ उस दौर में 36 रुपये कम नहीं थे, किसी तरह से भुगतान कर दिया गया, लेकिन कॉलेज के दर्शन एक साल बाद ही हुए। 
उस दौर में पढ़ाई आसान नहीं थी, परिवार भी बडे़-बड़े होते थे। परिवार में छह भाई और तीन बहनें थीं और वह किशोर भाइयों में सबसे बड़ा था। इस बात का ध्यान रखना था कि पढ़ाई सोलह आना होनी है, ताकि छोटे भाई-बहनों के समक्ष आदर्श उपस्थित हो और उसके साथ ही पिता पर अधिक भार न आए। पढ़ाई ऐसी हो कि दो पैसे भी आएं और सोने पर सुहागा हो जाए। उस साल 1898 में जून से कॉलेज शुरू हुए थे और नवंबर में पहली बार परीक्षा हुई थी। परिणाम ऐसा सर्वोत्तम आया कि 175 रुपये की छात्रवृत्ति झोली में आ गई, किंतु सबसे अधिक खुशी एक अन्य पारितोषिक से संभव हुई। कॉलेज में उस किशोर की दूसरी भाषा संस्कृत थी, जिसमें वह सर्वप्रथम रहा, तो संस्कृत के लिए अतिरिक्त 100 रुपये प्राप्त हुए। पुजारियों का परिवार था, तो संस्कृत के लिए पुरस्कृत होना विशेष अर्थ रखता था। इस पुरस्कार ने चिंतन-अध्ययन की दिशा को बदलकर रख दिया। घर-परिवार में भी खुशी का माहौल था। तब तोला भर स्वर्ण की कीमत 18 रुपये के आसपास होती थी। आज की कीमत से अंदाजा लगाएं, तो संस्कृत के लिए मिली 100 रुपये की प्रोत्साहन राशि ढाई लाख रुपये के आसपास ठहरती है। पंडितों के लिए यह दक्षिणा बहुत अधिक थी, लेकिन बिना पूजा-पाठ किए मात्र पढ़ने और प्रथम आने भर से हुई 100 रुपये की कमाई अनमोल थी। किशोर ने ठान लिया कि अब संस्कृत को नहीं छोड़ना है। मातृभूमि की जो भाषा सम्मान के साथ-साथ धन-वैभव भी दिला सकती है, उसे क्यों छोड़ा जाए? अगले वर्ष जो परीक्षा हुई, उसमें भी प्रथम आने पर पुरस्कार स्वरूप 180 रुपये मिले। संस्कृत स्वभाव में समाहित हो गई और राष्ट्र ने संस्कृत के उस महान विद्वान पांडुरंग वामन काणे को जानना शुरू किया। संस्कृति के प्रति भी प्रेमभाव बढ़ा, तो धर्मशास्त्रों ने विशेष रूप से आकर्षित किया। अंतिम वर्ष की परीक्षा में भी इतने अच्छे अंक आए कि संस्कृत में दक्षता के लिए भाऊ दाजी पुरस्कार से सम्मानित किया गया और विल्सन कॉलेज के छात्रों में वह प्रथम स्थान पर रहे। पिता चाहते थे, वकील बनो, किंतु वकालत की पढ़ाई भी तभी पूरी हुई, जब संस्कृत जगत ने निराश किया। बहुत पढे़-लिखे होने के बावजूद संस्कृत शिक्षक की मनचाही नौकरी नहीं मिली, एक अन्य कम पढ़े-लिखे संस्कृतज्ञ को सिफारिश से नौकरी पर रख लिया गया, तो मन टूटा। उन्होंने वकालत का काम शुरू कर दिया। वकालत में भी संस्कृत और भारतीय धर्मशास्त्रों ने कदम-कदम पर मार्गदर्शन करना शुरू किया। संस्कृत ने बार-बार अपनी ओर खींचा और वकालत में भी बड़ा नाम हुआ। वकालत के लिए धर्मशास्त्रों से सामग्री जुटाते हुए ही मन में धर्मशास्त्रों का इतिहास लिखने का विचार आया। जीवन के 40 वर्ष संस्कृत को अर्पित कर दिए। पांच खंडों और 6,500 पृष्ठों में धर्मशास्त्रों का इतिहास लिखकर डॉक्टर पांडुरंग वामन काणे ने अपने नाम को अमर कर दिया। वर्ष 1963 में उन्हें सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। खूब दाम-नाम कमाने के बावजूद वह संस्कृत के लिए मिले 100 रुपयों को अपने जीवन का प्रथम सौभाग्य मानते थे और कहते थे, ‘जीवन एक रहस्यमय व्यापार है। यह सौभाग्यों और अवसरों से पूर्ण है और सबको स्वयं के प्रयासों से लाभ उठाने में सक्षम होना चाहिए।’  
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

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  • Web Title:hindustan meri kahani column 21 february 2021