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22 फरवरी, 2021|7:33|IST

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उठना और चलना ही जिंदगी है

जिंदगी पहाड़ हो गई थी। जब दिलो-दिमाग पर भी निमोनिया सवार हो गया हो, तब देह का हाल मत ही पूछिए। देह बीमार हो जाए, तो संभल भी जाए, लेकिन बीमारी दिलो-दिमाग तक पैठ कर ले, तो उम्मीदें भी बिस्तर पकड़ने लगती हैं। उस महिला के साथ यही हो रहा था। बीमारी ही ऐसी खतरनाक थी। अमेरिका में निमोनिया के आगे आज भी लोग घुटने टेक देते हैं, तब तो और ज्यादा हारते थे। सांस लो, तो फेफड़े जवाब देने लगते। सांस अंदर जाती, तब भी दर्द और बाहर आती, तब और ज्यादा। दर्द से ऐसा रिश्ता बन गया था कि लगता, मौत पास ही कहीं घात लगाए ताक रही है, लेकिन जब डॉक्टर पति करीब होते, तो लगता कि कोई है, जो दामन थामे हुए है, छोडे़गा नहीं। पति दूर होते, तो दिमाग पूछने लगता, अब अलविदा का वक्त आ गया है क्या? 
मामला हाथ से निकलता देख एक दिन पति ने समझाने का बीड़ा उठाया। निराश पत्नी की थरथराती उंगलियों को सुलझाते हुए धीरे से कहा, ‘तुम लड़ो, तुम्हीं जीतोगी। तुम बिस्तर पर पड़ी हो? देखो, बाहर दुनिया बढ़ रही है। पंछी उड़ चले हैं। पेड़ झूमते खड़े हैं। तुम्हारे पीछे हरियाली और पसर गई है। झरने बह रहे हैं। पहाड़ों से कोई पुकार रहा है। उठो, चलो तो सही, सबको पता चले कि तुम जीना चाहती हो। कुछ ही देर सही, उठोगी और चलोगी, बाहर निकलकर सब देखोगी, तो तुम्हें अच्छा लगेगा’। 
पति के समझाने से कुछ हुआ, हिम्मत के तार जुड़ने लगे। घबराहट व थकान से उबरना आसान नहीं था। खून की कमी बढ़ गई थी, लेकिन यह कोई अकेली कमी तो थी नहीं। उठने-चलने के लिए कमियों के एक पूरे सिलसिले से जूझना पड़ता था। कमी-दर-कमी, तमाम कमियों को दूर करना था और सुधार की ओर कदम-दर-कदम बढ़ाते चलना था। सबसे पहले कमरे से बाहर निकल टहलना जरूरी था, ताकि कुछ  ताकत मिले, दिलो-दिमाग को बीमारी से मुकाबले लायक बनाया जा सके। वाकई बाहर जो दुनिया सजी हुई है, उसे क्या फर्क पड़ता है कि कोई दिन-रात बिस्तर पर ढेर रहे? सूरज तो रोज बिना नागा निकलता है, लेकिन कोई अगर खिड़कियां-दरवाजे ही बंद कर ले, तो अंधेरे से उसे कौन बचा सकता है? अमेरिका में एक से एक सुंदर पहाड़ खड़े हैं, कोई उन्हें न देखे, तो पहाड़ों का भला क्या जाता है? रोशनी को संजोना है, पहाड़ों को निहारना है, तो उठकर बढ़ना होगा। 
उम्र के चौथे दशक में जिंदगी चल रही है, पर न कसरत की आदत है, न तमन्ना। इसी की भारी कीमत अब निमोनिया वसूल रहा है। नहीं, अब नहीं, बाहर निकलना ही होगा। वह उठीं और चलीं, लेकिन घर के  आंगन में कुछ कदम चलते ही दम फूलने लगा। हांफना इतना बुरा लगता कि वह चाहती न थीं कि चलते हुए उन्हें कोई देखे। बार-बार थकतीं, बार-बार उठतीं और चलतीं। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ा। घर के आसपास के पठारों पर चलने लगीं। 54 की उम्र हुई थी, तो एनाटॉमी के प्रोफेसर पति सैम्युअल क्रूक्स चल बसे। चलने को प्रेरित करने वाले पति के न होने ने चलने के लिए और विवश किया। छोटे पहाड़ों पर चलने का सिलसिला बना। फिर एक दिन वह भी आया, जब 66 की पकी हुई उम्र में उस महिला ने अमेरिका की उस वक्त की सबसे ऊंची पर्वत चोटी का स्पर्श किया। कैलिफोर्निया में 14,500 फुट ऊंची माउंट व्हिटनी से ऐसा परिचय हुआ कि लोगों ने उन्हें दादी व्हिटनी कहना शुरू कर दिया। 
कुछ चलकर पता चला, चलने से ज्यादा आनंद तो दौड़ने में है। दादी व्हिटनी ने 70 की उम्र में दौड़ना शुरू किया। लगभग 20 साल तक हर साल उनके कदम माउंट व्हिटनी को चूमते रहे। 91 की उम्र तक वह उस ऊंची चोटी पर 23 बार चढ़ने में कामयाब रहीं। वह जापान की माउंट फुजी को फतह करने वाली सबसे बुजुर्ग महिला बनीं, तब वह उम्र के 91वें पड़ाव पर थीं। अपने शानदार पर्वतारोही जीवन में उन्होंने 97 चोटियों पर कदम रखने का कीर्तिमान बनाया। पीठ पर 25 किलो सामान लेकर पहाड़ों को नापने वाली व्हिटनी दादी पूरे 101 साल जीवित रहीं और अक्सर कहती थीं, ‘मैंने कुछ सोचकर पहाड़ों पर चढ़ाई नहीं की, मैंने तो खुली जगहों की खोज और अपने शरीर व आत्मा के निर्माण के लिए ऐसा किया’। वह अपनी बेमिसाल जिंदगी के दम पर लोगों को समझाती चलती थीं कि पहाड़ चढ़ने की कोई उम्र नहीं होती। शरीर वैसा ही बन जाता है, जैसा मन चाहता है। मन बुलंद हो, तो नामुमकिन कुछ नहीं। कहते हैं, निमोनिया की चपेट में आने वाले 10 साल तक ही जीते थे, लेकिन हल्डा क्रूक्स (1896-1997) ने चलते-चलते उस धारणा को धता बता दिया। दुनिया ने देख लिया, कभी जिंदगी पहाड़ हो गई थी, लेकिन जुनून ऐसा जागा था कि पहाड़ ही जिंदगी हो गए थे।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

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  • Web Title:hindustan meri kahani column 19 july 2020