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Hindi News ओपिनियन मेरी कहानीजब सिर्फ पच्चीस पैसे के लिए हुई पिटाई

जब सिर्फ पच्चीस पैसे के लिए हुई पिटाई

पैसे खर्च होने के लिए मानो मचल रहे थे और वह पहुंच गया हलवाई की दुकान पर। तब दुकान पर कम ही मिष्ठान हुआ करते थे, पर उनमें और उनके स्वाद में ज्यादा ईमानदारी हुआ करती थी। पूरे चार आने की मिठाइयां लीं...

जब सिर्फ पच्चीस पैसे के लिए हुई पिटाई
tn sheshan
Pankaj Tomarटी एन शेषन, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तSat, 16 Mar 2024 08:33 PM
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पालन-पोषण का सही शास्त्रीय सिद्धांत तो यही है कि बच्चों की जरूरतें जरूर पूरी कर दी जाएं, मगर उनके हाथ में पैसे न दिए जाएं। बच्चे इतने संतुष्ट हों कि उन्हें पैसों को हाथ लगाने की जरूरत ही नहीं पड़े, पर ऐसा होता नहीं है। अब लोग बच्चों की हथेली पर पैसे रखकर निश्चिंत हो जाते हैं कि बच्चा जरूरत के समय खर्च कर लेगा, इसे जेबखर्च कहा जाता है। अनेक बच्चों को हजारों रुपये जेबखर्च में मिलते हैं। नतीजा यह कि अब ज्यादातर बच्चे खुले हाथ से खर्च की आदत में मस्त रहते हैं। 
पहले ऐसा नहीं था। बाजार में जरूरी चीजें ही बिकती थीं। बाजार न सजीले हुए थे और न घूमने-टहलने की जगह बने थे। गैर-जरूरी चीजों का चलन भी नहीं था। बच्चों की जेब में तब कभी-कभी ही तीन-चार आने नसीब होते थे। केरल राज्य के उस बच्चे की जेब में भी एक दिन चार आने खनक रहे थे। चार आने मतलब पूरे पच्चीस पैसे। दिल खुशी से बाग-बाग हो रहा था। पैसे खर्च हो जाने के लिए मानो मचल रहे थे और वह पहुंच गया हलवाई की दुकान पर। तब दुकान पर कम ही मिष्ठान हुआ करते थे, पर उनमें और उनके स्वाद में ज्यादा ईमानदारी हुआ करती थी। पूरे चार आने की मिठाइयां लीं, जैसे उन्नीयप्पम, नेय्यप्पम, पायसम। पेट भरा, तो मन गदगद हो उठा। 
खैर, अपनी जेब से हुई मनमानी का आनंद कुछ देर ही टिक सका। मां ने उसी शाम पूछ लिया, ‘तुम्हारे पास चार आने हैं, वापस करो?’ अब तो हुई समस्या। चार आने तो खर्च हो गए, पर बताया कैसे जाए? वह बालक भय से सहमा-सिमटा चला जा रहा था। मन ही मन यही सोच रहा था कि मां को अचानक कोई काम याद आ जाए या घर में बड़े-बड़े पांच भाई-बहन थे, कोई तो मां को पुकारकर छोटे भाई को बचा ले। मां का ध्यान भटक जाए, पर मां तो टकटकी लगाए पूछे चली जा रही थीं, ‘चार आने क्या हुए? कहां रखे? वापस करो।’ बालक चुप रहा, तो मां का रोष बढ़ा, ‘बता, चार आने का क्या किया?’
बालक ने धीरे से जवाब दिया, ‘मां, माफ कीजिए, दुकान पर खर्च हो गए। मन हुआ, तो मैंने कुछ खा लिया।’
अब तो मां का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंचकर पिटाई के रूप में बरसने लगा। वह बोले चली जा रही थीं, ‘चार आने तूने यूं ही खर्च कर डाले? क्या घर में तेरा पेट नहीं भरता, तुझे ठीक से खाना नहीं मिलता? कोई तुझे बाहर खाते देखता, तो क्या कहता? पहले यह बता कि बिना पूछे पैसे कैसे खर्च कर दिए? तू कब से पैसों का मालिक हो गया? तेरे पैसे थे क्या?’ 
पिता जिला अदालत में वकील थे, ठीक-ठाक कमाते थे। घर में विलासिता के साधन नहीं थे, पर किसी तरह का अभाव नहीं था। पिटते हुए बालक की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे, कभी रोने की आवाज भी गले से कूक उठती थी। बाहर खाना बहुत महंगा पड़ गया। बालक के पास किसी सवाल का जवाब नहीं था, अनुशासन भंग तो हुआ ही था। खर्च करने से पहले मां से प्यार से पूछ लेना चाहिए था, मां जरूर मान जातीं। 
उस बालक को वह पिटाई हमेशा के लिए याद रह गई और यह सबक भी कि जीवन में कभी अनुशासन नहीं तोड़ना है। ऐसा नहीं है कि हमें पैसा खर्च नहीं करना चाहिए, बल्कि यह है कि हमें आंखें मूंदकर खर्च नहीं करना चाहिए। 
वह बालक अपने जीवन से सीखकर किताबों में डूब गया और भारतीय प्रशासनिक सेवा में एक सुंदर पुष्प की तरह खिलकर समाज के सामने आया। सिद्धांत वही पुराना था, एक भी पैसा गलत ढंग से खर्च नहीं करना है। साफ-सुथरा इंसान बने रहना है, ताकि अपने खाते में एक भी रुपया बेईमानी का न पहुंचने पाए। कम आयु में ही जब वह डिप्टी कलक्टर थे, तभी लोग उन्हें शेषन सर के नाम से जानने लगे थे। उनके बारे में उनके वरिष्ठ अधिकारी लिखते थे कि यह अफसर जरूरत से कहीं ज्यादा ईमानदार है। वह एक ऐसे विरल अधिकारी थे, जो सामने से आ रही फुंफकारती हर चुनौती को सीधे सिंग से पकड़ते थे। 
एक समय वह मद्रास में परिवहन निदेशक थे, एक ड्राइवर ने तंज किया कि आप बस के इंजन को नहीं जानते, बस चलाना नहीं जानते, आप ड्राइवरों का दर्द क्या समझेंगे? फिर क्या था, चंद दिन लगे, शेषन इतने कुशल हो गए कि बस को पूरा खोलकर, फिर जोड़कर, घंटों चलाने में पारंगत हो गए। अपनी मेहनत-ईमानदारी से वह बेहतरीन मिसाल बनते चले गए। 
आज कहीं भी चुनाव की चर्चा होती है, तिरुनेल्लई नारायन अय्यर शेषन (1932-2019) की याद अनायास उमड़ पड़ती है। हमारे इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में हमेशा यह दर्ज रहेगा कि हमें मिले एक मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन, जिन्होंने चुनाव सुधार की गंगा बहा दी और जम्हूरियत में चार चांद लगा दिए।  
  प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय