DA Image
22 अप्रैल, 2021|4:11|IST

अगली स्टोरी

भय से ही उपजा अभिनय गुरु

उस बच्चे को बहुत पुचकारकर तैयार किया गया था। न केवल मंच पर पहली बार उतारा गया था, बल्कि एक जगह बैठा भी दिया गया था कि उछल-कूद की जरूरत न पड़े। अभिनय के लिए बहुत गुंजाइश नहीं थी। मंच को रुई से ढक दिया गया था। बीच में कुछ सदाबहार हरियाली थी, उस पर भी रुई का फैलाव किया गया था, ताकि गिरती बर्फ का एहसास कराया जा सके। उस बच्चे को जमीन पर ही फर के कोट से ढककर और सिर पर फर की ही टोपी पहनाकर बैठा दिया गया था। चेहरे पर एक लंबी दाढ़ी भी बांध दी गई थी। दरअसल, उसे शीत ऋतु की भूमिका निभानी थी। बीच-बीच में दिल बाग-बाग हो जा रहा था, लेकिन टुकुर-टुकुर ताकती उसकी आंखों को यह नहीं बताया गया था कि देखना किधर है और करना क्या है। मंच पर बैठे हुए बीच-बीच में बेमकसद, बेमतलब सा भी लगता था और शर्म भी आ रही थी। बोलने के लिए कोई संवाद नहीं था। वहीं मंच पर सामने एक मोमबत्ती भी जलाई गई थी और कुछ छोटी शाखाओं के बीच आग का प्रभाव उत्पन्न करने के लिए उसे रख दिया गया था। बच्चे को लकड़ी का एक छोटा सा टुकड़ा थमा दिया गया था, जिसे बैठे-बैठे ही आग में रखने का दिखावा मात्र करना था। खूब समझाया गया था कि उस लकड़ी को आग से नहीं लगाना है, फिर भी बाल सुलभ चपलता का क्या मुकाबला? बच्चे ने लकड़ी को आग से छुआ भर दिया और लपटें धधक उठीं। मंच पर शीत ऋतु की सजावट जल उठी। किसी तरह से उस बच्चे को मंच से उतारा गया। पलक-झपकते सारी झांकी लुट चुकी थी। मंच के हिस्से में बस राख बची थी और बच्चे के हिस्से में डांट। जिस बच्चे को बहुत प्यार से तारीफ करते हुए मंच के लिए तैयार किया गया था, उसके लिए हर तरफ से फटकार बरसने लगी। यह तुमने क्या कर दिया, तुम्हें कितना समझाया गया था, लेकिन तुमने सारा उत्सव खराब कर दिया। हमें अनुमान होता कि तुम ऐसा करोगे, तो तुम्हें मंच पर न उतारते। एक छोटा सा काम तुमसे न हुआ। यह तो सिर्फ झांकी थी, जब नाटक मिलेगा, तब तुम कैसे करोगे? जिसे जैसा सूझा, कहता और डांटता चला गया। सब तो अच्छा चल रहा था, बस एक गलती हुई और सब कुछ स्वाहा। गहरा असर हुआ। मंच पर आगजनी से आहत बच्चे की हालत कई दिनों तक पतली रही। वह मन ही मन खुद को कोसता रहा कि हाथ आया मौका कैसे जाया हो गया। अब कौन देगा भूमिका? तारीफ कितनी अच्छी लग रही थी, पर फटकार उससे कई गुना बुरी लगी। बचपन का यही मोड़ था, जब दिल में कहीं गहरे यह सोच शुरू हुई कि आखिर गलती कहां हुई, गलती से कैसे बचा जा सकता था और यहीं से दुनिया में सर्वश्रेष्ठ आधुनिक अभिनय गुरु कांस्टैंटिन स्टैनिस्लावस्की के अवतरण का आगाज हुआ। बाद के दिनों में भी आगजनी की उस घटना को याद करके स्टैनिस्लावस्की सिहर उठते थे। वह अक्सर कहते थे, ‘पहली बार मंच पर उतरते हुए जैसे बेमकसद, बेमतलब व शर्मीलेपन का एहसास हुआ था, वह आज भी मुझमें मौजूद है और जब मैं रंगमंच पर होता हूं, तो मुझे डरा देता है।’ उनके दिल में बैठे डर ने उन्हें 32 की उम्र तक गंभीर या पेशेवर अभिनेता नहीं बनने दिया। उन्होंने एक से बढ़कर एक भूमिकाओं को अंजाम दिया, पर संशय का भाव हमेशा बना रहता था। वह अभिनय में नाटकीयता से बचते थे, उनका जोर स्वाभाविकता पर था। शायद नाटकीयता ही बचपन की उस आगजनी का कारण बनी थी। वह ऐसे अभिनय के पक्षधर थे, जिसमें अभिनय करने का एहसास न हो। अभिनेता को देखकर कतई यह नहीं लगे कि वह अभिनय कर रहा है। रंग-चिंतन, अभिनय दर्शन और अभिनय की आचार-संहिता में उनका कोई शानी न था। कहा जाता है कि एक बार हार्ट अटैक के लक्षण के बावजूद उन्होंने अपनी भूमिका को अंजाम देने के बाद ही मंच छोड़ा। आज उनकी खास अभिनय विद्या मैथड एक्टिंग को पूरी कला दुनिया सलाम करती है। 17 जनवरी को जन्मे स्टैनिस्लावस्की (1863-1938) को उस आगजनी ने इतना प्रभावित किया था कि वह हर चीज का विश्लेषण करने लगे थे। उनका ध्यान अपने दोषों को दूर करने पर टिका रहता था। उन्हें हर आलोचना मथती रहती थी। बचपन में ही अपनी कमियों को दर्ज करने की आदत सी हो गई थी। साथ में, हमेशा एक नोटबुक रहती, जिसमें विश्लेषण के प्रमुख हिस्से दर्ज होते थे। इन नोटबुक से ही दुनिया को अभिनय पर बेहतरीन किताबें (एन एक्टर प्रीपेयर्स, क्रिएटिंग अ रोल, बिल्डिंग अ कैरेक्टर) नसीब हुईं, जिन्हें दुनिया के तमाम अभिनय या नाट्य विद्यालयों में अनिवार्य रूप से पढ़ाया जाता है। जब वह दुनिया से गए, तो सिरहाने एक नोटबुक छोड़ गए।  
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

  • Hindi News से जुड़े ताजा अपडेट के लिए हमें पर लाइक और पर फॉलो करें।
  • Web Title:hindustan meri kahani column 17 january 2021