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हिंसा की बीमारी का इलाज मुमकिन है

पता नहीं कैसे, धर्म बदलते ही पुत्र अपने पिता का ही जानी दुश्मन बन जाता है। पाखंड देखिए, हत्या का अधर्म करने वाले खुद को महा-धार्मिक बताते हैं और उस जमीन के लिए खून बहाते हैं, जिसका एक कतरा भी वह...

हिंसा की बीमारी का इलाज मुमकिन है
Pankaj Tomarसाइमन पेरेज, नोबेल विजेता इजरायली नेताSat, 14 Oct 2023 10:09 PM
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शायद यह काम ही गलत किया गया था कि पत्थर पर जबरन दूब उगाया गया था। बीच अरब में यहूदियों का देश बसाया गया था। जब यूरोप में यहूदियों को निशाना बनाया जाने लगा, तब यहूदियों ने पाया कि हमारी जड़ें, तो अरब में ही हैं, वहीं से हम निकाले गए। हमें वहीं मजबूती से बसना चाहिए। अरब का दुर्भाग्य है कि वहां रेत की ही नहीं, नफरत की भी आंधियां चलती हैं, आंखों पर परदे डल जाते हैं और लोग एक-दूजे को मारने लगते हैं। पता नहीं कैसे, धर्म बदलते ही पुत्र अपने पिता का ही जानी दुश्मन बन जाता है। पाखंड देखिए, हत्या का अधर्म करने वाले खुद को महा-धार्मिक बताते हैं और उस जमीन के लिए खून बहाते हैं, जिसका एक कतरा भी वह साथ नहीं ले जा पाएंगे। जमीन की कोरी भूख को ही मजहब की पुकार समझ लेते हैं।
खैर, बीच अरब में इजरायल देश बस गया था। उसी इजरायल में एक बच्चा सपने देखता था कि काश! वह चरवाहा बन जाता या कवि बन जाता, सितारों पर कविता लिखता। चरवाहा बनना था, तो कृषि की पढ़ाई कर ली और बन गए किसान, चराने लगे पशु, पर सब सपने कहां पूरे होते हैं। चारों तरफ से चलती नफरत की आंधियों के बीच देश कराह उठता था। लगता था कि सब पड़ोसी मिलकर उखाड़ फेंकेंगे, तो जाएंगे कहां?
वह युवा भी खुद को और अपने देश को बचाने के लिए उठ खड़ा हुआ। तन सशक्त था और मन इतना मजबूत कि देखने वाले दंग रह जाते थे। कैसे ईंट का जवाब पत्थर से देते हैं, यह उस 20 वर्षीय युवा को जल्दी ही आ गया। बस चार साल लगे, वह युवा साइमन पेरेज महज 25 की उम्र में इजरायली नौसेना के प्रमुख बन गए। उनका सिद्धांत यही था कि कोई अगर तुम्हें एक मारता है, तो तुम उसे ऐसे मारो कि वह फिर मारने लायक न बचे। मारकाट करना ही उनका जीवन बन गया था। 
हालांकि, केवल लड़ाई ही जिंदगी नहीं है। जिंदगी सिर्फ संगीनों के दम पर हासिल नहीं हो सकती। सच्चे सुकून के लिए माली हालत भी मजबूत होनी चाहिए। इजरायल आर्थिक रूप से डूबने लगा था। देशप्रेम की वजह से लोग बोलते नहीं थे, पर महंगाई ने लोगों को रुला रखा था। तब साइमन पेरेज ने देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने का बीड़ा उठाया। साल 1985 में उन्होंने बड़े साहसिक कदम उठाए और अर्थव्यवस्था महज छह महीने में पटरी पर दौड़ने लगी। खुशहाली दिखने लगी, पर तब भी फलस्तीन, जॉर्डन, लेबनान की ओर से बहुत घातक हमले होते थे। जब भी हमला होता, पेरेज अर्थव्यवस्था को लेकर चिंतित हो उठते थे, वह समझ चुके थे कि स्थिर अर्थव्यवस्था के लिए शांति सबसे जरूरी है। एक-एक इजरायली जिंदगी का महत्व है। उनकी प्रेरणा से उसी साल जिब्रिल समझौता हुआ था और इजरायल ने अपने तीन सैनिकों को छुड़ाने के लिए 1,150 दुश्मन कैदियों को रिहा किया था। वह खुश थे, पर उनकी खुशी जल्दी ही तब काफूर हो गई। फलस्तीनी आतंकियों ने तीन इजरायली नागरिकों की हत्या कर दी। इजरायली वायु सेना ने 60 फलस्तीनी लड़ाकों को मारकर बदला लिया। यह साइमन के लिए निर्णायक क्षण था। ऐसे तो हिंसा का सिलसिला कभी नहीं रुकेगा। यही वह साल 1985 के आखिरी महीने थे, जब पेरेज बाज की तरह नहीं, एक शांतिप्रेमी कबूतर की तरह योजना बनाने लगे। उन्होंने दो सपने देखे, पहला, यहूदियों का अपना देश हो और दूसरा, एक खुशहाल पश्चिम एशिया हो। 
पेरेज चुपचाप शांति अभियान में लग गए। तमाम दुश्मनों को उन्होंने बात-व्यवहार से पिघलाया। उन्हीं की कोशिशों से जार्डन से इजरायल का 46 साल से चल रहा युद्ध समाप्त हुआ, जिसके लिए पेरेज को अपने देश के प्रधानमंत्री यत्जक रबीन और फलस्तीन नेता याशर अराफात के साथ नोबेल शांति सम्मान से नवाजा गया। देश को परमाणु शक्ति बनाने वाले पेरेज, देश को आर्थिक शक्ति बनाने वाले पेरेज, सूचना प्रौद्योगिकी में माहिर बनाने वाले पेरेज ने खुद को शांति के लिए समर्पित कर दिया। वह अक्सर बोलते थे कि हिंसा बीमारी है, जिसका इलाज संभव है। शांति के दूत पेरेज भारतीय नेताओं को देखते ही हाथ जोड़ देते थे, क्योंकि वह जानते थे कि भारी हिंसा के बाद उन्हें शांति का महत्व समझ में आया, पर भारत में एक ऐसे नेता हुए थे, महात्मा गांधी, जो शुरुआत में ही शांति का महत्व समझ गए थे। 
सैनिक से लेकर राष्ट्रपति तक देश के सभी पदों पर विराजमान रहे साइमन पेरेज(1923-2016) युवाओं को सपने देखने के लिए प्रेरित करते थे और कहते थे कि मैंने बड़े सपने बहुत देर से देखे। वह आश्वस्त भाव से कहते थे कि सभी युद्धों का निष्कर्ष यही है कि हमें बेहतर लोगों की जरूरत है, बेहतर रायफलों की नहीं और आज शांति का कोई विकल्प नहीं है।  
      प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय