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हमें कर दिखाने का मौका तो दीजिए

लोगों को विश्वास ही नहीं होता था कि एक महिला सब-कलेक्टर कैसे? उन दिनों कलेक्टर को अक्सर लाठीचार्ज या गोली चलाने का फैसला लेना पड़ता था। पता नहीं, एक महिला ऐसे फैसले कैसे लेगी? ऐसे में, खुद को साबित...

हमें कर दिखाने का मौका तो दीजिए
Pankaj Tomarअन्ना राजम जॉर्ज, पहली महिला आईएएस अफसरSat, 13 Jan 2024 09:36 PM
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वह भी लाजवाब जमाना था, देश आजाद हो गया था। तब तोला भर सोने की अंगूठी के लिए करीब सौ रुपये लग जाते थे और आईएएस की परीक्षा में बैठने के लिए 140 रुपये का शुल्क चुकाना पड़ता था। बीस की हो चुकी वह मलयाली युवती क्लर्क की नौकरी करती थीं और तनख्वाह इतनी नहीं थी कि परीक्षा का फॉर्म भर सकें। वह सोचती थीं कि स्नातक करने के बावजूद क्या वह महज क्लर्क रह जाएंगी? नए आजाद हुए देश में सबसे बड़ी नौकरी के लिए प्रयास में क्या हर्ज है। एक बार संघ लोकसेवा आयोग की परीक्षा में बैठकर देखें, कुछ न होगा, तो तजुर्बा होगा।
आगे बढ़ने का इरादा पक्का था, तो कदम-कदम पर चुनौतियों से टकराना भी तय था। एक दोस्त की मम्मी ने फॉर्म भरने के पैसे दिए थे। युवती ने पहली ही बार में कामयाबी हासिल कर ली। साक्षात्कार का मौका आया, तो भारतीय प्रशासनिक सेवा में रहने का इरादा जताया। साक्षात्कार लेने बैठे आयोग के प्रमुख ने हतोत्साहित किया, ‘युवती हो, भारतीय प्रशासनिक सेवा में मुश्किल होगी, विदेश सेवा या केंद्रीय सेवाओं में से कोई चुन लो?’ पर वह अड़ गईं, प्रशासनिक सेवा में ही जाना है। आयोग के सभी सदस्य अचंभित थे कि बुरे से बुरे हालात देखने पड़ते हैं, कड़े से कड़े फैसले लेने पड़ते हैं, किसी लड़की से ये सब कैसे होगा? भला हो, महान संविधान निर्माताओं का, जिन्होंने देश में कानून बना दिया था कि रोजगार में लड़का-लड़की के बीच भेद नहीं किया जाएगा। लड़की अड़ गई, तभी वह देश की पहली आईएएस बनी और पहुंच गई अपने काडर प्रदेश तमिलनाडु। वहां मिल गए दिग्गज नेता और मुख्यमंत्री सी राजगोपालाचारी। आईएएस रूप में युवती को देख चौंक गए। यह कैसे सब-कलेक्टर, कलेक्टर बनेगी, कैसे फील्ड ड्यूटी में जाएगी? उन्होंने समझाया कि सचिवालय में कोई काम संभाल लो, जिला जाने की नौबत नहीं आएगी, पर यहां भी वह युवती अड गई- नहीं, मुझे आप किसी जिले में ही भेजिए, कृपया, भेदभाव न कीजिए। खैर, राजगोपालाचारी जी ने उन्हें अपने ही जिले होसूर में सब-कलेक्टर तैनात कर दिया। लोगों को विश्वास ही नहीं होता था कि एक महिला सब-कलेक्टर कैसे? उन दिनों कलेक्टर को अक्सर लाठीचार्ज या गोली चलाने का फैसला लेना पड़ता था। पता नहीं, एक महिला ऐसे फैसले कैसे लेगी? ऐसे में, खुद को साबित करना जरूरी था और मौके की तलाश थी। मौका जल्दी ही सामने आया। एक सुबह बंगले के बाहर शोर मच गया। बड़ी संख्या में ग्रामीण जमा हो गए। सब-कलेक्टर साहिबा जल्दी-जल्दी नहाकर निकलीं। छह हाथियों के एक समूह ने गांव पर हमला बोल दिया था, भगाए नहीं भाग रहे थे। ग्रामीणों को जब कुछ न सूझा, तो मदद के लिए सब-कलेक्टर के यहां पहुंच गए, पर सामने एक महिला को देख बड़े निराश हुए, यह कैसे फैसला लेंगी, कैसे समाधान करेंगी? 
पल भर के लिए सब-कलेक्टर भी स्तब्ध हो गईं, पर कुछ ही पल में उनके दिमाग ने काम करना शुरू किया। हाथियों पर गोली नहीं चलवा सकते, यह ठीक नहीं है। हालांकि, ऐसे मौकों पर जानवरों को मार गिराने का आदेश उन दिनों बहुत आम हुआ करता था। अचानक दिमाग में सूझा कि अगर शोर किया जाए, तो हाथी भाग सकते हैं। आदेश दिया कि जिसे जो मिले, जोर-जोर से बजाओ, सब मिलकर शोर करो। ग्रामीण टीन, बर्तन इत्यादि लेकर शोर करने लगे। वह भी ग्रामीणों के साथ शामिल हो गईं, हाथियों के दल का मुखिया शोर सुन दूर चल पड़ा। लोग खुश हुए, तो जोश और बढ़ गया। फिर क्या था, वे हाथियों को जंगल तक छोड़ आए। हाथियों की जान भी बच गई और ग्रामीणों की समस्या का भी समाधान हो गया। 
तब तमिलनाडु में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में इस खबर के साथ खुशी की लहर दौड़ गई कि एक कलेक्टर आई हैं अन्ना राजम जॉर्ज। सबने माना कि महिलाएं भी कलेक्टर के रूप में कारगर हो सकती हैं। महिलाओं की राह में रोडे़ बिछाने वाले तमाम पुरुषवादी अफसरों को भी एहसास हो गया कि आईएएस के रूप में महिलाओं की पदस्थापना गलत नहीं होगी। अन्ना को चेन्नई से नई दिल्ली तक प्रशासनिक सेवा में खूब मौके मिले और उन्होंने कभी निराश नहीं किया। अब हर साल दसियों युवतियों का चयन आईएएस के लिए होता है और अन्ना राजम जॉर्ज (1927-2018) की याद अनायास आती है। 
भूलना नहीं चाहिए कि अपने देश में एक समय वह भी था, जब अन्ना राजम जॉर्ज की सेवा शर्तों में यह शामिल था कि अगर वह विवाह कर लेंगी, तो उनकी नौकरी चली जाएगी। ऐसी नौबत न आई। अन्ना ने जल्दी ही खुद को काबिल साबित कर दिया और अविवाहित रहने की शर्त हमेशा के लिए इतिहास हो गई।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय 

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