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फिजूल की पिटाई से सच्ची पढ़ाई तक

वह उसी कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे, जहां पढ़ने के लिए भारत से भीमराव आंबेडकर गए थे। पूरे दो साल उन्होंने आंबेडकर को अपने सान्निध्य में रखा और सिखाया कि शिक्षा ही लोकतंत्र की नींव है...

फिजूल की पिटाई से सच्ची पढ़ाई तक
Pankaj Tomarजॉन डेवी, विख्यात शिक्षाविद्Sat, 13 Apr 2024 08:34 PM
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शिक्षा की शरण में जाना मनुष्य होने की सबसे बड़ी शर्त है। वैसे तो शिक्षा सिलसिला है, पर जिंदगी में सोचने-समझने की शुरुआत के समय ही शिक्षा यदि शुरू हो जाए, तो सोने पर सुहागा है। अपने गुजारे के लिए हर सुबह अखबार बांटने वाला वह किशोर भी सोने पर सुहागे की तलाश में ही स्कूल जाता था। अमेरिका में तब स्कूली व्यवस्था जर्जर थी, मुल्क गृह युद्ध में ही खर्च हो रहा था। मास्टर भी खासे रोष खाए रहते थे। कुछ मास्टर हरदम कोड़ा थामे हाथ साफ करने की फिराक में दिखते थे और कुछ ऐसे बच्चे भी थे, जो रोज पिटने के लिए ही शायद स्कूल आते थे। चवन्नी गलती पर सोलह आना पिटाई मामूली बात थी। 
हर बार कोडे़ से ज्यादा जुबान बरसती थी। सब मानते थे कि चलो शिक्षक हैं, तो कटु बोल सकते हैं। सीधे मूर्ख भी ठहरा सकते हैं, पर जब पिटाई होती, तब हर कोई तमाशे देखता था। ज्यादातर लोग दूसरे की पिटाई देख मंद-मंद मुस्काते थे, पर उस किशोर को पिटाई की व्यर्थता तब भी समझ में आने लगी थी।  
वह सीधा-सादा स्कूली किशोर बहुत बचकर रहता था। स्कूल में अच्छे अनुभव कम और बुरे अनुभव ज्यादा मिलते थे। पढ़ना अच्छा लगता था, नंबर भी अच्छे आते थे, पर स्कूल बिल्कुल नापसंद था। एक दिन तो हद हो गई, एक गरीब लड़के की जमकर पिटाई हो रही थी। शिक्षक बेचारे लड़के को ऐसे पीट रहे थे, मानो गृहयुद्ध लड़ रहे हों। सामंत स्वभाव के शिक्षक अपने अहंकार पर पड़ी किसी मामूली चोट का बदला ले रहे थे, पढ़ाई से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं था। वह लड़का भय और अपमान से थर्रा रहा था, उसकी सहमी आंखों से आंसू बहे जा रहे थे। कोई सुनवाई नहीं। लड़का बचाव में जब भी मुंह खोलता, तो मार शरीर पर और गहरे पड़ती। उस गरीब लड़के की पिटाई पर तब भी लोग मुस्करा रहे थे, पर यह संवेदनशील किशोर अंदर से रो रहा था। वह कमजोर था, वह चुप रह गया, क्योंकि अगर वह मुंह खोलता, तो वह भी बचने न पाता।  
स्कूल की यह त्रासद घटना मानो दिल में बस गई। पिटने वाला बच्चा तो कभी सामान्य नहीं हो पाएगा। शिक्षक, शिक्षा और स्कूल के प्रति जो सहज लगाव होना चाहिए, वह तो कभी नहीं हो पाएगा। दिल में गांठें रह गईं, कभी फिजूल डांट से, तो कभी बेरहम मार से। कौन रोके डांट और कौन रोके पिटाई? चिंतन की धारा बह निकली। शिक्षक शायद इसलिए पीटते थे कि एक ही बार में सुधार देंगे, पर शायद उन्हें पता नहीं था कि उन्होंने हमेशा के लिए कितना कुछ बिगाड़ दिया। पिटाई से सुधरने की गारंटी नहीं, पर बिगड़ जाना तय है और ऐसे बिगड़े माहौल में न जाने कितने स्कूल चल रहे हैं। बच्चों को स्कूलों में घसीट-घसीटकर, डरा-धमकाकर लाया जा रहा है। नहीं, शिक्षा का यह स्वरूप गलत है, एक नया स्वरूप गढ़ना होगा।
उस किशोर अर्थात जॉन डेवी ने स्नातक होने के बाद स्कूल में शिक्षक बनना मंजूर किया। बच्चों को बहुत प्रेम से पढ़ाना शुरू किया, पर दो वर्ष में ही एहसास हो गया कि शिक्षा में सुधार के लिए कुछ बड़ा करना होगा। स्कूल में पढ़ाते रहने से कुछ नहीं होगा। दार्शनिक बनना होगा, तभी बड़े पैमाने पर लोग बात सुनेंगे और सुधार होगा। स्कूल की पक्की नौकरी छोड़कर जॉन डेवी उच्च शिक्षा और शोध की दिशा में चल पड़े। शिक्षा सुधार के तमाम सुझावों, प्रयासों के साथ उन्होंने देश को प्रभावित किया। 
उन्होंने बताया कि ‘शिक्षा जीवन की तैयारी नहीं है, शिक्षा ही जीवन है। हम अनुभव से नहीं सीखते, हम अनुभव पर चिंतन से सीखते हैं। शिक्षा स्वयं कोई बनी-बनाई चीज नहीं है, बल्कि क्रिया के चयन के माध्यम से निरंतर बनते रहने वाली चीज है।’ शिक्षा की दुनिया में उनके नाम का डंका बजने लगा। वह उसी कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे, जहां पढ़ने के लिए भारत से भीमराव आंबेडकर गए थे। पूरे दो साल जॉन डेवी ने आंबेडकर को अपने सान्निध्य में रखा और सिखाया कि शिक्षा ही लोकतंत्र की नींव है। स्नेहिल स्वभाव के प्रोफेसर जॉन डेवी की शिक्षा आंबेडकर के बहुत काम आई। आंबेडकर ने बार-बार स्वीकार किया कि उन्हें बनाने में जॉन डेवी का बहुत योगदान है। जब भी आंबेडकर याद किए जाते हैं, जॉन डेवी भी याद आते हैं।
जॉन डेवी (1859-1952) कोड़े मारने वाले उस शिक्षक को भूल न पाए थे। उन्होंने शिक्षा सुधार के लिए बहुत काम किए, पर अभी भी उनका सपना साकार नहीं हुआ है, क्योंकि दुनिया के सारे बच्चे- सारे लोग अभी भी पूरा शिक्षित-जागरूक नहीं हुए हैं। शिक्षा अभी भी पूरी स्नेहिल नहीं हुई है। एक दिन आएगा, जब दुनिया के सभी स्कूलों में शिक्षक कक्षा में आते ही सीधे पढ़ाने नहीं लगेंगे, बच्चों को कुछ करने के लिए देंगे और बच्चे कुछ-कुछ करते हुए ही सच्ची शिक्षा पाएंगे।
  प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय