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Hindi News ओपिनियन मेरी कहानीजब गम, गुस्से और गुहार से भरी मां

जब गम, गुस्से और गुहार से भरी मां

सुनकर दिल और बैठ गया था। तब दुख और रोष की गठरी बनी मां ने सबसे कहा था, उस ड्राइवर को मत छोड़ना, जिसकी वजह से मेरे आंगन ने अपनी प्यारी चिड़िया को हमेशा के लिए खो दिया, जिसने मेरे चहचहाते संसार को...

जब गम, गुस्से और गुहार से भरी मां
Monika Minalकैडेस लाइटनर, समाजसेवीSat, 11 May 2024 09:01 PM
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मां के मन को ईश्वर ही जानते हैं। मां की ममता का विस्तार वहां तक जाता है, जिसकी कोई थाह नहीं है। मां ऐसे खतरों के प्रति भी सचेत रहती है, जो शायद कभी नहीं आते। बच्चे की हिचकी से जमीन पर कदम रखने तक और गोद से उतरकर कदम जमाते कुछ दूर जाने पर मां को कैसा महसूस होता है, सिर्फ वही जानती है, पर यहां तो इस मां की एक बच्ची कुछ कदम नहीं, बल्कि इतनी दूर चली गई कि जहां से कोई नहीं लौटता। मन में दर्द के ज्वार उमड़ते हैं और मां बेचैन-बावली हो उठती है। 
वह मां सोचती रहती है कि मेरी बच्ची का भला क्या दोष था? वह तो सड़क किनारे चुपचाप मस्त चली जा रही थी, पर पीछे से एक गाड़ी आई और 125 फीट दूर घसीटती ले गई। क्या ड्राइवर इतना बेहोश था कि सड़क से किनारे साइकिल पथ पर गाड़ी दौड़ाने लगा? लोगों ने बताया था कि ड्राइवर नशे में था? नशे ने ही सब तबाह कर दिया? वह मां भागती-हांफती घर पहुंची थी, किसी ने बताया था कि ‘हमने कैरी को खो दिया।’ मां ने विश्वास के साथ कहा था, ‘नहीं-नहीं ऐसी बात नहीं है, वह कहीं पड़ोस में गई होगी, हम उसे खोज लेंगे।’ तब उस मां को दोटूक बताया गया था कि ‘तुम्हारी बच्ची कैरी अब दुनिया में नहीं रही, एक कार ने टक्कर मार दी, वह चल बसी, अब न लौटेगी?’ यह सुनकर मानो अंधकार टूट पड़ा था, बदहवासी सी छा गई थी। जब कुछ होश आया, तो मन हुआ कि बच्ची के अंग अगर किसी के काम आ जाएं, तब चिकित्सकों ने बताया था, ‘माफ कीजिएगा, दुर्घटना में एक भी अंग सलामत नहीं बचा।’ 
यह सुनकर दिल और बैठ गया था। तब दुख और रोष की गठरी बनी मां ने सबसे कहा था, उस ड्राइवर को मत छोड़ना, जिसकी वजह से मेरे आंगन ने अपनी प्यारी चिड़िया को हमेशा के लिए खो दिया, जिसने मेरे चहचहाते संसार को हाहाकार से भर दिया। उस अपराधी को न छोड़ना? 
मन न मानता था, वह मां अक्सर उस जगह से गुजरती थीं, जहां बच्ची के साथ दुर्घटना घटी थी और उस दिन वहां पुलिस वाले जांच में जुटे थे। सवाल से सराबोर वह मां वहीं रुक गईं, तो पता चला कि दोषी ड्राइवर खुलेआम घूम रहा है, जमानत मिल गई है, उसके जेल जाने की आगे भी कोई संभावना नहीं है। और तो और, यह भी पता चला कि वह शराबी आदतन दुर्घटनाओं को अंजाम देता रहा है। यह दुर्घटना तो उसके खिलाफ चौथा दर्ज मामला है और वह कुछ ही दिनों पहले जमानत पर छूटा है। वह इस बार अपने घर में तीन दिन शराब पीने के बाद कार से तफरी करने निकला था। उसने एक मासूम की जान ले ली, पर उसका बाल भी बांका न होगा। पुलिस वालों ने ही बताया था कि क्या करें, कानून ही ऐसा है कि सड़क दुर्घटना में सजा नहीं होती, नशे में धुत गाड़ी चलाना आम बात है। मासूम लोग सड़क पर रोज ही मारे जाते हैं। 
यह सब जानकर उस मां का दिल सिर्फ रोया नहीं, गुस्से से उफन पड़ा। ठान लिया कि ऐसे अपराधियों को कतई छोड़ना नहीं है। ये रोज न जाने कितनी माओं की गोद सूनी करते हैं, ये सड़क पर ही नहीं, बल्कि सभ्य समाज में भी चलने लायक नहीं हैं। ऐसे लोगों को इनके ठिकाने पहुंचाना ही होगा। गुस्से और जुनून से लैस उस विरल मां कैंडेस लाइटनर पर अमेरिका की निगाह पड़ी।लाइटनर ने देश में सबसे अधिक बार होने वाले इस जुर्म के बारे में व्यवस्था और सामाजिक स्वीकृति के प्रचलित रवैये को बदलने के लिए बगावत का बिगुल बजा दिया। वह घर से निकल पड़ीं और ‘मदर्स अगेंस्ट ड्रंक ड्राइविंग’ अभियान की शुरुआत की। उन्होंने न केवल नशे में गाड़ी चलाने को सामाजिक रूप से अस्वीकार्य बनाने वाले आंदोलन का नेतृत्व किया, बल्कि पीड़ितों की अग्रणी वकील भी बन गईं। उन्होंने पीड़ितों और दुर्घटना में बाल-बाल बचे लोगों को सिखाया कि अदालत में न्याय के लिए कैसे लड़ना है। अमेरिका की संसद में भी उन्हें ध्यान से सुना गया। दोषियों को कठघरे में खड़ा करने के लिए और सड़कों पर इंसानियत की बहाली के लिए अमेरिकी राज्यों और देश में 100 से ज्यादा कानून बनाए गए या बदले गए। एक मां ने अनगिनत माओं के साथ मिलकर देश का मिजाज बदल दिया। उनका अभियान दूसरे देशों में भी फैला। अकेले अमेरिका में उन्हें चार लाख से ज्यादा लोगों की जान बचाने का श्रेय दिया जाता है। वहां शराबी हत्यारों को चार साल से 30 साल तक सुनिश्चित सजा होती है। इन मां की संस्था के पास बीस लाख से अधिक सदस्य हैं और करोड़ों रुपये का कोष है। अद्भुत मां कैंडेस लाइटनर को बीसवीं सदी के सबसे प्रभावशाली अमेरिकी नागरिकों में शुमार किया जाता है। उन्हें राष्ट्र की अंतरात्मा और आंदोलनों की जननी भी कहा जाता है। 
  प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय