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Hindi News ओपिनियन मेरी कहानीजब मां को कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा

जब मां को कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा

ग्राहम बेल की 1922 में मौत हुई। जब उन्हें कब्र में उतारा गया, तब उनके सम्मान में दुनिया के करीब डेढ़ करोड़ फोन कुछ देर के लिए शांत कर दिए गए। आज दुनिया में चार अरब से भी ज्यादा फोन हैं, जो ग्राहम बेल ..

जब मां को कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा
Monika Minalअलेक्जेंडर ग्राहम बेल, टेलीफोन आविष्कारकSat, 09 Mar 2024 10:29 PM
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वह मां बहुत ऊंचा सुनती थीं। सुनने की ऊंचाई समय के साथ बढ़ती ही चली जा रही थी। पहले लगता था कि समय के साथ उनके सुनने की ऊंचाई कम होगी, पर ऐसा नहीं हुआ। मां ऊंचा सुनते हुए दूर जाने लगीं। कभी लगता कि मां को अगर कुछ न सुनाई देगा, तब क्या होगा? और भी चाचियां थीं, सब कान खुले रखती थीं, उनके बच्चे फुसफुसाते भी थे, तो सुन लेती थीं, पर इस बच्चे की मां सिर्फ मुस्कराती थीं। सबको ठीक से सुनकर नहीं, बल्कि सबको आस-पास देखकर ही खुश रहती थीं। वह बच्चा अक्सर दुखी हो जाता कि मां जब ऊंचा सुनने की सीमा लांघ जाएंगी, तब क्या होगा? खैर, एक दिन ऐसा ही हुआ, वह बच्चा तब महज 12 साल का था, मां के कानों ने पूरी तरह जवाब दे दिया। मां सिर्फ निगाह, स्पर्श और सेवा में सिमट गईं। 
आखिर ऐसा क्यों हुआ? मां आवाज से क्यों रूठ गईं या आवाज ने मां का साथ क्यों छोड़ दिया? वह किशोर दिलो-जान से सोचने लगा, आखिर मां तक कोई आवाज कैसे पहुंचेगी? डॉक्टर तो बोलते हैं कि बहरेपन का कोई इलाज नहीं, पर क्या कोई ऐसा यंत्र बनाया जा सकता है कि बहरे लोगों के दिमाग तक किसी आवाज को पहुंचाया जा सके। मां की मजबूरी ने उस किशोर को ध्वनि विज्ञान या ध्वनिकी की ओर प्रेरित किया। भौतिकी की ही शाखा ध्वनिकी के बारे में उसने ज्ञान हासिल करना शुरू कर दिया। पढ़ाई में दिल नहीं लगता था, पर विज्ञान में धड़कता था। पिता गूंगे-बहरे लोगों को पढ़ाया करते थे। सांकेतिक भाषा में पारंगत थे, तो उस पुत्र ने भी पिता से ज्ञान हासिल किया और लग गए समाज सेवा में। साथ में ध्वनि विज्ञान के प्रयोगों का सिलसिला चलता रहा। कैसे गैस या तरल या ठोस पदार्थों से भी ध्वनि संचार हो सकता है? ध्वनियों को कैसे यांत्रिक तरंगों में बदला जा सकता है और यांत्रिक तरंगों को कैसे पुन: ध्वनि में बदला जा सकता है? तब दुनिया में कुछ दूसरे वैज्ञानिक भी ऐसे ही उपकरण बनाने में लगे थे।
तब टेलीग्राफ चलन में आ चुका था, शब्दों का आदान-प्रदान दो दशक पहले ही मुमकिन हो गया था। चुनौती यही थी कि ध्वनि का संचार कैसे किया जाए? आखिरकार, इंसानों की कामयाबी का वह महत्वपूर्ण मुकाम भी आया। 10 मार्च, 1876 को उस युवा वैज्ञानिक अलेक्जेंडर ग्राहम बेल ने एक माइक में जोर से चिल्लाकर अपने वैज्ञानिक मित्र से कहा, ‘मिस्टर वॉटसन, यहां आओ, मैं तुम्हें देखना चाहता हूं।’ कुछ दूर अलग जगह बैठे वॉटसन सुनकर दौड़े चले आए और ग्राहम बेल को बताया, ‘तुमने जो कहा, वह मुझे साफ-साफ सुनाई दिया।’ यह संसार की पहली एकतरफा टेलीफोन वार्ता थी। अगले साल जब बेल टेलीफोन कंपनी की स्थापना हुई, तो ब्राजील के सम्राट ने भी कंपनी के शेयर चाव से खरीदे और वह दुनिया के उन शुरुआती लोगों में शामिल हुए, जिनके घर टेलीफोन लगा। कंपनी चल निकली और टेलीफोन में दिनों-दिन सुधार आता गया। 
फिर एक दिन वह भी आया, जब पहली अंतर-महादेशीय कॉल संभव हुई। 25 जनवरी, 1915 को बेल ने ही पहला अंतर-महादेशीय टेलीफोन कॉल किया। बेल ने टेलीफोन के माइक में अपने प्रसिद्ध अनुरोध को दोहराया, ‘मिस्टर वॉटसन, यहां आओ, मैं तुम्हें देखना चाहता हूं।’ करीब 5,500 किलोमीटर दूर से वॉटसन ने जवाब दिया, ‘वहां पहुंचने में मुझे पांच दिन लगेंगे।’ उस समय इस कॉल को जुड़़ने में पूरे दस मिनट लगे थे, चालीस हजार रुपये से ज्यादा खर्च हुए थे, पर अब चार सेकंड से भी कम समय और चार रुपये से भी कम खर्च में कॉल संभव है। फोन ही नहीं, फोटोफोन का भी उन्होंने ही आविष्कार किया, जिस पर बाद में लेजर और फाइबर ऑप्टिक संचार प्रणालियां साकार हुईं। उन्होंने मेटल डिटेक्टर का भी आविष्कार किया और हवाई जहाज के निर्माण में भी खूब योगदान दिया। 
विडंबना देखिए, ध्वनि की दुनिया में कमाल दिखाने वाले अलेक्जेंडर ग्राहम बेल (1847-1922) की मां ही नहीं, बल्कि पत्नी भी बहरी थीं। उन्होंने अपना अधिकांश समय मूक-बधिरों, दृष्टिबाधितों की सेवा में लगाया और अनेक मजबूर लोगों को मजबूती के शिखर पर पहुंचा दिया। इन्हीं में से एक थीं विश्व प्रसिद्ध हेलेन केलर, जो 19 महीने की उम्र में ही अंधी और गूंगी हो गई थीं। केलर ने अपनी आत्मकथा ग्राहम बेल को समर्पित करते हुए लिखा है, ‘उन्होंने ही वह दरवाजा खोला, जिससे होकर मैं अंधेरे से प्रकाश की ओर आई।’ 
ग्राहम बेल की 1922 में मौत हुई। जब उन्हें कब्र में उतारा गया, तब उनके सम्मान में दुनिया के करीब डेढ़ करोड़ फोन कुछ देर के लिए शांत कर दिए गए। आज दुनिया में चार अरब से भी ज्यादा फोन हैं, जो ग्राहम बेल का सम्मान बढ़ाए जा रहे हैं। 
  प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय