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मजबूर नौकरानी से एक राष्ट्र नायक तक

दूसरे बच्चे भी जान बचाए सड़कों पर चीखते-रोते भाग रहे थे। वह यह सोचती हुई भाग रही थी कि हम बच्चों ने भला क्या बिगाड़ा है? काश, दुनिया में ऐसी नफरत न होती, तो बच्चों से सभी लोग प्यार करते। बच्चों से...

मजबूर नौकरानी से एक राष्ट्र नायक तक
Pankaj Tomarजोसेफिन बेकर, कलाकार और समाजसेवीSun, 10 Dec 2023 12:49 AM
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बर्बरता के अनगिनत जंगलों से होकर दुनिया यहां तक पहुंची है। जो अमेरिका आज दुनिया भर में मानवाधिकार के कागज बांटता है, वहां कभी श्वेतों ने अश्वेतों का जीना मुहाल कर रखा था। अमेरिका में कुछ इलाके तो इतने बदनाम थे कि दंगा छिड़ते ही अश्वेतों को अपने घर-डेरे से भागकर कहीं छिपना पड़ता था। एक ऐसा ही इलाका था पूर्वी सेंट लुइस, जहां एक अश्वेत लड़की घरेलू नौकरानी का काम करती थी। न पिता का कोई ठिकाना था और न मां को बेटी की कोई चिंता थी। महज आठ की उम्र में ही अपने लिए रोटी कमाने की जिम्मेदारी उसके सिर पर लद गई थी। काम लेने वाले चौबीस घंटे काम लेते थे और छोटी-छोटी गलतियों पर भी खूब पीटते थे। वह अपने लिए रोटी कमाते 11 साल की हो गई थी। अक्सर दोनों हाथ काम में लगे रहते, कभी कपडे़ धोते हुए, तो कभी कपड़े सहेजते हुए और नजरें स्कूल की खुली किताब की ओर चली जाती थीं। पढ़ने का खूब मन करता था। वह सोचती थी, काश! उसके भी माता-पिता होते, वह स्कूल जाती, अच्छी जिंदगी जीती। 

उस दिन हाथ में कुछ ज्यादा ही दर्द हो रहा था, उसे मालकिन ने जला दिया था, क्योंकि कपड़े धोने में कुछ ज्यादा साबुन लग गया था। अब एक तरफ पूरे घर का काम था, दूसरी ओर, स्कूल की पढ़ाई और तीसरी ओर, हाथ का दर्द और जलन। तभी फिर एक बार पूर्वी सेंट लुइस में शोर मच गया था। श्वेत शायद फिर बर्बरता पर उतर आए थे, अश्वेत जान बचाने के लिए बदहवास भागे चले जा रहे थे। उस लड़की ने काम रोककर खिड़की से देखा, नीग्रो लोगों के घर फूंक दिए गए थे। आसमान धुएं से भरने लगा था। जान बचाने के लिए सब भाग रहे थे, श्वेत मालिकों के घरों से भी अश्वेतों को खोज-खोजकर निकाला और मारा जा रहा था। हैवानियत का गजब मंजर था, वह लड़की भी भाग खड़ी हुई, कोई तो ऐसी जगह होगी, जहां वह मुंह छिपा लेगी। दूसरे बच्चे भी जान बचाए सड़कों पर चीखते-रोते भाग रहे थे। वह यह सोचती हुई भाग रही थी कि हम बच्चों ने भला क्या बिगाड़ा है? बच्चों को तो बख्श दो। काश! दुनिया में ऐसी नफरत न होती, तो बच्चों से सभी लोग प्यार करते। बच्चों से प्यार करते, तो किसी भी प्रकार की हिंसा से बच जाते।   
खैर, दंगा तो थम गया, पर दिल को हमेशा के लिए दर्द दे गया। वह बहुत बुरा दिन था और बेहद स्याह रात, पास बहती मिसिसिपी नदी के चमकदार जल में भी किसी महिला या बच्चे की चीख-पुकार घुली-मिली सी लगती थी। पूर्वी सेंट लुइस से उस बच्ची का मन उचट गया। अगर किस्मत में अपनी मेहनत पर ही गुजारा लिखा है, तो कहीं और, ठीक जगह चला जाए। जिंदगी ने मौका दिया, वह न्यूयॉर्क चली गई, सड़कों पर ही रहती, सड़कों पर ही नाचती, कुछ पैसे मिल जाते। बाद में नृत्य मंडलियों के साथ जुड़ गई। वह समझ गई कि मंच पर चढ़ना भर काफी नहीं है, मंच पर सभी को नजर आना ज्यादा जरूरी है। फिर क्या था, मंच पर वह कुछ ऐसा करने लगी कि सबका ध्यान खींचने लगी, लोग उन्हें जोसेफिन बेकर नाम से जानने लगे। फिर एक दिन कलाओं की नगरी पेरिस ने बुला लिया। 

उदार पेरिस ने नए अश्वेत कलाकार को हाथों-हाथ लिया। वह बहुत तेज नाचती थीं, मानो अगली बार कोई नाचने न देगा। उन्होंने फिल्मों में भी काम किया। सड़क से उठकर महलों में पहुंच गईं। दुनिया के पहले अश्वेत सितारों में गिनी गईं। द्वितीय विश्व युद्ध के समय नाजियों ने जब आतंक मचाया, तब वह अन्याय के खिलाफ जासूस बन गईं। युद्ध के बाद उनका सम्मान बहुत बढ़ गया। बडे़-बड़े लोग उनके नृत्य, गायन के मुरीद हुए, पर बर्बर अमेरिका उनकी आंखों से ओझल नहीं होता था। एक मौका आया, जब 1963 में उन्होंने मार्टिन लूथर किंग जूनियर के पक्ष में वाशिंगटन की प्रसिद्ध सभा में भाषण दिया। अश्वेतों पर जुल्म के खिलाफ बेकर (1906-1975) उस सभा में एकमात्र महिला वक्ता थीं। उन्होंने कहा था, ‘मैं राजाओं-रानियों के महलों और राष्ट्रपतियों के घरों में गई हूं, लेकिन अमेरिका के किसी होटल में जाकर एक कप कॉफी नहीं पी सकी। यह सोचकर मैं पागल सी हो जाती हूं। गुस्सा आ जाता है, तो आप जानते हैं, मैं अपना बड़ा मुंह खोल देती हूं और फिर देखिए, जब जोसेफिन अपना मुंह खोल देती है, तो पूरी दुनिया सुनती है।’
वह जर्मनी के चंद रत्नों या राष्ट्र नायकों में शुमार हैं। उन्हें बच्चों से इतना प्यार था कि अलग-अलग धर्म और अलग-अलग नस्ल के 12 बच्चों को उन्होंने गोद ले रखा था, एक ऐसा परिवार बना रखा था, जिसे वह ‘द रेनबो ट्राइब’ कहती थीं। दुनिया 10 दिसंबर को जब भी मानवाधिकार दिवस मनाती है, जोसेफिन बेकर को जरूर याद किया जाता है। 
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय 

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