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21 सितम्बर, 2020|7:42|IST

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तबाही का फरमान लिए वह उड़ान

वह विमान तबाही का सामान लिए जापान की ओर उड़ा जा रहा था। तियनयन द्वीप से रात तीन बजे से पहले ही उड़ान निकल चली थी। मंजिल लगभग छह घंटे दूर थी। जितनी तेजी से विमान उड़ रहा था, उससे कहीं ज्यादा तेजी से वक्त भाग रहा था। उस विमान में एक बम था ‘लिटिल ब्वॉय’ 4,400 किलोग्राम का, जिसमें 64 किलोग्राम यूरेनियम था। उस विमान के अगल-बगल दो अन्य साथी विमान भी उडे़ जा रहे थे। सारे पायलट जानते थे कि बम गिराना क्या होता है, लेकिन कोई नहीं जानता था कि एटम बम गिरेगा, तब क्या होगा? मुख्य पायलट 29 वर्षीय पॉल टिब्बेट्स का दिमाग तेजी से काम कर रहा था। पूरा ध्यान अभियान की कामयाबी पर लगा था। वह बीच-बीच में सोचते थे कि फरमान है, बम गिराना है, तो फिर क्या सोचना? नीचे बहुत लोग मारे जाएंगे, जो सैनिक नहीं होंगे, लेकिन उनके बारे में सोचना मेरा काम नहीं। मैं बम बरसाने वाला पायलट हूं, मुझे यही सिखाया गया है। दिए गए टारगेट को तबाह कर दो और मैं वही करने जा रहा हूं। 

लगभग 32 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहे विमान में पॉल ने तत्काल घोषणा कर दी थी कि ‘दोस्तो, हम दुनिया का पहला एटम बम गिराने जा रहे हैं’। सब साथियों ने अपनी-अपनी तय जिम्मेदारी और काम को फिर जांच लिया, ताकि हमले में कोई कसर न रह जाए। इंसान कितना भी कठोर हो, भावनाओं का संचार तो उसमें कमोबेश होता ही है। यह भावना ही तो है कि जिस विमान में ‘लिटिल ब्वॉय’ नाम का एटम बम सवार है, उसका नाम पॉल टिब्बेट्स ने अपनी मां इनोला गे के नाम पर रखा है। वही मां, जिन्होंने हमेशा मजबूती का सबक सिखाया और यह भरोसा भी कि तुम जो करोगे, अच्छा करोगे। जमीन से इतनी ऊंचाई पर उड़ने का सुख मां की मदद से ही नसीब हुआ, पिता तो डॉक्टर बनाना चाहते थे। पॉल ने एक साल डॉक्टरी की पढ़ाई भी की थी। लेकिन अभी इनोला गे को उड़ाते हुए उनके दिमाग में एक पुराना वाकया ताजा हो गया। मेडिकल कॉलेज में एक डॉक्टर रूममेट थे, उन्होंने बताया था कि उनके अनेक साथी डॉक्टरी की पढ़ाई में शुरू में ही फेल होकर मादक द्रव्यों के काले कारोबार में जा लगे थे। वे फेल इसलिए हुए थे, क्योंकि उन्हें अपने मरीजों से बहुत सहानुभूति थी। इस वजह से उनकी योग्यता नष्ट हो गई, वे चिकित्सकीय जरूरतों को पूरा करने में नाकाम रहे। 

इस वाकये को याद करते हुए विमान की गति और बढ़ गई। पॉल सोचने लगे, नैतिकता मेरा विषय नहीं है और फिर युद्ध में कैसी नैतिकता? मैं जो कर रहा हूं, वह आदेश की पालना है। मेरी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि आदेश की पालना करूं। फैसला जिन लोगों को लेना है, ले चुके हैं। अभी युद्ध में इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप जो बम गिराने वाले हैं, वह एटम बम है या 100 किलो का कोई अन्य बम। युद्ध में आप राइफल चला रहे हों, तो क्या नैतिकता की परवाह करेंगे? पॉल के दिमाग में यह बात भी आई कि द्वितीय विश्व युद्ध को खत्म करना है और उसके लिए मुख्य दुश्मन पर अकल्पनीय प्रहार की जरूरत है। यहां लोग भले मरेंगे, लेकिन उनसे कहीं ज्यादा लोगों की जान बचेगी, क्योंकि महायुद्ध यहीं खत्म हो जाएगा। 

सोचते-सोचते विमान मंजिल पर पहुंच गया। तब घड़ी सुबह के नौ बजा रही थी। हिरोशिमा में लोग जागकर अपने-अपने काम में लगे थे और ऊपर से लिटिल ब्वॉय को छोड़ दिया गया। तीनों विमान लगभग यू टर्न लेते हुए तेजी से लौटे। करीब पचास सेकंड बाद लिटिल ब्वॉय फटा। हिरोशिमा पर अनदेखी तबाही का बेहद चमकीला, रंगीन, भीमकाय मशरूम खिल उठा। परमाणु रिएक्शन से हजारों टन ऊर्जा प्रवाहित हुई, आग और गुबार का बवंडर चल पड़ा। एक धमाका और फिर कई धमाके इतने जोरदार थे कि हिरोशिमा से 15 मील से भी दूर निकल चुके इनोला गे में बैठे पॉल टिब्बेट्स को भी महसूस हुए। 

यही वह लम्हा था, जिसने पॉल टिब्बेट्स (1915-2007) ही नहीं, पूरी दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया। कुछ दिनों बाद पॉल व उनके वरिष्ठों को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रुमन ने मिलने बुलाया। सबसे बात करने के बाद ट्रुमन दस सेकंड तक पॉल को देखते रहे, फिर पूछा, ‘तुम क्या सोचते हो?’ पॉल ने कहा, ‘मिस्टर प्रेसिडेंट, मैं सोचता हूं, मैंने वही किया, जो मुझे कहा गया’। राष्ट्रपति ने हाथ से मेज ठोककर कहा, ‘तुम बिल्कुल सही हो, तुमने किया, और मैं वही शख्स हूं, जिसने तुम्हें भेजा था। इस बारे में जब भी तुम्हें कोई मुश्किल में डाले, मेरे पास भेज देना’। यह जो अमेरिकी दृढ़ता थी, उसके पीछे उन लम्हों का भय भी था, उसी का नतीजा है, पहले और दूसरे परमाणु बम के बाद तीसरे का खतरा दुनिया ने आज तक नहीं उठाया है, 75 साल हो गए।  
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

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  • Web Title:hindustan meri kahani column 09 august 2020