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20 अप्रैल, 2021|10:11|IST

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जज्बा और जुनून की मिसाल

एक छोटा सा घाव भी हो जाए, तो लगता है, मानो तन और मन, दोनों वहां से रिस रहा है। लेकिन यहां जब होश लौटा, तो पता चला, दाहिने हाथ की उंगलियां नहीं हैं। आह, हथेली भी नहीं है और कलाई भी। लगता था, कोई सबसे मजबूत और कुशल भुजा उखाड़ ले गया हो। वहां से कभी तन-बल ज्यादा रिसता, तो कभी मनोबल बह निकलता। बिस्तर पर लेटे-लेटे तन और मन, दोनों अक्सर उंगलियों, हथेलियों की खोज में लग जाते। याद आने लगता वह काला दिन, सैन्य शिविर, साथियों के साथ प्रशिक्षण, पिन खोलते ही एक खराब हथगोले का दाहिनी हथेली पर धमाका और सब खामोश-खत्म। पूरे हंगरी देश में अफसोस का एक साया उमड़ आया था कि ओह, उस स्वर्णिम हाथ को हथगोले ने उड़ा दिया, जिसे ओलंपिक में निशानेबाजी में स्वर्ण जीतना था। वैसे तो हथगोले कम ही खराब होते हैं, पर उस हथगोले को क्या उसी हथेली पर फूटना था, जिस हथेली से देश को उम्मीदें थीं? जो भी सुनता था, बेहिसाब गम जाहिर करता था। अस्पताल में मिलने आने वाले भी मुंह लटकाए आते थे और वैसे ही जाते थे। अस्पताल का सन्नाटा जैसे चीख रहा था, अब कुछ नहीं हो सकता। गया एक खिलाड़ी का जीवन निराशा के गर्त में, शायद उसके भाग्य में ही नहीं था। ओलंपिक खेलों का आयोजन महज दो साल दूर रह गया था। हंगरी के इस चैंपियन निशानेबाज का पदक जीतना तय माना जा रहा था, मगर एक खराब हथगोले ने सब लूट लिया।
यही वह लम्हा था, जब निराशा और अफसोस से घिरे उस पिस्टल निशानेबाज सैन्य सार्जेंट ने अस्पताल में बिस्तर पर पड़े-पडे़ सोचा, क्या अब वह ओलंपिक में भाग नहीं ले सकता? क्या स्वर्ण नहीं जीत सकता? क्या हो गया, एक हाथ ही तो गया है, दूसरा तो है बिल्कुल दुरुस्त? अभी हसरतें भी जिंदा हैं और ख्वाब भी बरकरार। वह अब भी जीत सकता है, क्यों नहीं? मन की पूरी भावभूमि पर यही सवाल गूंजने लगा, क्यों नहीं, क्यों नहीं? हमेशा के लिए चले गए हाथ के लिए अफसोस करने बैठें या खराब हथगोले के वास्ते सरकार से लड़ें, वक्त ही जाया होना है। बात तो तब है, जब ओलंपिक में मिला पदक इस गले में झूले, जो एकदम सलामत है। मैं जिंदा हूं, मेरा नाम है, ख्वाब है, मैं अभी भी जीत सकता हूं, क्यों नहीं? अपने दिल में पूरी जिद के साथ कैरोली टकास अस्पताल से बाहर आए और उस बाएं हाथ को पिस्तौल थमा दी, जिसमें पांचों उंगलियां मुकम्मल थीं, हथेली और कलाई भी। तब शुरू हुई हौसले की उड़ान। ऐसे लोग बहुत होते हैं, जो आसानी से हार मान लेते हैं और फिर किसी न किसी बहाने की आड़ में छिपने लगते हैं, पर बहुत कम ऐसे होते हैं, जो तमाम मुश्किलों के बीच हल की तलाश करते हैं। और कामयाब भी वही होते हैं, जो समाधान खोज लेते हैं। फिक्र यह नहीं कि हमने क्या गंवा दिया। असली उत्सव तो इसका है, जो हमारे पास है। कहते हैं, देह उसी तरह ढल जाती है, जैसा दिल चाहता है और कैरोली की देह के साथ भी ऐसा ही हुआ।
हादसे के ठीक एक साल बाद राष्ट्रीय चैंपियनशिप का आयोजन हो रहा था, जहां कैरोली (1910-1976) को देखकर उनके नए-पुराने प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी बड़े खुश हुए। सबको लगा कि कैरोली खेल देखने और बाकी खिलाड़ियों का हौसला बढ़ाने आए हैं, लेकिन कैरोली ने जल्दी ही यह बता दिया कि वह हौसला बढ़ाने नहीं, बल्कि मुकाबला करने आए हैं। किसी को अंदाजा नहीं था कि कैरोली कैसे मुकाबला करेंगे, उनका स्वर्णिम हाथ तो जा चुका है, अपने कमजोर या बाएं हाथ से भी कोई नेशनल चैंपियन बनता है क्या? वहां कैरोली ने सबको झुठलाकर खुद को साबित कर दिया। वह दाएं हाथ से भी चैंपियन थे और बाएं हाथ से भी। उन्होंने बता दिया कि बायां या दायां कुछ नहीं होता, जो कुछ होता है आदमी का जज्बा और जुनून होता है। दरअसल, हादसा और चैंपियनशिप के बीच जो साल भर का समय था, उसे कैरोली ने पूरी तरह से अभ्यास के हवाले कर दिया था। नेशनल चैंपियन होने के बाद ओलंपिक ही अगला पड़ाव था, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के कारण पहले 1940 और फिर 1944 के ओलंपिक खेल रद्द हो गए। कैरोली बाएं हाथ को अभ्यास में लगाए हुए ओलंपिक का इंतजार कर रहे थे। आखिरकार, 1948 में वह ओलंपिक में स्वर्ण जीतने वाले पहले ऐसे खिलाड़ी बने, जिनका शरीर अधूरा था। उनकी जीत तुक्का न थी, क्योंकि 1952 के ओलंपिक में भी उन्होंने अपनी प्रतियोगिता 25 मीटर रैपिड-फायर पिस्टल में सभी प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ दिया। न जाने कितने रिकॉर्ड उनके नाम से दर्ज हैं और उनकी जीती जागती नसीहत भी कि कभी अफसोस मत करो, अभ्यास करो, ताकि जीत तुम्हारे कदम चूमे।  
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

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  • Web Title:hindustan meri kahani column 07 february 2021