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5 दिसंबर, 2020|11:02|IST

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संस्कृत का वह जर्मन दीवाना

संस्कृत का वह जर्मन दीवाना लंदन में रहमोकरम पर टिका था। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वहां आराम से रहकर शोध कर सके। बमुश्किल पानी के जहाज पर बैठ पहली बार सागर दर्शन करते लंदन पहुंचा था। सुन रखा था, लंदन की लाइब्रेरी में संस्कृत की पोथियों के दर्शन होंगे। साल 1846 चल रहा था। संस्कृत के देश भारत पर ब्रिटिश व्यापारियों की ईस्ट इंडिया कंपनी राज कर रही थी और यूरोप में सबको पता था, यह कंपनी भारत से बहुमूल्य चीजें ब्रिटेन लाया करती है और उनमें संस्कृत की पुरानी पोथियां भी शामिल हैं। लंदन में एक पखवाड़े तक रहने की उम्मीद में वह आया था, लेकिन लीडेनहॉल स्ट्रीट स्थित लाइब्रेरी में शोध करते महीना बीत गया, काम ही ऐसा था कि मंजिल लगातार दूर नजर आती थी। संस्कृत का एक टुकड़ा गद्य-पद्य भी कहीं दिख जाता, तो उसे समझने में घंटों लगते थे, लेकिन एक अलग ही आनंद मिलता था कि हम कुछ ऐसा जानते हैं, जो आसपास के तमाम लोगों के लिए बिल्कुल नया है। 
लंदन में कदम रखते जेब में पखवाड़े भर का पैसा था, लेकिन लोगों की मदद से किसी तरह से महीना खिंच गया। अब आगे कैसे टिकें? लेकिन अभी तक जिन लोगों ने परोक्ष रूप से मदद की है, उनका आभार तो जरूर जताना चाहिए। जिस दिन खाने के लाले पड़ेंगे, उस दिन लौट चलेंगे जर्मनी, लेकिन तब तक संस्कृत में कुछ और जान लेते हैं। न जाने कब लौटना पड़े, उससे पहले ही मददगारों से मिल लेना चाहिए। ऐसे ही एक मददगार थे तत्कालीन प्रशियाई साम्राज्य के जर्मन मूल के कूटनीतिज्ञ बेरोन बनसेन। उस युवा ने सोचा, राजदूत हैं, बडे़ आदमी हैं, मिल आना सभ्यता होगी। विद्वान बेरोन बनसेन बहुत गर्मजोशी से मिले। उम्मीद नहीं थी कि इतनी बड़ी हस्ती एक सामान्य युवा से ऐसे मिलेगी। बनसेन को पता था, यह युवा संस्कृत में कुछ खोज रहा है। बात निकली, तो ऋग्वेद  की चर्चा हुई। बनसेन ने बताया कि युवा दिनों में उनका एक सपना था, भारत जाना और ऋग्वेद देखना, पढ़ना-समझना, लेकिन काम में ऐसे लगना हुआ कि यूरोप में ही जिंदगी उलझी रही। उम्र थकने लगी, तो अब कैसे जाएं भारत, कैसे पढ़ें संस्कृत? सब सपना रह गया। 
वह युवा अपने मेजबान का संस्कृत पे्रम देख चकित था। बनसेन भी खुशी से फूले नहीं समा रहे थे कि कोई ऐसा युवा मिला है, जो अपने जैसा है, जो वाकई केवल संस्कृत की खोज में अपने देश से इस देश पहुंच गया है। वह ऋग्वेद  के बारे में जानता है। बनसेन ने दिल खोलकर रख दिया, तुम्हें पता है, हमारे संसार का पहला ग्रंथ ऋग्वेद है? क्या तुमने सुना है, उसका पहला जादुई श्लोक- ॐ अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्।
हे अग्नि स्वरूप परमात्मा, इस यज्ञ द्वारा मैं आपकी आराधना करता हूं। सृष्टि के पूर्व भी आप थे और आपके अग्निरूप से ही सृष्टि की रचना हुई। हे अग्निरूप परमात्मा, आप सब कुछ देने वाले हैं। आप प्रत्येक समय और ऋतु में पूज्य हैं। आप ही अपने अग्निरूप से जगत के सब जीवों को सब पदार्थ देने वाले हैं...। 
लंदन में दोनों संस्कृत प्रेमी टूटे-फूटे श्लोक और उसके अर्थ पर देर तक चर्चा करते रहे। बनसेन खासकर ऋग्वेद  पर फिदा थे कि यह ज्ञान का खजाना दुनिया बदल सकता है, लेकिन वह मुकम्मल मिलेगा कहां? बात-बात में पता चला कि बनसेन से ज्यादा संस्कृत सामग्री तो उस युवा के पास है। दोनों के दिलों के तार मानो मिल गए। उस युवा के लिए बनसेन के दिल का ही नहीं, बल्कि घर का दरवाजा भी खुल गया। वो लम्हा था, जब उस युवा मैक्स मूलर को मानो एक और पिता मिल गए। सगे पिता का साया तो महज चार की उम्र में उठ गया था। संपन्नता और दया से सराबोर बनसेन ने मूलर के जीवन को ऐसी सुरक्षा से भर दिया, जो जीवन भर बनी रही। पराया सा लगने वाला लंदन अपना सा हो गया। मैक्स मूलर (1823-1900) ने ऋग्वेद   पर गंभीरता से काम शुरू किया, ताकि उसे समझा-समझाया जा सके। बनसेन क्या मिले, लंदन में ही भारत मिल गया। अफसोस, वह कभी भारत नहीं आ पाए या अंग्रेजों द्वारा कभी भारत नहीं भेजे गए, क्योंकि भारतीय ज्ञान के इस प्रशंसक-तपस्वी को कथित श्रेष्ठतम इंग्लैंड से गुलाम भारत भेजने के अपने खतरे थे। 
संस्कृत और भारत विद्या पर मैक्स मूलर ने ऐसे त्याग-समर्पण से काम किया कि स्वामी विवेकानंद ने भी उन्हें ऋषि तुल्य बता दिया था। आज दुनिया उन्हें जानती है। बताते हैं, जब ग्रामोफोन के आविष्कार के बाद पहली रिकॉर्डिंग के लिए मैक्स मूलर से कुछ बोलने के लिए कहा गया, तो मूलर के मुख से दुनिया के पहले ग्रंथ का वही पहला श्लोक निकला - ॐ अग्निमीले पुरोहितं...।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय

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  • Web Title:hindustan meri kahani column 06 december 2020