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सेहत के लिए जादुई गोली की तलाश

संगत बुरी हो, तो तबाही में उतार देती है और अच्छी संगत से इंसान महानता की सीढ़ियां सरपट चढ़ने लगता है। खासकर बच्चों पर सिर्फ इंसानी संगत ही नहीं, बल्कि अन्य चीजों व मशीनों का सबसे ज्यादा असर होता है...

सेहत के लिए जादुई गोली की तलाश
Pankaj Tomarपॉल एर्लिच, नोबेल विजेता चिकित्सा वैज्ञानिकSat, 03 Feb 2024 10:43 PM
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संगत बुरी हो, तो तबाही में उतार देती है और अच्छी संगत से इंसान महानता की सीढ़ियां सरपट चढ़ने लगता है। खासकर बच्चों पर सिर्फ इंसानी संगत ही नहीं, बल्कि अन्य चीजों व मशीनों का सबसे ज्यादा असर होता है। उस जर्मन यहूदी बालक के मन को भी एक मशीन ने मोह लिया। क्या गजब मशीन थी, किसी भी चीज को अनेक भागों में बांट देती थी। मानव कोशिकाएं हों या रक्त की बूंदें, वह मशीन बहुत सहजता से एक कण से अनेक कण और अनेक कणों से सैकड़ों कण निकालने में माहिर थी। जब ऐसी मशीन से पाला पड़ा, तब बालक की उम्र बमुश्किल नौ साल रही होगी, वह बार-बार मशीन को निहारता था। देर तक गहराई से समझता था कि मशीन में कौन-सा यंत्र क्या काम करता है, कैसे करता है। मशीन का नाम माइक्रोटोम्स था, माइक्रोबायोलॉजी से जुड़ी वह मशीन उस जमाने में चंद लोगों के पास ही थी, इसलिए भी वह उस स्कूली बालक को बहुत लुभा रही थी।  मशीन के मालिक थे उस बालक के एक ममेरे भाई, उम्र में बस 19 थे, पर उसी उम्र में असाध्य रोगों के पीछे लग गए थे। वह दोस्त भी थे, तो उस मशीन के बारे में बताते हुए थकते नहीं थे। विस्तार से बताते थे कि इस मशीन के जरिय दुनिया में तमाम रोगों के विषाणुओं की पड़ताल मुमकिन है। 
उस दुर्लभ मशीन को देख बालक ने तय कर लिया कि अब ऐसी ही मशीनों के साथ रहना है और दुनिया के तमाम असाध्य रोगों के विषाणुओं के पीछे हाथ धोकर पड़ जाना है। पता नहीं, कैसे-कैसे रोग पनप रहे हैं। डॉक्टरों के पास सबका इलाज नहीं है, पर माइक्रोटोम्स से इलाज खोजना संभव है। सोच की दशा से पढ़ाई की दिशा भी बदली और दुनिया को बेहतरीन चिकित्सक-वैज्ञानिक पॉल एर्लिच नसीब हुए।
वह दिन-रात शोध में लगे रहते थे। विषाणुओं को जीवाणुओं के बीच से कैसे पकड़कर अलग किया जाता है? विषाणु कैसे नौ दो ग्यारह होने की साजिश में लगे रहते हैं? विषाणु खुद को जीवाणुओं के बीच कैसे छिपाते हैं और कैसे मौका मिलते ही अपनी आबादी का विस्फोट करते हैं।विषाणु कैसे रंग बदलते हैं और उनके रंग-ढंग को कैसे नियंत्रित किया जा सकता है? श्वेत और लाल रक्त कोशिकाओं को समझने और अलग करने की विधि का आविष्कार उन्होंने ही किया। उन्होंने ही बताया कि मानव कोशिकाओं में रासायनिक प्रतिक्रियाएं लगातार होती हैं और सही रासायनिक एजेंटों का उपयोग रोगग्रस्त कोशिकाओं को ठीक करने या संक्रामक विषाणुओं को नष्ट करने के लिए किया जा सकता है, इस सिद्धांत ने चिकित्सा निदान और उपचार विज्ञान में नई क्रांति को जन्म दिया। दुनिया के अनेक वैज्ञानिक रक्त में रोग खंगालने के कार्य में जुट गए। 
दिन-रात प्रयोग में लगे रहने वाले एर्लिच ने तंत्रिका संबंधी विकारों के उपचार में मेथिलीन ब्लू के उपयोग की भी खोज की। टाइफायड, बुखार और नेत्र रोग उपचार को भी उन्होंने आसान बनाया। हालांकि, दुर्भाग्य देखिए, उन्हें तपेदिक से निरंतर जूझना पड़ा। एक बार तपेदिक की वजह से उन्हें प्रयोग छोड़कर बैठने के लिए मजबूर होना पड़ा, पर मानव शरीर में फेरा लगाते विषाणुओं ने उन्हें फिर ललकारा और पॉल फिर उनके खिलाफ युद्ध में उतर आए। तब तक कैंसर असाध्य रोग बन चुका था, इस महारोग की चुनौती को भी पॉल एर्लिच (1854-1915) ने स्वीकार किया और यह सिद्ध किया कि कैंसर जैसे घातक विष को भी एक तरह के रसायन या विष की यथोचित मात्रा से परास्त किया जा सकता है। एक ऐसा विष या द्रव्य तैयार किया जा सकता है, जो मानव शरीर में जाकर विषाणुओं पर ही प्रहार करे। उपचार के ऐसे तत्वों की खोज आसान नहीं थी, पर एक-दो ऐसे तत्वों की खोज में वह सफल हुए। यह उस प्रसिद्ध कीमोथैरेपी का आविष्कार था, जिसे आज कैंसर के खिलाफ राम वाण की तरह इस्तेमाल किया जाता है। पॉल एर्लिच ने 115 साल पहले ही बता दिया था कि सही समय पर कैंसर का पता लग जाए, तो कीमोथैरेपी से जीवन बचाया जा सकता है। 
दुनिया हर साल 4 फरवरी को कैंसर दिवस मनाती है और पॉल एर्लिच को याद करती है। उन्हें चिकित्सा शास्त्र में योगदान के लिए साल 1908 में नोबेल से सम्मानित किया गया था। वह एक जादुई गोली की तलाश में लगे थे, ताकि एक गोली से ही उपचार संभव हो जाए। दुनिया से जाते-जाते उन्होंने जादुई गोली या मैजिक बुलेट का स्वरूप तैयार कर लिया था। उनके पास समय कम था और काम बहुत ज्यादा। युवा उन्हें घेर लेते थे और पूछते थे कि आपने इतने आविष्कार कैसे किए? वह बिना समय गंवाए आगे की राह बताते थे, ‘अनुसंधान में सफलता के लिए चार चीजें जरूरी हैं : भाग्य, धैर्य, कौशल और पैसा।’
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय 

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