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बस पढ़ाई से खींची लकीर भीमकाय

बीसवीं सदी का दूसरा वर्ष चल रहा था। परीक्षाएं बीत गई थीं और गर्मी की छुट्टियां भी शुरू हो गई थीं। तीन बच्चे सतारा में अपने घर से पूरी तैयारी के साथ निकले थे, दो भाई और एक भतीजा, उनमें एक ही बच्चा...

बस पढ़ाई से खींची लकीर भीमकाय
Amitesh Pandeyबाबासाहेब भीमराव आंबेडकर, संविधान निर्माता, समाज सुधारकSat, 02 Dec 2023 10:45 PM
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बीसवीं सदी का दूसरा वर्ष चल रहा था। परीक्षाएं बीत गई थीं और गर्मी की छुट्टियां भी शुरू हो गई थीं। तीन बच्चे सतारा में अपने घर से पूरी तैयारी के साथ निकले थे, दो भाई और एक भतीजा, उनमें एक ही बच्चा दस से ज्यादा उम्र का था। सबके बदन पर नए वस्त्र थे, साफ-सुथरे सजीले। पिता ने बुलाया था कि आ जाओ, छुट्टियों में कोरेगांव, मन बहल जाएगा। तब मन बहलाने के मौके दुर्लभ होते थे। खैर, सफर पर निकले दो भाइयों में जो छोटा था, वह कुछ ज्यादा ही तेज था, महज नौ साल का अबोध, मां तीन साल पहले ही दुनिया से चली गई थीं, तो छुट्टियों में बगैर मां मन नहीं लगता था और पिता थे कोरेगांव में, तो जाहिर है, कोरेगांव पिता के पास पहुंचने का उत्साह खिलखिला उठता था। कुछ यात्रा ट्रेन से और कुछ यात्रा घोड़ागाड़ी या बैलगाड़ी से तय थी। पिता को पत्र लिख दिया गया था कि फलां दिन बच्चे पहुंचेंगे, आप मसुर स्टेशन पर समय से पहुंच जाइए, पर पता नहीं, पिता क्यों न आए, पत्र मिला भी या नहीं। 
इंतजार में बैठे बच्चे रास्तों पर दूर-दूर तक नजरें फेंकते थे, पर पिता कहीं दिखते नहीं थे। बच्चों ने मिलकर फैसला किया, पिता नहीं आए कोई बात नहीं, चलो, खुद उन तक पहुंच जाते हैं। कोई समस्या नहीं, तीन-तीन बच्चे हैं और जेब में पैसे भी हैं, तो एक गाड़ी वाले से बात हुई। गाड़ी वाले ने बच्चों पर गौर किया, सुंदर-सुडौल बच्चे बड़े घर के लगे, वह तैयार हो गया। जैसे ही गाड़ी कुछ आगे बढ़ी, बातों ही बातों में गाड़ीवाले ने बच्चों की जाति का पता लगा लिया, फिर क्या था, वह इंसानियत भी भूल गया। लगभग धक्के देकर उसने बच्चों को गाड़ी से उतार फेंका। बच्चे तड़प उठे कि यह क्या बात हुई, हम पूरे पैसे भी दे रहे हैं, तब भी कोई हमें गाड़ी से ऐसे कैसे उतार सकता है?
गाड़ीवाला अपने दिमाग के दूषित तरकश से निकाल-निकालकर जातिसूचक बाण चला रहा था। उस बेवकूफ  को लग रहा था कि वह अशुद्ध हो गया, उसकी गाड़ी अशुद्ध हो गई, यहां तक कि गाड़ी खींचने वाला पशु भी अशुद्ध हो गया? भला ऐसे कैसे मुमकिन है? यह कहां लिखा है? यह कहां का कानून है? बच्चे बिलख रहे थे कि तुम और पैसे ले लो, पर हमें घर छोड़ दो, शाम ढल रही है, हम कहां जाएंगे, कैसे जाएंगे? हम पहली बार सफर पर निकले हैं, हम बच्चों पर रहम करो, पर बेशर्म गाड़ीवाला टस से मस न हुआ। अपनी जाति के मैले-चिथड़े हो चले परदे को हटाने को तैयार न हुआ। वह अपना जातिगत कूड़ा संभाले इस झूठे गर्व के साथ भागा कि अछूतों से पीछा छूटा। इधर, खासकर नौ वर्षीय बच्चे का विश्वास पूरी तरह हिल गया। कभी चिंता उमड़ती थी कि पिता तक कैसे पहुंचेंगे, तो कभी रुलाई फूटती थी कि यह जाति भला क्या बला है? 
बच्चे भारी मन से अपना सामान उठाए फिर रेलवे स्टेशन लौट आए। कोई गाड़ीवाला कोरेगांव जाने को तैयार न था, तब स्टेशन मास्टर ने एक गाड़ीवाले को तैयार किया, पर वह भी दो शर्तों पर तैयार हुआ, वह दोगुना भाड़ा भी लेगा और अछूतों की गाड़ी भी नहीं हांकेगा। बच्चे को यह और भी बुरा लगा, पर दूसरा कोई चारा न था, पिता के पास रात चढ़ने से पहले पहुंचना था। उस रात वह जगह ही नहीं, पूरी दुनिया पराई-सी लग रही थी। दिल दरकता चला जा रहा था, भैया किसी तरह से गाड़ी हांक रहे थे और गाड़ीवाला आंखों में हिकारत का भाव भरे चला आ रहा था। वह पहली ट्रेन यात्रा और उसके बाद गाड़ी यात्रा ने इतिहास रच दिया था। बच्चे ने ठान लिया था कि इस जाति का कुछ तो करना होगा। जाति ऐसे तो नहीं चलेगी, सबको बदलना होगा। बदलने के लिए ताकत चाहिए और ताकत के लिए पढ़ना होगा। आगे बढ़ने का फॉर्मूला ही यही था, पढ़-लिखकर ऐसी लंबी भीमकाय लकीर खींच दो कि कोई नजरंदाज न कर सके। 
उस अद्भुत बालक भीमराव आंबेडकर ने यही किया। उनकी जिंदगी में कुछ भी आसान न था, पर वह अमेरिका गए, ब्रिटेन गए, इतना पढ़े कि जितना देश में कोई नहीं पढ़ा था। वह जानते थे कि देश को आजादी दिलाने की लड़ाई, तो छोटी है, पर कथित वंचित जातियों को हक  दिलाने की लड़ाई बहुत लंबी चलने वाली है। वह तैयार थे, उन्हें देश का संविधान लिखने के कार्य के लिए आमंत्रित किया गया। संविधान में किसी भी प्रकार के छुआछूत, भेदभाव के लिए गुंजाइश नहीं छोड़ी गई। 
बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर (1891-1956) को आज पूरी दुनिया जानती है, क्योंकि उन्होंने भारत को बदल दिया। उन्होंने ऐसे दिन भी देखे थे, जब हजामत करने वाला भैंसों के तो बाल काटता था, पर उनके बाल काटने से मना कर देता था, मजबूरी में बहनें ही उनके बाल काटती थीं। आज ऐसा भारत है, जब हजामत की दुकान पर कोई जाति नहीं पूछता।
  प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय 

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