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यूनिवर्सिटी, सेना और एडमिशन

बिना लडे़ या आधा लडे़ या पूरा लड़ने के बाद हाथ पर हाथ धरे बैठ जाने से हाथ आई चीज भी कब सरक जाती है, पता नहीं चलता। असमानताओं के विरुद्ध संघर्ष सदा चला है और सदा चलेगा। आज दुनिया का शायद ही कोई ऐसा...

यूनिवर्सिटी, सेना और एडमिशन
Amitesh Pandeyजेम्स मेरेडिथ, सामाजिक कार्यकर्ताSat, 30 Sep 2023 10:14 PM
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बिना लडे़ या आधा लडे़ या पूरा लड़ने के बाद हाथ पर हाथ धरे बैठ जाने से हाथ आई चीज भी कब सरक जाती है, पता नहीं चलता। असमानताओं के विरुद्ध संघर्ष सदा चला है और सदा चलेगा। आज दुनिया का शायद ही कोई ऐसा देश है, जहां इंसानों के बीच भेदभाव नहीं है। अमेरिका में 185 साल के कथित आदर्श लोकतंत्र के बावजूद काले-गोरे का भेद लोगों के सिर चढ़ा हुआ था। भारत ने आजाद होते ही सभी को मतदान का हक दे दिया, पर अमेरिका के अनेक राज्यों में अश्वेतों को इसी हक के लिए लंबा जूझना पड़ा। 
दुनिया आज भी भूली नहीं है कि 20 जनवरी, 1961 को अमेरिका के नए राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा था, ‘मेरे साथी अमेरिकियो, यह मत पूछो कि तुम्हारा देश तुम्हारे लिए क्या कर सकता है, यह पूछो कि तुम अपने देश के लिए क्या कर सकते हो। दुनिया के मेरे साथी नागरिको, यह मत पूछो कि अमेरिका आपके लिए क्या करेगा, बल्कि यह पूछो कि हम मिलकर इंसान की आजादी के लिए क्या कर सकते हैं।’ दुनिया के सबसे शक्तिशाली मुल्क के राष्ट्रपति ने दोटूक आह्वान कर दिया था कि रोना-धोना छोड़ो, गरीबी, अन्याय, असमानता के विरुद्ध बदलाव का बिगुल बजा दो। कहा जाता है कि नेताओं का एक-एक लफ्ज इतिहास को दिशा देता है। कोई शक नहीं, युवा राष्ट्रपति का भाषण लोगों के दिल में घर कर गया था, उन्हीं में एक सेना का पूर्व जवान भी था, जिसे सोचने का एक नया ढंग मिल गया था। राष्ट्रपति की एक-एक बात पर वह अश्वेत युवा विचार करने लगा था। उसने तय कर लिया कि उसे भी देश की बेहतरी के लिए कुछ करना होगा। 
उसने तय किया कि उसे आगे पढ़ना होगा, जबकि अमेरिका के दक्षिणी राज्य मिसिसिप्पी के विश्वविद्यालय में अश्वेतों का प्रवेश वर्जित था। उस अश्वेत ने यह सोचकर प्रवेश के लिए आवेदन कर दिया कि देखते हैं, नए राष्ट्रपति के दौर में असमानता कैसे खत्म होगी? जैसा कि होना था, उसके आवेदन को खारिज कर दिया गया। साफ कह दिया गया कि ‘श्रीमान जेम्स मेरेडिथ आप श्वेत नहीं हैं, तो प्रवेश नहीं मिल सकता।’ दूसरा कोई होता, तो हार मानकर बैठ जाता, मगर जेम्स का इरादा और पक्का हो गया। सेना की नौकरी ने इतना तो समझा दिया था कि कभी हार नहीं मानना है और जीतने तक लड़ते ही रहना है। 
राष्ट्रपति का भाषण रह-रहकर कानों में गूंजता था, ‘यह पूछो कि तुम अपने देश के लिए क्या कर सकते हो।’ फिलहाल देश को जगाना होगा, बार-बार झकझोरना होगा। जो लोग अच्छी जगहों पर कब्जा किए बैठे हैं, जो लोग संविधान को पूरी तरह से लागू होने में बाधक बने बैठे हैं, उन्हें हर हाल में समझौते के लिए मजबूर करना होगा। बार-बार मांगे बगैर प्रवेश न मिलेगा। जेम्स ने प्रवेश के लिए फिर आवेदन कर दिया और अन्याय को जगह-जगह रेखांकित करने लगे। श्वेत अन्यायी जब समझने को तैयार न हुए, तो जेम्स अपनी गुहार लिए अदालत पहुंच गए। अदालत ने भी फैसला सुना दिया कि रंग के आधार पर किसी को प्रवेश से वंचित नहीं कर सकते, सारे नागरिक समान हैं, पर अदालती आदेश के बावजूद न विश्वविद्यालय मानने को तैयार था और न मिसिसिप्पी के राज्यपाल पसीज रहे थे। अकेले जेम्स भी हार मानने को तैयार न थे। बात इतनी बढ़ी कि राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी तक पहुंच गई। श्वेत सामंतों ने श्वेत राष्ट्रपति की बात पर भी कान न दिया। अदालत में भी नाराजगी बढ़ गई। श्वेतों ने दंगा कर दिया, दो लोग गोलीबारी में मारे गए। जेम्स को झुकाने के लिए तरह-तरह के तिकड़म किए गए। प्रवेश से वंचित करने के लिए मिसिसिप्पी में रातोंरात एक कानून बना दिया गया और उस कानून के तहत जेम्स के खिलाफ उसी दिन मुकदमा ठोककर प्रवेश के अयोग्य करार दिया गया। ज्यादती की खबर फिर राष्ट्रपति तक पहुंची और अलग मिट्टी के बने राष्ट्रपति ने इस बार जेम्स को प्रवेश दिलाने के लिए सेना के तीस हजार जवानों को साथ भेज दिया। बेशक, दुनिया में न किसी छात्र को ऐसे प्रवेश मिला था और न कभी जरूरत पड़ेगी। एक सपना साकार हुआ, 1 अक्तूबर, 1962 को विश्वविद्यालय ने पहली बार एक अश्वेत को प्रवेश दिया। जेम्स की जीवनगाथा दुनिया में तमाम तरह के वंचितों को यह संदेश देती है कि तुम्हें अपने हक के लिए किसी भी हद तक जाना पड़ सकता है। दुनिया जरूर बदलेगी, बस, तुम कभी हिम्मत न हारना। 
जेम्स मेरेडिथ (जन्म 1933) के संघर्ष को आज भी याद किया जाता है और उनके साथ ही राष्ट्रपति केनेडी भी याद किए जाते हैं, जिन्होंने कहा था कि यहां पृथ्वी पर भगवान का काम वास्तव में हमारा अपना काम होना चाहिए। 
  प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय 

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