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अनुपम निडरता से पाखंड पर प्रहार

उस रात भी मंदिर में पूजन-भजन के बाद लोग जागने के लिए बैठे, पर एक-एक कर सब नींद की आगोश में जाने लगे। कोई मंदिर में ही पूरा लेट गया, तो कोई अधलेटे खर्राटे खींचने लगा। नींद का प्राकृतिक झोंका ऐसे चला...

अनुपम निडरता से पाखंड पर प्रहार
Monika Minalदयानंद सरस्वती,दार्शनिक, संस्थापक, आर्य समाजSat, 10 Feb 2024 09:23 PM
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टंकारा पहुंचने के लिए अरब सागर की हवा को महज पचपन किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। वहां से कृष्ण की द्वारका भी बस दो सौ किलोमीटर दूर थी, जहां कृष्ण ने मथुरा से बारह सौ किलोमीटर दूर सुंदर नगर बसाया था। कृष्ण ने अपने समय में पाप के विरुद्ध महाभारत किया था और तब धर्म का राज आया था, पर धीरे-धीरे अधर्म फिर बढ़ा, तो महावीर और बुद्ध आए। फिर चेतना का संचार हुआ, मगर कुछ ही सदियों में चेतना पर फिर अंधविश्वास के बादल मंडराने लगे। कुरीतियों ने गुजरात के टंकारा में भी धर्म की महिमा पर फन फैला रखा था।  
उसी टंकारा में एक चौदह वर्षीय किशोर मूलशंकर तिवारी रहते थे। धर्मग्रंथ उन्हें कंठस्थ होने लगे थे, तो पिता ने सोचा, यही समय है, शिवभक्ति के संस्कार उत्पन्न हो जाएंगे, तो जीवन भर काम आएंगे। शिवरात्रि के दिन पिता अपने प्रिय पुत्र को भी मंदिर ले गए, तब शिवरात्रि के दिन अन्न और नींद के त्याग का बड़ा हल्ला था। दिनों पहले से ही लोग चर्चा करने लगते थे कि मंदिर में ही पूजन, उपवास और रात्रि जागरण करना है। उस रात भी मंदिर में पूजन-भजन के बाद लोग जागने के लिए बैठे, पर एक-एक कर नींद की आगोश में जाने लगे। कोई मंदिर में ही पूरा लेट गया, तो कोई अधलेटे खर्राटें खींचने लगा। नींद का प्राकृतिक झोंका ऐसा चला कि जागने का सारा अंधविश्वास ढेर हो गया। मूलशंकर के पिता की भी आंखें लग गईं। रात चढ़ी, तो मंदिर में सब सो रहे थे और मूलशंकर जाग रहे थे कि पूजा का पूरा फल जागने पर ही मिलता है, वरना शिवजी नाराज हो जाएंगे, पर यह क्या, शिवलिंग पर तो बडे़-बडे़ चूहे चढ़े हुए थे। भोग सामग्री पर भी मुंह मार रहे थे। मूलशंकर को इंतजार था कि शिवजी प्रतिक्रिया करेंगे, चूहों को भगाएंगे, पर समय निकला जा रहा था। मूलशंकर सोचने लगे कि पिता को जगाया जाए। नींद में खलल से पिता कहीं नाराज न हो जाएं, मगर उन्होंने साहस किया और पिता को जगाकर पूछा, ‘शिवजी पर चूहे क्यों चढ़े हैं, भोग चूहे क्यों खा रहे हैं, शिवजी शक्तिशाली हैं, तो स्वयं को बचाते क्यों नहीं?’
बहस बढ़ी, तो पिता ने कहा, ‘असली शिवजी कैलास में रहते हैं?’ पुत्र ने प्रश्न किया, ‘तो हम नकली की सेवा क्यों कर रहे हैैं?’ पिता यथोचित समाधान नहीं कर पाए, तो पुत्र के मन में प्रश्नों का अंबार लग गया। मन बोल पड़ा, सेवा का अधिकार तो केवल असली शिव को है, नकली से जुड़ा इतना कर्मकांड किस काम का? ऐसी श्रद्धा किस काम की, जो शिवजी के लिए जाग नहीं सकती। सब बेसुध आराम फरमा रहे हैं, शायद सब जानते हैं कि यहां आस-पास ईश्वर कहीं नहीं हैं। 
मूलशंकर उसी रात मंदिर से घर आ गए, मां को जगाया, उपवास तोड़ा और अगले दिन पिता की फटकार का निडर सामना किया। नकली से अश्रद्धा हो गई और असली की आकांक्षा मन में उमड़ने लगी। वह शास्त्रों में खोजने लगे। उन्हीं दिनों पूजा-प्रार्थना के बावजूद छोटी बहन चल बसी, पर वह जरा भी नहीं रोए। कुछ दिन बाद प्रिय सदाचारी चाचा के निधन पर खूब रोए कि एक दिन हर कोई संसार छोड़ जाएगा, पर जो समय है, उसे असली की खोज में लगाया जाए। उन्होंने विवाह से पहले ही 20 की आयु में घर छोड़ दिया, गुरु और ज्ञान की खोज में गुजरात से गोमुख तक भटके। नाम पाया- स्वामी दयानंद सरस्वती। 
भारतीय समाज के एक बड़े हिस्से को उन्होंने अंधविश्वास से उबारा। वह उपदेश देते थे कि नकली में न डूबो, असली को समझो और उस धर्म की रक्षा करो, जो वेदों में वर्णित है। धर्म का मर्म समझो और मात्र मूर्ति को ही ईश्वर समझने की गलती न करो। पूरे देश में उनके तार्किक ज्ञान की गूंज हुई। दयानंद सरस्वती (1824-1883) ने ही सबसे पहले आह्वान किया कि भारत भारतीयों का है। वह 200 साल पहले जन्मे थे और 150 वर्ष पहले उन्होंने आर्य समाज की स्थापना की थी। 
बचपन की निडरता उनके स्वभाव में अंत तक बनी रही। रंक और राजा, दोनों से वह समान व्यवहार करते थे। एक दिन जोधपुर के राजा को उन्होंने एक गणिका के साथ देख लिया, तब उन्होंने बिना डरे राजा को खूब फटकारा था, ‘धिक्कार है राजन! राजा लोग सिंह समान समझे जाते हैं। ऐसे वीरशार्दूल का किसी कृपणा से प्रेम करना और आसक्त हो जाना सर्वथा अनुचित है। इस दुर्व्यसन को तत्काल तिलांजलि दे देनी चाहिए।’ 
राजा लज्जित हुए थे, पर राजा को बिगाड़ने में अपना हित देखने वालों ने दयानंद सरस्वती को धोखे से विष पिला दिया था। मूर्ख शत्रुओं ने यही सोचा था कि दयानंद के अवसान के बाद उनके आर्य समाज और उत्तम ज्ञान का भी लोप हो जाएगा, पर ऐसा नहीं हुआ। ऐसे महापुरुष के अवतरण के दो सौ साल बाद भी उनकी पाखंड खंडिनी पताका अविरल लहरा रही है।
प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय
 

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