फोटो गैलरी

Hindi News ओपिनियन मेरी कहानीगरीब छात्रों के चेहरे रह-रह सताते रहे

गरीब छात्रों के चेहरे रह-रह सताते रहे

जिस दिन स्कूल से पास होकर विद्यार्थी जाने लगे, उस दिन तो माहौल बहुत गमगीन हो गया। जीवन में सबसे मजबूत सहारा शिक्षा का साथ छूट रहा था। आगे कॉलेज में पढ़ने के दरवाजे बंद थे। गरीब छात्रों के लिए तो कोई ..

गरीब छात्रों के चेहरे रह-रह सताते रहे
Pankaj Tomarलिंडन बी जॉनसन, अमेरिकी राष्ट्रपतिSat, 06 Jan 2024 10:22 PM
ऐप पर पढ़ें

सारे नेता जमीन से उठकर ही आसमान पर पहुंचते हैं, मगर उनमें से ज्यादातर वहीं ऊंचाई पर ठहर जाते हैं। इससे भी बुरा यह होता है कि वे कभी साथ रहे गरीबों को भी भूल जाते हैं। चूंकि जमीनी सच आसमान पर अक्सर झूठ मान लिया जाता है, इसलिए जमीनी सच हमेशा से खुरदरा या कांटेदार ही रहा है। न जाने कितने ऐसे कांटों से भरी जमीन पर वह छोटा स्कूल चलता था। उसे कहीं से भी देखिए, कांटे ही कांटे थे, नस्ल का कांटा, संप्रदाय, गरीबी, रंगभेद के कांटे। उसी स्कूल में ऊंचे कद और छरहरे बदन के एक युवा शिक्षक पढ़ाते थे। उनके पास आगे की पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे, तो शिक्षक बन गए थे। उनका समय भी अभाव में ही बीता था। बंद, तंग कमरों में रहते हुए। लोगों के यहां फर्श साफ करते हुए, तो कभी मोजे बेचते हुए, गुजारे के लिए न जाने क्या-क्या काम किए, पर पढ़ाई का साथ न छूटा। कॉलेज में दूसरा वर्ष शुरू हुआ, तो पैसे का बड़ा संकट खड़ा हो गया। पढ़ाई करें, तो पैसे कहां से लाएं? ऐसे में, एक मैक्सिकन स्कूल में पढ़ाने की नौकरी मिल गई। प्रतिमाह 125 डॉलर मिलने थे, तो तय किया कि एक साल पढ़ा लेंगे, जो पैसे जुटेंगे, उससे अगले साल से फिर पढ़ाई चालू कर देंगे।  
उस छोटे से वेल्हाउजेन मैक्सिकन स्कूल में एक से बढ़कर एक मजबूर गरीब लड़के और लड़कियां पढ़ने आते थे। कुछ ही दिनों में उस युवा शिक्षक ने स्कूल की पढ़ाई को बाकी समर्पित शिक्षकों के साथ मिलकर सुधार दिया। छात्र-छात्राओं को पढ़ने में बहुत रस आने लगा, मगर बीच-बीच में उनके चेहरों पर अजीब उदासी चिपक जाती थी। वे सोच में डूबे रहते थे कि पढ़ाई के बाद नई तकलीफदेह जिंदगी शुरू हो जाएगी। रोज एक राहत की तरह मिलने वाला स्कूल बीती बात हो जाएगा। जिस दिन स्कूल से पास होकर विद्यार्थी जाने लगे, उस दिन तो माहौल बेहद गमगीन हो गया। जीवन में सबसे मजबूत सहारा शिक्षा का साथ छूट रहा था और आगे कॉलेज में पढ़ने के दरवाजे बंद थे। तब कॉलेज सभी छात्रों का स्वागत नहीं करते थे और खासकर गरीब छात्रों के लिए तो कोई गुंजाइश ही नहीं थी। 
उस दिन युवा शिक्षक को भी उदासी और सवालों ने घेर लिया था। वह सोचने लगे कि क्या इन छात्रों का भविष्य देश का भविष्य नहीं है? ये आगे पढ़ेंगे नहीं, तो क्या देश को नुकसान नहीं होगा? क्या गरीबी में इतना बल होना चाहिए कि किसी को आगे पढ़ने से रोक दे? जो सरकार गरीबों को पढ़ा नहीं सकती, वह गरीबों से क्या उम्मीद कर सकती है? अगर देश ऐसे बेबस गरीबों के लिए नहीं है, तो फिर किसके लिए है? उसी दिन उस प्रखर युवा शिक्षक ने ठान लिया कि यह राष्ट्र तब तक आराम नहीं कर सकता, जब तक हर अमेरिकी के लिए ज्ञान का द्वार नहीं खुल जाता। सरकार को यह समझना ही होगा कि शिक्षा विलासिता नहीं है, हर किसी की बुनियादी आवश्यकता है। 
और एक दिन आया, जब यही शिक्षक लिंडन बी जॉनसन अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर विराजमान हुए। वह शिक्षक के रूप में उस स्कूल को भूले नहीं, उन छात्र-छात्राओं के उदास चेहरों ने उन्हें बार-बार प्रेरित किया और इसी का नतीजा कि अमेरिका ने 8 जनवरी, 1964 को गरीबी के खिलाफ बड़ी जंग (वार ऑन पोवर्टी) का एलान कर दिया। एक महान समाज के निर्माण के लिए जॉनसन (1908-1973) ने गरीबी उन्मूलन की तमाम रणनीतियों को आसमान से जमीन पर उतार दिया। शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल संबंधी कानूनों में बदलाव किए। सामाजिक सुरक्षा के तंत्र को मजबूत किया। अमेरिका में गरीब छात्रों को उदार छात्रवृत्ति, मुफ्त शिक्षा और बिन ब्याज ऋण की सुविधा मिलने लगी। जॉनसन के समय अमेरिका ने बुनियादी रूप से जो तरक्की की, उसे आज भी याद किया जाता है। 
राष्ट्रपति जॉनसन अपने उस स्कूल को याद करते हुए अक्सर भावुक हो जाते थे। उस स्कूल के उदास चेहरों ने उन्हें अमेरिका में एक से बढ़कर एक, कम से कम 30 कानून बनाने के लिए प्रेरित किया, सारे के सारे कानून अमेरिकी संसद से पास हुए और अमेरिका बदल गया। सबके प्रति उनका व्यवहार बहुत स्नेहिल था। छह फुट और साढ़े तीन इंच लंबे यह राजनेता जब किसी से बात करते थे, तब आंखों में आंखें डालकर करीब से परखते थे और दिल जीत लेते थे। वह अक्सर कहते थे, ‘तुम सत्य को जानो और सत्य तुम्हें आजाद कर देगा।’ विद्वान आज भी राष्ट्रपति जॉनसन की इस समझ को सलाम करते हैं कि व्यक्ति के लिए शिक्षा उपलब्धि और पूर्णता का मार्ग है; राष्ट्र के लिए यह एक ऐसे समाज का मार्ग है, जो न केवल स्वतंत्र है, बल्कि सभ्य भी है; और दुनिया के लिए, यह शांति का मार्ग है, क्योंकि यह शिक्षा ही है, जो तर्क  को बल से ऊपर रखती है।
    प्रस्तुति : ज्ञानेश उपाध्याय 

हिन्दुस्तान का वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें