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पसंद-नापसंद और मेरी कप्तानी

gautam gambhir

 

शाहरुख खान ने पहले ही दिन मुझे कहा कि यह टीम आपकी है, आप जैसे बनाना चाहते हो, बनाओ। आप जो भी फैसला लेंगे, मैं उसके लिए मना नहीं करूंगा। मैंने सात साल कप्तानी की, कोलकाता की टीम के सारे फैसले मेरे थे। फिर चाहे वे सही हों या गलत। 

चेन्नई सुपरकिंग्स के खिलाफ एक मैच में मैंने 60 से ज्यादा रन बनाए थे। मुझे मैन ऑफ द मैच चुना गया था, मैंने अपना अवॉर्ड देबब्रत दास को दिया था। उसने रन सिर्फ छह बनाए थे, पर उसके रनों से ही हम जीते थे।

मेरे करियर में 2011 विश्व कप फाइनल के 97 रन बेशकीमती हैं। उस मैच में मैं बस यही सोच रहा था कि टीम को चैंपियन बनाना है। आईपीएल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। कोलकाता की टीम अच्छा नहीं कर रही थी। मुझे कप्तानी दी गई। मैंने अपनी सोच के साथ सिर्फ ईमानदारी बरती। मैंने अपने आप को हमेशा टीम से पीछे रखकर काम किया। मैं हमेशा मानता था कि कप्तान टीम से बड़ा नहीं हो सकता, टीम कप्तान से बड़ी होती है। सारी बातें, सारे फैसले मेरे इर्द-गिर्द नहीं होंगे, बल्कि मैं टीम के इर्द-गिर्द काम करूंगा। मैंने हमेशा सोचा कि मेरा काम अपने लिए रन बनाना नहीं, बल्कि टीम को जीत दिलाना है, इसीलिए मैंने जब भी कप्तानी की, तो ऐसा कुछ बचा नहीं, जो मैंने न जीता हो। टीम इंडिया की कप्तानी छह मैचों में की, वे छह के छह मैच हमने जीते। इसके अलावा रणजी ट्रॉफी, घरेलू टी-20, घरेलू वनडे, आईपीएल सब कुछ मैंने बतौर कप्तान जीते। सिर्फ चैंपियंस लीग रह गई, जो हमारी टीम चेन्नई सुपरकिंग्स से हार गई थी। कप्तानी पसंद-नापसंद से नहीं होती। हर कप्तान के पसंदीदा खिलाड़ी होते हैं, लेकिन मैं हमेशा सोचता था कि अपनी ‘लाइक्स’ और ‘डिस्लाइक्स’ में जितना कम अंतर रखूंगा, उतना अच्छा रहेगा। मैं कभी खिलाड़ी को इस तरह नापसंद नहीं कर सकता कि मैं उसका करियर खराब कर दूं। 


मैंने कप्तानी करते समय एक बात और ध्यान में रखी। पसंद-नापसंद सिर्फ मैदान तक होनी चाहिए। मैदान के बाद अगर मेरी किसी खिलाड़ी से नहीं भी बनती, तो मैं दखलंदाजी नहीं करता था। 2012 आईपीएल में चेन्नई सुपरकिंग्स के खिलाफ एक मैच में मैंने 60 से ज्यादा रन बनाए थे। वह मैच हमने जीता था। मुझे मैन ऑफ द मैच चुना गया था, लेकिन मैंने अपना मैन ऑफ द मैच देबब्रत दास को दिया था। उसने रन तो सिर्फ छह बनाए थे, लेकिन उसके रनों की बदौलत ही हम जीते थे। मेरी हाफ सेंचुरी का कोई फायदा नहीं होता, अगर वह तीन गेंदों पर छह रन न बनाता। देबब्रत के वे छह रन मेरी हाफ सेंचुरी से ज्यादा महत्वपूर्ण थे। हमारे यहां दिक्कत यह है कि किसी ने 100 रन किए, तो वह हीरो हो जाता है और किसी ने 10 रन बनाए, तो वह जीरो हो जाता है। पांच विकेट लिए, तो हीरो है, दो विकेट लिए, तो बेकार है। जबकि मैंने देखा है कि कई बार किसी पार्ट-टाइमर गेंदबाज के दो विकेट बहुत निर्णायक होते हैं, किसी गेंदबाज के पांच विकेट के मुकाबले। किंग्स इलेवन पंजाब के खिलाफ मैंने मोहाली में 70-80 रन बनाए थे। उस मैच में रजत भाटिया ने चार ओवर में सिर्फ 20 रन दिए थे। मैंने उसे अपना मैन ऑफ द मैच दिया था। जब आप इस तरह से कप्तानी करते हैं, तो खिलाड़ियों को लगता है कि वो भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना कप्तान। जिस दिन खिलाड़ी भी कप्तान जितना महत्वपूर्ण हो जाएगा, उस दिन आपको टीम भावना, टीम बॉन्डिंग के लिए कोई ‘एक्टिविटी’ नहीं करनी पड़ेगी। मैं इन बातों को बकवास मानता हूं। असली टीम ‘एक्टिविटी’ होती है कि कप्तान अपने खिलाड़ी को कैसे ‘ट्रीट’ करता है। टीम बॉन्डिंग के लिए आजकल खिलाड़ी साथ में खाना खाने जाते हैं। अगर 15 खिलाड़ी साथ में खाने गए, तो वे सारे आपस में बात भी कर पाते हैं क्या? ‘टीम बॉन्डिंग’ का मतलब यह है कि जितना ‘क्रेडिट’ आप खुद को देते हैं, उतना ही दूसरों को भी दें। उनके योगदान की तारीफ करें। मेरी टीम के साथ शाहरुख खान जैसे स्टार का नाम था। मेरे कप्तान बनने से पहले उनके बारे में जिसने जो भी बोला हो, लेकिन मेरी सात साल की कप्तानी में उन्होंने एक भी मैच में फोन करके नहीं कहा कि यह टीम खिलाओ या वह टीम खिलाओ। यह हम दोनों के बीच एक भरोसा था। मैंने उनको पहले ही दिन कहा था कि मेरे लिए ‘ग्लैमर’ बिल्कुल ‘मैटर’ नहीं करता। मेरे लिए कोलकाता की टीम कैसे खेलेगी, यह ‘मैटर’ करता है। शाहरुख का भी क्रेडिट है कि उन्होंने पहले ही दिन कहा कि यह टीम आपकी है, आप जैसे बनाना चाहते हो, बनाओ। आप जो भी फैसला लेंगे, मैं उसके लिए मना नहीं करूंगा। मैंने सात साल कप्तानी की, कोलकाता की टीम के सारे फैसले मेरे थे। फिर चाहे वे सही हों या गलत। कोलकाता की टीम ने 15 मैच लगातार जीते थे। दुनिया में किसी भी फ्रेंचाइजी ने यह मुकाम हासिल नहीं किया है। 


हाल ही में मैं राजनीति में आया। मैं यह नहीं चाहता था कि मैं हर मुद्दे पर सोशल मीडिया में ट्वीट करूं और अगले मुद्दे का इंतजार करूं और उसके जरिए यह दिखाऊं कि मैं कितना राष्ट्रप्रेमी हूं। मैं चाहता हूं कि लोगों का भला कर सकूं। मैंने अपनी जिंदगी बहुत सीमित दायरे में गुजारी है। यहां लोगों के बीच जाना है, चुनाव लड़ना और  लोगों से लगातार मिलना-जुलना मेरे लिए नया था। मेरा मकसद एक ही था कि लोगों के लिए अच्छा करना है।

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  • Web Title:Former cricketer and MP Gautam Gambhir describes his story