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अभिनय, आवाज और कलम की वजनदारी वाली शख्सीयत

sunil mishra

लगभग दस वर्षों से वह रजतपट पर सक्रिय नहीं थे। अचानक ही हमने उनको लोकप्रियता के संसार से अनुपस्थित पाया। वक्त-वक्त पर उनकी रुग्णता को लेकर तरह-तरह की खबरें आती रहीं। असहनीय शारीरिक व्याधियों से जूझते हुए अपने समय का, बहुआयामी प्रतिभा से भरा यह कलाकार हमारे बीच से नए साल की बेला में विदा हो गया। कादर खान एक उच्च शिक्षा प्राप्त कलाकार थे, जिन्होंने सिनेमा में अपने पैर जमाने के लिए कड़ा संघर्ष किया। कादर खान सत्तर के दशक में अनेक सपने लेकर इस संसार का हिस्सा बने थे। एक ओर उनके समकालीन अमिताभ बच्चन सितारा होना चाहते थे, सलीम-जावेद लेखक के रूप में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष और मेहनत कर रहे थे, उसी समय कादर खान भी संवाद लेखन के साथ अपने लिए जगह तलाश रहे थे। तब राजेश खन्ना सुपर स्टार थे और उनके आसपास की स्थापित स्थितियों में नयों के लिए ज्यादा जगह नहीं थी। यह स्थिति तब तक रही, जब तक अमिताभ बच्चन, प्रकाश मेहरा की फिल्म जंजीर  के मार्फत सफलता के वैकल्पिक दावेदार बने। उस समय प्रकाश मेहरा, मनमोहन देसाई, प्रयाग राज, यश चोपड़ा, बीआर चोपड़ा, राकेश कुमार जैसे निर्देशकों को अमिताभ बच्चन के रूप में भविष्य का सफल नायक नजर आया। 
 

शोले  की सफलता ने एक-दूसरे को प्रोत्साहित करने वाले काम की संभावना के नए द्वार खोले और इसी में कादर खान को भी अवसर मिलने शुरू हुए। मनमोहन देसाई की फिल्म रोटी  में संवाद लिखने वाले कादर खान ने चरित्र अभिनेता और खलनायक के रूप में अपने लिए संभावनाएं तलाश करनी शुरू कीं। दो-चार मध्यम फिल्में करने के बाद उनको 1976 में एक फिल्म अदालत  मिली, जिसके नायक अमिताभ बच्चन थे। इस फिल्म में पुलिस इंस्पेक्टर खान की भूमिका को बहुत ही नैतिक और संवेदनशील अंदाज में निबाहकर कादर खान ने दर्शकों का ध्यान भी आकृष्ट किया और निर्देशकों का भी। उसके बाद उनके पास अवसर आते रहे। एक ओर पटकथा व संवाद लेखक के रूप में उनकी अमर अकबर अंथनी, परवरिश, सुहाग, मुकद्दर का सिकंदर, सुहाग, मिस्टर नटवरलाल, याराना, देशप्रेमी, लावारिस, खुद्दार, कुली, शराबी आदि फिल्में बेहद सफल रहीं, तो बतौर कलाकार उनके काम को खून पसीना, परवरिश, मुकद्दर का सिकंदर, याराना, मिस्टर नटवरलाल, सुहाग, लूटमार  आदि फिल्मों में सराहा गया। 
 

कादर खान ने बाद में दक्षिण के निर्देशकों की हिंदी फिल्मों में एक अलग धारा की शुरुआत की, जो विवादों-विवादों में ही चर्चा और बड़े सफल दौर में तब्दील हो गई। यह धारा थी फूहड़ और घटिया हास्यपरक चरित्रों के गढ़न की, जिसकी फसल बाद में स्वयं कादर खान, अमजद खान और शक्ति कपूर के रूप में इसी तरह के हास्य को पसंद करने वाले दर्शकों के बीच लहलहाती रही। हिम्मतवाला, मवाली, मकसद, इंकलाब, तोहफा, कामयाब आदि फिल्में इसी तरह की थीं। खैर, यह दौर भी खत्म हुआ और द्विअर्थी संवादों का खुमार या बुखार खत्म हो गया। बढ़ती उम्र में कादर खान ने फिर अपने लिए अच्छी चरित्र भूमिकाएं चुनने की समझदारी दिखाई, उन्होंने स्वयं ऐसी फिल्में लिखीं भी। इन फिल्मों में जैसी करनी वैसी भरनी, काला बाजार, हम, घर परिवार, बोल राधा बोल, आंखें, धड़कन, उमर आदि शामिल थीं। कादर खान ने एक फिल्म शमा  का निर्माण भी किया। वह अमिताभ बच्चन को लेकर भी एक फिल्म बनाना चाहते थे, मगर लोकप्रियता के चरम पर अमिताभ व्यावसायिक हितों के प्रति बड़े सजग थे। इसके पहले मेहमूद, किशोर कुमार, अमजद खान वगैरह के फिल्म बनाने के प्रस्तावों को भी वह नकार चुके थे। 
 

करीब 200 फिल्मों में कई आयामों के साथ सक्रिय कादर खान सफलता के चरम पर पहुंचने के बाद भी जिन तकलीफों में घिरे वह विडंबना है। कई वर्षों तक तो फिल्म जगत ने उनकी सुध ही नहीं ली। किसी वक्त कृष्णा शाह की इंडो-अमेरिकन फिल्म शालीमार में खलनायक सर जॉन लोक्स्ले को अपनी आवाज देने वाले कादर खान ने बड़ी ऊंचाइयां हासिल कीं, पर जीवन का उत्तराद्र्ध और अंतिम समय उनके लिए त्रासद ही रहा। 
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:film reviewer sunil mishra remembers kadar khan on his demise