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पता चल गया कि जीता कैसे जाता है

सुशील

बीजिंग में ब्रॉन्ज मेडल जीतने के बाद कई लोगों ने मुझसे कहा कि अब बड़ा अच्छा हो गया है, अब ‘रेस्ट’ करो। बावजूद इसके मैं बीजिंग से लौटने के तुरंत बाद अखाड़े में आ गया। मैं मेहनत करना नहीं छोड़ता। यह सच है कि बीजिंग के बाद मेरी दुनिया बदल चुकी थी। तमाम स्पॉन्सर्स आने लगे थे। उन्हीं में से एक मित्तल ट्रस्ट वाले थे। उन्होंने कहा कि हम आपको आगे खेलने के लिए स्पॉन्सर करेंगे। आपको जो-जो चीजें चाहिए, वह हम आपको देंगे। मैंने उनसे कहा कि अब मेरा काम तो चल गया है, आप योगेश्वर को स्पॉन्सर करो। योगेश्वर को ‘इंजरी’ है, वह ठीक कराओ। बीजिंग में वह हार गया था। ये सारी बातें मुझे हमेशा याद रहती हैं कि जीवन में बीजिंग से मेरी एक अच्छी शुरुआत हुई थी। फिर मैं वल्र्ड चैंपियन बना। 

बीजिंग में मेडल जीतने के बाद मेरे पास और भी तमाम कंपनियों के विज्ञापन आए थे। उनमें एक कंपनी ऐसी थी, जो शराब भी बनाती है। मैंने सुनते ही मना कर दिया। अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम अपने जूनियर पहलवानों को भी अच्छा संदेश दें। हमें ही उन्हें रास्ता दिखाना है कि आगे आने वाले समय में उन्हें किस तरह का बर्ताव करना है। यह नहीं कि खुद सीखे, जीते, कामयाब हुए और निकल लिए। मेरे दिमाग में यह बात थी कि हमारे बाद जो सेकेंड लाइन-अप के खिलाड़ी हैं या उनके बाद के खिलाड़ी, उन तक सही संदेश जाना चाहिए। 

इसके बाद 2012 का साल आया। तब तक मुझे पता चल चुका था कि ओलंपिक मेडल का मतलब क्या होता है? मुझे आज भी लगता है कि हम वहां लंदन ओलंपिक्स में गोल्ड मेडल जीत सकते थे। वह बाउट मुझे हमेशा याद रहती है। खाते-पीते, सोते-जागते, हमेशा याद आती है। उस समय मैंने ‘वेट रिड्यूस’ कर रखा था। उस दिन ‘क्लोजिंग’ का दिन था। कुश्ती भी जल्दी शुरू हो गई। ‘रिकवरी’ का एकदम समय ही नहीं मिला। लगातार एक के बाद एक ‘टफ फाइट’ थी। ओलंपिक चैंपियन था, जिससे हारे थे, उन्हें हराना था। मेरे दिमाग में बस एक ही बात चल रही थी कि कहीं भी दूसरे को मौका नहीं देना है। सेमीफाइनल बाउट भी अच्छी थी। पहला राउंड बहुत अच्छी तरह चला। दूसरे राउंड में दूसरे पहलवान ने मुझ पर अटैक किया। मेरा स्कोर नहीं हुआ। उस वक्त एक बार मन में डर आया था कि कहीं मैं हार ना जाऊं, लेकिन फिर लगा कि ‘रैपेशाज’ से वापस आऊंगा। मेरे पास एक मौका और था ब्रॉन्ज मेडल के लिए। लेकिन फिर तुरंत ही दिमाग में आया कि नहीं, ब्रॉन्ज तो हो ही चुका है। अब मुझे और अच्छा करना है। इसके बाद मैंने और जोर लगाया। जिस कारण मैं सेमीफाइनल जीतकर फाइनल में पहुंचा। 

मुझे आज भी लगता है कि अगर आपके दिमाग में ‘पॉजिटिविटी’ है और आपने मेहनत कर रखी है, तो आखिरकार सब अच्छा ही होता है। 2012 से पहले मेरा ओलंपिक क्वालिफाई ही नहीं हो रहा था। मैं अमेरिका गया ट्रेनिंग के लिए। वहां मैंने एक टूर्नामेंट लड़ा, वहां मैंने सबको ‘वनसाइडेड’ हराया। वहीं पर सब कहने लगे थे कि सुशील इस बार ओलंपिक चैंपियन बनेगा। जैसे ही मैंने क्वालिफाई करने की तैयारी शुरू की, तो कंधे में चोट लग गई। मैंने अगले टूर्नामेंट्स खेले और आखिर में कंधे की चोट में ही मैंने क्वालिफाई किया। फाइनल में मैंने जीतने के लिए पूरा दम लगाया, लेकिन मुझे सिल्वर मेडल से ही संतोष करना पड़ा। फाइनल बाउट के पहले मुझे ‘डिहाईड्रेशन’ भी हो गया था। कुश्ती में इतना जोर लग गया था कि अंदर से खून निकलने लगा था। उसके बाद कान काटने वाला ड्रामा हुआ। हालांकि मुझे लगता है कि हर खिलाड़ी ऐसा करता है। हारने वाला खिलाड़ी कुछ न कुछ करता ही है। ये सब खिलाड़ियों की ‘टैक्टिस’ होती है। विरोधी पहलवान की शिकायत पर जितना शोर उसके देश के मीडिया ने नहीं किया, उससे ज्यादा हमारे यहां वह घटना टीवी चैनलों पर चली थी। 

2008 के सिल्वर मेडल के बाद लोगों ने मुझे फिर समझाया था कि अब कुश्ती छोड़ दे, आराम कर। लेकिन उस साल जो मेडल आए हमारे देश में, उन सभी खिलाड़ियों को देश ने काफी प्यार और सम्मान दिया। कई साल बाद इतने मेडल एक साथ आए थे। ‘इंडिविजुअल स्पोट्र्स’ में तो मेडल कम ही थे।  2008 के बाद जब लोगों ने कुश्ती छोड़ने की सलाह दी थी, तब मैंने कहा था कि जीतना तो अब आया है। अभी तक तो हारते ही आ रहे थे। अब भी वही सोचता हूं कि ‘कॉन्फिडेंस’ तो अब आया है। अब पता चला है कि जीता कैसे जाता है? (जारी...)

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  • Web Title:famous wrestler Sushil Kumar article in hindustan on 24 june