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कोच ने मुझे खारिज ही कर दिया था

सुशील कुमार, प्रसिद्ध पहलवान

जब मैं पहली बार छत्रसाल स्टेडियम आया था। उस वक्त मैं सातवीं क्लास में पढ़ता था। मेरे बड़े पापा मुझे लेकर आए थे। मुझसे पहले मेरे बड़े भाई यहां रहते थे। मेरा ट्रायल लेने के बाद कोच ने मुझसे बोला कि तुम अच्छे पहलवान नहीं बन पाओगे। मेरे भाई संदीप के लिए उन्होंने जरूर कहा था कि वह अच्छा पहलवान बनेगा। बाद में संदीप इंटरनेशनल रेसलर बने। वह कुश्ती के बड़े जानकार भी थे। बाद में कुछ उनके घुटने में तकलीफ हो गई, और कुछ उन्होंने मेरे लिए अपना करियर छोड़ दिया। वह अब भी मेरी ट्रेनिंग से लेकर खाने-पीने तक का पूरा ध्यान रखते हैं। खैर, जब कोच ने मुझसे कहा कि मैं अच्छा पहलवान नहीं बन सकता, तो मुझे बड़ा दुख हुआ, क्योंकि मैं तो पहलवानी में ही अपना करियर बनाने की सोचकर वहां गया था। लेकिन मैंने भी हार नहीं मानी। मैं कोच के कहने के बाद भी कहीं गया नहीं। वहीं छत्रसाल स्टेडियम में जमा रहा। वहीं ट्रेनिंग करता रहा। आज कई बार सोचता हूं कि एक दिन मैं इसी स्टेडियम में रहने के लिए आया था और संयोग देखिए कि आज इसी स्टेडियम में मेरा ऑफिस है और मैं यहीं से पूरी दिल्ली के खेल-कूद पर नजर रखता हूं। जीवन में तमाम उतार-चढ़ाव आए, पर छत्रसाल स्टेडियम का पहला दिन कभी नहीं भूलता। 

तब 978 नंबर की डीटीसी बस मेरे गांव नजफगढ़ से बनकर चलती थी। आजादपुर तक आती थी। मैं उसी बस से आता था। मेरी कोशिश होती कि बस की जो पीछे वाली सीट है, मैं उसी पर बैठूं, क्योंकि उस सीट पर हवा लगती थी। यहां तक पहुंचने के पीछे बड़ा संघर्ष रहा है और उस संघर्ष का एक भी दिन मैं भूला नहीं हूं। राहत की बात यह थी कि संघर्ष जितना भी था, मैं भाग्यशाली था कि मुझे अच्छे गुरु मिले, अच्छे माता-पिता और अच्छे दोस्त मिले। हर स्थिति में ये लोग मेरे साथ खड़े रहे। हम लोग मध्यम वर्गीय परिवार के थे। मैंने गांव में अपने दादाजी को हल चलाते देखा है। जब वह हल चलाते थे, तो दोपहर की उनकी रोटी लेकर मैं जाता था। मेरे से छोटे दो भाई और एक बड़ा भाई था। घर में चाहे जैसी स्थिति रही हो, मेरे लिए खाने की कमी नहीं रखी गई। मेरे पिताजी एमटीएनएल में ड्राइवर थे। वह भी कुश्ती कर चुके थे, इसलिए वह देख लेते थे कि मेरी जरूरतें क्या हैं? वह इतने बड़े पहलवान तो नहीं बन पाए, लेकिन गांव में जो दंगल होती थी, उसमें जरूर हिस्सा लेते थे। मेरी मां सुबह सबसे पहले उठती थीं। भैंसों को चारा-पानी देना, उनका दूध निकालना, फिर मक्खन बनाना। उनकी बहुत मेहनत थी। मैं बहुत छोटा था, जब अखाड़े में आ गया था, इसलिए वह मुझे बहुत मानती थीं। मैंने बाद में कभी अकेले में उनसे पूछा कि मां, आपको मेरी याद नहीं आती थी? तो उनका जवाब था कि मैं अकेले में बैठकर रो लेती थी। अकेले में इसलिए, ताकि कोई उन्हें रोता देखकर गुस्सा न करे। वैसे हमारा संयुक्त परिवार है। हम चार भाई हैं। ताऊ जी और चाचाजी के बच्चों को मिलाकर मेरी तीन बहनें भी हैं। बचपन से ही कुश्ती में आ गया, इसलिए पढ़ने में बस ठीक-ठाक ही था। सारी पढ़ाई ओपन स्कूल से की है।

गरमी के दिनों में मच्छर से बचने के लिए हमारे पास मच्छरदानी तक नहीं होती थी। कूलर की तो बात ही दूर है। तमाम सुख-सुविधाओं से दूर मैंने अपना बचपन बिताया है। बाद में समझ आया कि खेल एक तपस्या है। छोटी सी उम्र में ही खिलाड़ी बहुत कुछ सीख जाता है, जो पूरे करियर में काम आती हैं। यहां तक कि बाद में जब मेरी शादी हुई, तो मैंने ‘रियलाइज’ किया कि कैसे पत्नी और बाद में बच्चे आपके लिए त्याग करते हैं। मेहनत, संघर्ष, कामयाबी, त्याग मैंने सब कुछ अपने करियर में देख लिया है। बचपन में मैंने ज्यादा शरारत नहीं की। इसीलिए पिताजी या मां से कभी मार नहीं पड़ी। पिताजी ने एकाध बार डांटा या मारा भी, तो रेसलिंग में कम खाना खाने के लिए। मैं कम खाना खाता था, तो वह नाराज हो जाते थे। कहते थे- दूध और पी। अगर मैं उनकी बात नहीं मानता, तब वह गुस्सा हो जाते थे। एकाध बार उन्होंने पिटाई की। दादाजी से भी एकाध बार पिटा हूं। दरअसल, मैं बच्चों को उठाकर पटक दिया करता था, बाद में जब घर पर शिकायत आई, तो दादाजी ने पिटाई की थी। 
मेरे दादाजी की हमारे गांव में बड़ी इज्जत थी। वैसे तो वह मुझे बहुत प्यार करते थे, लेकिन अगर कोई मेरी शिकायत करने आ जाता, तो वह मुझे उसके सामने ही पीट देते थे। मैं कभी-कभी उनसे कहता भी था कि क्या दादा जी, ऐसे तो आप बहुत प्यार करते हो, लेकिन सबके सामने पीट भी देते हो। मेरे दादाजी हर बात का फैसला सामने-सामने करना पसंद करते थे। (जारी...)

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  • Web Title:famous wrestler Sushil Kumar article in Hindustan on 03 may