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मेरे अंदर कोई सपना नहीं था

अलका याग्निक, प्रसिद्ध गायिका

बचपन से ही मेरी आदत थी कि जब मेरा मन होता, तब तो मैं गाती थी, लेकिन मुझे यह नापसंद था कि किसी और के कहने पर मैं गाना गाने लगूं। एक तरह से बहुत मूडी थी। 9-10 साल की उम्र में ही मेरे ‘पैरेंट्स’ मुझे स्कूल की छुट्टियों में मुंबई ले आए थे। उन लोगों ने तभी मुझे तमाम संगीतकारों के पास ले जाना शुरू कर दिया था। कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के पास। उन दिनों इन संगीतकारों से मिलना आसान काम नहीं था। आज लोग आपकी पहुंच में हैं, लेकिन उन दिनों इन लोगों से मिलना, इनसे बात करना, बड़ा मुश्किल होता था। किसी तरह पापा-मम्मी ने मेहनत करके अपॉइंटमेंट लेकर मुलाकात की। इन संगीतकारों ने मुझे सुना। सभी ने मेरा बड़ा हौसला बढ़ाया और साथ ही यह भी कहा कि अभी अलका बहुत छोटी है। इसकी आवाज में थोड़ी ‘मैच्योरिटी’ आए, तभी इसको ‘प्लेबैक सिंगिंग’ करनी चाहिए। अगर अभी ये बच्चे के गाने गाएगी, तो फिर हमेशा बच्चे के गाने ही गाती रहेगी। कल्याणजी-आनंदजी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने मुझे बहुत ‘ग्रूम’ किया। मैं इन लोगों की रिकॉडिंग सुनने जाती थी। देखती थी कि ये लोग किस तरह से काम करते हैं। कल्याणजी-आनंदजी ने तो बहुत ज्यादा सिखाया। प्लेबैक गायकी की हर एक बारीकी उन लोगों ने मुझे सिखाई।  

मैं जिस स्कूल में पढ़ती थी, वो बहुत नियम-कायदे वाला स्कूल था। वहां अक्सर लड़कियां टीचर्स से कहती थीं कि प्लीज, आज पढ़ाइए मत, आज अलका का गाना सुनेंगे। कई टीचर्स भी मेरे गाने में बहुत ‘इंटरेस्ट’ लेती थीं। अक्सर स्कूल में ‘फ्री पीरियड’ ‘डिक्लेयर’ हो जाता था और मैं क्लास के बीच में बैठकर गाना गाती थी। एक बार तो प्रिंसिपल ने आकर कहा कि बंद करो ये सब, यह स्कूल है, यहां हर वक्त गाना-बजाना क्यों चलता रहता है? स्कूल में ‘कल्चरल एक्टिविटीज’ बहुत होती थीं। डांस-ड्रामा खूब होता था। मैं हमेशा इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेती थी, क्योंकि इसी बहाने मुझे रिहर्सल के नाम पर पढ़ाई से छुट्टी मिल जाती थी। स्कूल में हर कोई यह कहता था कि एक दिन अलका बहुत बड़ी सिंगर बनेगी और मैं कहती थी कि नहीं-नहीं, मैं तो बस ऐसे ही गाती हूं। 
 
पढ़ने में मेरा बिल्कुल मन नहीं लगता था, लेकिन नंबर अच्छे आते रहे, क्योंकि पढ़ाई को लेकर एक ‘बेसिक’ समझ मेरे अंदर थी। यह भी सच है कि अगर मैं अपने आप को ‘अप्लाई’ करती, तो फिर एक ‘ब्रिलिएंट स्टूडेंट’ हो सकती थी। पढ़ाई में अच्छी थी, पर कोशिश नहीं करती थी। स्कूल जाना पसंद तो था, लेकिन ‘एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटी’ के लिए। पढ़ना-लिखना बहुत पसंद नहीं आता था। मेरा स्कूल बहुत ‘पर्टिकुलर’ था। हमारी प्रिंसिपल एक यूरोपियन महिला थीं। इसलिए वहां कोई ‘कैजुअल सिस्टम’ नहीं चलता था कि पढ़ाई-लिखाई किए बिना काम चल जाए। ऐसा भी नहीं होता था कि कोई टीचर मेरी गायकी से बहुत खुश है, तो वह ‘एक्स्ट्रा’ नंबर दे दे। पापा-मम्मी भी पढ़ाई को लेकर किसी तरह की रियायत नहीं देते थे। गाने के साथ-साथ पढ़ाई करनी पड़ती थी। गायकी में वे मुझे कुछ बनाने के लिए सोचते भी नहीं थे। वे तो बस यही चाहते थे कि मेरे अंदर अगर कोई पैदाइशी हुनर है, तो मैं उसका कुछ करूं। मैंने मुंबई बहुत कम उम्र में जाना शुरू कर दिया था, इसलिए उन्हें यह भी लगता था कि अभी मेरे पास बहुत सारा वक्त है। ऐसा नहीं था कि वक्त निकला जा रहा है, अब क्या करियर बनाएंगे? वे लोग तो पूरे धैर्य और संयम से थे कि अभी बिटिया बहुत छोटी है, धीरे-धीरे उसका रास्ता बनेगा। लेकिन मैं परेशान हो जाती थी कि यह चक्कर कब तक चलेगा?

मेरे अंदर कोई सपना भी नहीं था कि मुझे कोई बहुत बड़ी गायिका बनना है या कोई बहुत बड़ा स्टार बनना है। मैं बिंदास थी। जो भी संघर्ष था, वह मेरे पापा-मम्मी ने किया। मेरी मुश्किल बस यह थी कि लंबे समय तक मैं मुंबई सिर्फ छुट्टियों में जाती थी, लिहाजा अगर कोई मुझे बीच में बुलाना भी चाहे, तब मैं वहां नहीं होती। मान लीजिए कि कोई संगीतकार मुझे अगले महीने की तारीख देता, तो मैं जा ही नहीं सकती थी, क्योंकि अगले महीने तो मुझे कोलकाता में अपने स्कूल में होना होता था। पापा-मम्मी हमेशा कहते थे कि पढ़ाई तो ‘रेग्यूलर’ चलनी चाहिए। पढ़ाई और गायकी का ‘बैलेंस’ उन्होंने ही बनाया। इसीलिए मैं हमेशा कहती हूं कि पापा-मम्मी के परिश्रम और उनके ‘मोटिवेशन’ से ही मैं जो हूं, सो हूं। वरना मैं यूं ही शौकिया गाती रहती। (जारी...)

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  • Web Title:Famous Singer Alka Yagnik article in Hindustan on 28 october