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पहलवान पिता की आंखों में आंसू

हरिप्रसाद चौरसिया, प्रसिद्ध बांसुरी वादक

एक बार बाबा अलाउद्दीन खान साहब ने मुझे सुना। उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ मैहर चलो। मेरे पास उन्हें सच बताने के अलावा कोई चारा नहीं था। मैंने उन्हें बताया कि अगर मैं उनके साथ गया, तो मेरे पिताजी मुझे तोड़ देंगे। वह पहलवान हैं। फिर मैंने उनसे कहा कि अगर मौका मिला, तो जरूर आऊंगा। उन्होंने उस रोज मुझसे कहा कि मैं ज्यादा दिन अब जिंदा नहीं रहूंगा। मेरे न रहने पर भी अगर सीखने का मन करे, तो मेरी बिटिया के पास जाना। बाबा हर महीने इलाहाबाद आया करते थे रेडियो में कार्यक्रम के लिए। वह मुझे संदेश देकर बुलवाया करते थे कि उस लड़के को बुलाओ। वह जिस होटल में ठहरते, उस होटल वाले का बेटा मेरे साथ पढ़ता था। वह आकर मुझे बताता कि बाबा याद कर रहे हैं, तो मैं जाता था उनसे मिलने। मैं उन्हें प्रणाम करता, तो खुश होकर पास बिठा लेते और फिर कहते- चलो, अब मेरे साथ बजाओ। फिर वह वायलिन ले लेते थे। उनका स्केल भी ‘ई’ था। मैं उनके साथ बजाने में बहुत डरता था। मैं उन्हें सुनने बैठ जाता था। फिर वह कहते- बजाओ। मैं कहता था कि बाबा, आपके साथ मैं नहीं बजा सकता हूं। मैं बस आपको सुनूंगा। वह मुझे बहुत प्यार करते थे। खुद ही कहते कि नहीं-नहीं, तुम भी बजाओ। 

इधर घर की हालत कुछ ऐसी थी कि चाहकर भी बांसुरी को लेकर ज्यादा बात नहीं हो सकती थी। मां के जाने के बाद पिताजी ने इसलिए शादी नहीं की थी कि वह हमारी देखभाल किसी और से नहीं कराना चाहते थे। कई बार तो वह हम लोगों के लिए खुद खाना पकाया करते थे। उन्होंने हम लोगों की देखभाल में कोई कमी नहीं की। इसी तरह मेरा सीखना चलता रहा। इलाहाबाद में रेडियो से जुड़े होने की वजह से पैसे भी मिलते थे। लेकिन फिर मुझे ओडिशा में नौकरी मिल गई। मैंने तय किया कि मैं जाऊंगा। पिताजी को जब पता चला कि मैं ओडिशा जाने के लिए तैयार हूं, तो उन्हें बहुत दुख हुआ। एक तो मैंने छिप-छिपकर बांसुरी बजाना सीखा था। उसके बाद मैंने उन्हें बताए बिना ही नौकरी पर जाने का फैसला कर लिया। जाहिर है, उन्हें दुख हुआ था। उस रोज मैंने अपने जीवन में पहली और आखिरी बार किसी पहलवान की आंखों में आंसू देखे। उन्होंने पूछा कि बेटा क्यों जा रहे हो? तो मैंने उन्हें बताया कि जितने पैसे मुझे यहां मिलते हैं, उससे दोगुनी तनख्वाह वहां मुझे सरकार की तरफ से मिलेगी। तब भी उनकी इच्छा नहीं थी कि मैं जाऊं। मैंने उनसे झूठ बोला कि मैं जल्दी ही वापस आ जाऊंगा। यह बताकर मैं निकल गया। बाद में जब उन्हें लोगों ने बताना शुरू किया कि आपका बेटा यहां बजा रहा था, वहां बजा रहा था, तो वह संतुष्ट हो गए। उन्हें खुशी होने लगी। मैंने कई बार प्रयास किया कि उन्हें अपने साथ ले आऊं , लेकिन वह माने नहीं। वह दूसरों से मेरी तारीफ-सुन सुनकर खुश हुआ करते थे। 

कुछ समय बाद ओडिशा में हमारा थोड़ा नाम हो गया। बहुत सारे लोग मुझे सुनने आते थे। कई लड़कियां हमको सुनने के लिए आती थीं। कोई खाना बनाकर ला रहा है, तो कोई नाश्ता बनाकर ला रहा है। कुछ लोगों को मुझसे थोड़ी जलन होने लगी कि बाहर से आकर यह कलाकार इतना नाम कमा रहा है, इतना लोकप्रिय हो रहा है। वहां के एक अधिकारी ने जान-बूझकर मेरा ट्रांसफर मुंबई कर दिया। मुंबई को उस समय काले पानी की सजा की तरह देखा जाता था, क्योंकि उस वक्त मुझे जितने पैसे मिलते थे, उतने में मुंबई में गुजारा करना बहुत मुश्किल था। यह अलग बात है कि मेरी किस्मत में कुछ और ही लिखा था। मुंबई में ही फिल्मों में काम करने की शुरुआत हुई।

जब मैं मुंबई आ गया, तब मुझे लगा कि इससे अच्छा मौका और क्या हो सकता है? यह सोचकर मैं अन्नपूर्णाजी के पास गया। वह सुरबहार की मशहूर कलाकार और अलाउद्दीन साहब की बेटी थीं। उन्होंने साफ कह दिया कि वह फिल्मों में बजाने वालों से दूर रहती हैं। उनको मनाने का दौर 2-3 साल तक चलता रहा। मैंने एक रोज तो यहां तक कह दिया कि अगर आप नहीं सिखाएंगी, तो मैं अब सीखूंगा भी नहीं। स्टूडियो में ही बजाता रहूंगा और स्टूडियो में ही एक दिन दम तोड़ दूंगा। फिर दो-तीन साल बाद वह मान गईं। उन्होंने मुझसे कहा कि ये फिल्म संगीत नहीं है, अगर शास्त्रीय संगीत सीखना चाहते, हो तो कुछ करना होगा। मैंने भी बात-बात में दाएं हाथ की बजाय बाएं हाथ में बांसुरी पकड़कर बजाई और उन्हें सुनाया। वह मैहर की बड़ी संभ्रांत महिला थीं। ऐसे किस्से भी मशहूर हुए कि उन्होंने एक दिन मुझे डराने के मकसद से पुलिस को बुलाने की धमकी दी थी, लेकिन इसमें कुछ भी सच नहीं है। (जारी...)

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  • Web Title:famous flute player Hariprasad Chaurasia article in Hindustan on 26 august