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और बन गई शिव-हरि की जोड़ी

हरिप्रसाद चौरसिया, प्रसिद्ध बांसुरी वादक

शिव-हरि के तौर पर मेरी और शिव कुमार जी की जोड़ी ने कामयाबी का जबरदस्त दौर देखा। हालांकि बाद में हम लोगों ने फिल्मों में काम करना छोड़ दिया। इसकी वजह बड़ी साफ थी, अब उस तरह की फिल्में कहां बन रही हैं? अनारकली, मुगल-ए-आजम, बैजू बावरा अब कहां बनती हैं? हमारे लिए फिल्म संगीत कभी प्राथमिकता नहीं था। हमने फिल्मों का संगीत तभी किया, जब शास्त्रीय कार्यक्रमों से समय मिलता था। दोनों के बीच हमेशा संतुलन रखा। आज अगर उस तरह की फिल्म हमारे पास लेकर कोई आए, तो मैं और शिवजी फिर साथ काम करेंगे। आज जैसी फिल्मों में काम करके क्यों हम नाम खराब करें? हम म्यूजिक डायरेक्टर बनने के लिए मुंबई आए भी नहीं थे। पहले भी हम दोनों फिल्म के ऑफर काफी सोच-समझकर साइन करते थे। यूं तो मैंने एक बांसुरी वादक के तौर पर उस दौर के सभी बडे़ संगीतकारों के लिए काम किया था, मगर बतौर स्वतंत्र संगीत निर्देशक मैंने शिवजी के साथ ही काम किया। 

शिव-हरि बनने की कहानी भी दिलचस्प है। 70 के दशक में हम दोनों की स्वीडन में एक रिकॉर्डिंग थी। उस एलबम का नाम था जुगलबंदी, जिसमें राग झिंझोटी और राग पीलू था। एलबम का कवर डिजाइन होना था। कवर पर जब हम दोनों के नाम लिखे गए, तो जगह बहुत ज्यादा लग रही थी। हरिप्रसाद चौरसिया और शिवकुमार शर्मा, इतनी जगह सिर्फ नाम में चली जाए, तो वह कवर कम पोस्टर ज्यादा लग रहा था। तय हुआ कि नाम छोटे कर लिए जाएं। शिव-हरि ही एक विकल्प था। शिवजी का नाम पहले रहे मैं ऐसा चाहता था। अव्वल तो वह मुझसे उम्र में थोड़े बड़े हैं। इसके अलावा बचपन में मेरे जिस भाई की मृत्यु हो गई थी, उनका नाम शिव ही था। इसलिए भी मैं चाहता था कि शिवजी के बाद ही मेरा नाम आए। शुरू में जब हम लोगों ने एक साथ फिल्मों का संगीत देना शुरू किया, तो शास्त्रीय जगत से कुछ आपत्तियां भी आईं। कुछ लोगों ने कहा कि क्या हमने पैसों की खातिर शास्त्रीय संगीत से दूरी बनाई है? मगर जैसे ही सिलसिला  रिलीज हुई और उसका संगीत लोगों ने सुना, तो आपत्तियां दूर होती चली गईं। इसकी वजह शायद उस संगीत में मजबूत शास्त्रीय आधार रहा होगा। 
 
शास्त्रीय कार्यक्रमों में अब भी काफी व्यस्तता रहती है। अब भी लगातार दौरे करते रहते हैं। अपने समकालीनों और नए कलाकारों से मिलना-जुलना चलता रहता है। आपस में हंसी-मजाक भी चलता रहता है। अभी दुबई के एक कार्यक्रम में हम, जसराजजी और शिवजी साथ में थे। हम लोगों की मजाकिया बातें चलती रहती हैं। यहां तक कि कई बार आयोजक भी आकर हल्के-फुल्के क्षण साझा करते हैं। अभी हाल ही में बेंगलुरु में एक विदेशी बैंड के साथ मेरा कार्यक्रम था। कार्यक्रम के दौरान आयोजक ने मुझसे पूछा कि आपके पिताजी ने आपका नाम हरिप्रसाद कैसे रखा? उनको कैसे पता था कि आप बांसुरी बजाएंगे? ऐसा हंसी-मजाक भी चलता रहता है। मैं खुद को भाग्यशाली मानता हूं कि मुझे अपने बुजुर्ग कलाकारों का बड़ा आशीर्वाद मिला। खासतौर पर पंडित भीमसेन जोशी जी से बड़ा स्नेह मिला। वह बिल्कुल संत थे। किसी भी हाल में हों, अगर तानपुरा लग गया, तो ऐसा गाते कि दुनिया सुनती रह जाए। लोग उनके बारे में कहते थे कि उन्होंने पी है, लेकिन जब एक बार तानपुरा मिल गया, तो उसके बाद उनको सुनकर ऐसा लगता था कि कोई संत ऊपर से आ गया है। अब ऐसे लोग पैदा नहीं होंगे। 

ऐसे ही उस्ताद बिस्मिल्लाह खां बहुत बड़े कलाकार थे। शहनाई को उन्होंने जन्म दिया और उसे अच्छी अवस्था में पहुंचाया। संगीतप्रेमी लोग हमेशा उन्हें याद करेंगे। उनके जाने के बाद शहनाई की हालत अच्छी नहीं है, जिसको देखकर दुख होता है। शहनाई के लिए उन्होंने बहुत बड़ी जगह बनाई। न्यूयॉर्क के एक कार्यक्रम की याद मुझे ताजा है। वहां मेरा कार्यक्रम उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के साथ रख दिया गया था। जब मुझे पता चला, तो मैंने पूरी विनम्रता से बताया कि मैं खां साहब के साथ नहीं बजा सकता हूं। उनको हम लोग बचपन से बजाते देखते आए हैं। मैं उनके साथ स्टेज साझा करने की हिम्मत नहीं कर सकता। हां, उनके बजाने के बाद कुछ मिनट मैं भी जरूर बजाऊंगा। वहां मौजूद श्रोता इस बात के लिए राजी हो गए। खां साहब मुझे बहुत प्यार करते थे। बनारस में जब कभी मैं कार्यक्रम करता था। वह आगे की लाइन में बैठे दिखते थे। हमेशा बहुत दाद देते थे। यूं समझिए कि खां साहब का आशीर्वाद मिल गया, तो फिर सभी का आशीर्वाद मिल गया। 

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  • Web Title:famous flute player Hariprasad Chaurasia article in Hindustan on 09 september