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फिल्म संगीत ने बदल दी राह

हरिप्रसाद चौरसिया, प्रसिद्ध बांसुरी वादक

मुंबई का काला पानी मेरे लिए सफेद पानी की तरह निकला। वहां रेडियो के कार्यक्रम कर ही रहा था कि फिल्मी दुनिया के कुछ बड़े संगीतकारों ने भी मेरी बांसुरी सुनी और मुझे बुला लिया। मदन मोहन साहब हों या रोशन, इन लोगों ने मुझे बुलवाया। उनके लिए बांसुरी बजाई, तो बस समझिए की भीड़ लग गई। फिल्म का काम तो बहुत जोर से चला। रेडियो में तो बहुत कम पैसे मिलते थे, यही सोचकर मुझे मुंबई भेजा भी गया था। लेकिन ईश्वर की कृपा से सब बहुत अच्छा हो गया। बाद में मुझे ही रेडियो छोड़ना पड़ा कि अब मैं नहीं कर सकता हूं। तब जितने भी संगीत निर्देशक थे, सभी का अपना-अपना घराना था। उनकी अलग-अलग पहचान थी। उन लोगों के साथ काम करके मुझे भी बहुत कुछ सीखने को मिला। वे बड़े अच्छे लोग थे। बड़ी इज्जत करते थे। उनके घर में कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। एक दफा बेगम अख्तर का कार्यक्रम रखा गया था। ऐसे कार्यक्रमों में बहुत कमाल की बातें हुआ करती थीं। 

मदन मोहन साहब का मेरे ऊपर गजब का भरोसा था। जब मैं बजाता, तो वह दूर खड़े होकर बस सुनते थे। अपने असिस्टेंट को उन्होंने कह रखा था कि इन्हें मत छेड़ना, ये जो करना चाहते हैं, इन्हें करने दो। हम लोगों को कभी उन्होंने नहीं कहा कि ऐसे बजाइए या वैसे बजाइए। जो बजाया, वह उसी को ठीक मानते थे, अगर सम भी लगा दिया, तो खुश हो जाते थे। अब तो समय पूरी तरह बदल चुका है। अब तो रिकॉर्डिंग कहां हो रही है, मिक्सिंग कहां हो रही है, कुछ पता ही नहीं चलता। यह वही समय था, जब मैं और शिव कुमार शर्मा फिल्म इंडस्ट्री में एक समय पर काम कर रहे थे। हम दोनों के बारे में यह बात मशहूर थी कि हमें म्यूजिक डायरेक्टर कुछ नहीं बताता। हम अपना आप काम खुद ही करते हैं। यश चोपड़ा को लगा कि अगर इन दोनों को कोई फिल्म दी जाए, तो कुछ अच्छा ही करेंगे। उन्हीं की तरफ से ऑफर आया। हम लोगों ने आपस में बात की और कहा कि हम बिल्कुल करेंगे। हम फिल्मों के लिए काम कर ही रहे थे, फिर संगीत निर्देशन क्यों नहीं? पहली-पहली फिल्म थी- सिलसिला।  फिर सिलसिला  के बाद फासले, लम्हे, चांदनी, डर  जैसी फिल्में हमने उनके लिए कीं, इन सभी का संगीत बहुत लोकप्रिय हुआ। किसी भी शास्त्रीय कलाकार के नाम से इस तरह का फिल्म संगीत का काम जुड़ा नहीं है। हम लोग दिन भर संगीत में ही डूबे रहते, इसलिए फिल्मों का संगीत बनाने में बहुत ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। हम लोगों के लिए वह आसान काम था। हम यूं भी दिन भर स्टूडियो में रहकर संगीत बनने के अलग-अलग आयाम देखा ही करते थे। 

हमारी एक आदत और थी। अगर हमें लगता था कि कोई बदलाव कराना है, तो हम वह भी कराते थे। फिल्में साइन करने का फैसला हम दोनों मिलकर ही करते थे। उनके साथ नजदीकी कुछ इस तरह की रही कि जो वह सोचते थे, ठीक उसी वक्त मैं भी वैसा ही कुछ सोच रहा होता था। जब मैं कुछ सोचता था, तो कुछ वैसा ही वह भी सोच रहे होते थे। दोनों के विचार बहुत मिलते-जुलते हैं। इसीलिए साथ काम करना बहुत आसान रहा। कभी मुझे कोई गाना अच्छा लगता था, तो मैं गुनगुनाता था। कभी वह ऐसा ही करते। ये आपसी समझ ही हम लोगों के संगीत के कामयाब होने की वजह रही। जारी...

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  • Web Title:famous flute player Hariprasad Chaurasia article in Hindustan on 02 September