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बिजली चली गई, मैं बजाता रहा बांसुरी

हरिप्रसाद चौरसिया, प्रसिद्ध बांसुरी वादक

मैं जब तक इलाहाबाद में था, वहां संगीत की ऐसी कोई अहमियत नहीं थी। सिवाय ऑल इंडिया रेडियो के और कुछ वहां नहीं था। बनारस से कई कलाकार वहां कार्यक्रम करने आते थे, क्योंकि तब बनारस का अपना कोई रेडियो स्टेशन नहीं था। हम लोग उन कलाकारों के दर्शन करने जाया करते थे कि कितने महापुरुष लोग हैं? मैं तो बच्चों के कार्यक्रम भी किया करता था। लिहाजा मेरा वहां वैसे भी आना-जाना था। मेरे गुरु पंडित भोलानाथ जी की नौकरी भी वहीं पर थी। इलाहाबाद में एक प्रयाग संगीत समिति थी। वहां साल में एक बार हिन्दुस्तान के सभी बड़े कलाकार आते थे। बडे़-बड़े कलाकार वहीं टेंट में रुका करते थे। वहां समिति के मैदान में ही टेंट लगाया जाता था। तब वहां संगीत की इतनी अहमियत नहीं थी, जितनी आज है। तब आम घरों में मां-बाप कहते थे कि संगीत के क्षेत्र में जाओगे, तो भीख मांगोगे, क्योंकि कोई ज्यादा कार्यक्रम नहीं होते थे। होते भी थे, तो कलाकारों को पैसे नहीं मिलते थे। अब उसका पूरा रूप ही बदल गया है। यह बदला हुआ स्वरूप कितने दिनों तक रहेगा, कुछ कह नहीं सकते, क्योंकि तमाम सरकारी नियम आ गए हैं। जीएसटी आयोजकों को भी देना है और कलाकारों को भी देना है। 

इलाहाबाद में पैदा होने के कारण अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि मुझे बनारसी गुरु क्यों बुलाया जाता है? दरअसल, यह बनारस की भाषा है। वहां किसी को भी गुरु बना लेते हैं। पान वाले को भी गुरु बना लेते हैं। गुंडों को भी गुरु बना लेते हैं। मुझे भी वहां लोगों ने प्यार से गुरु आ गए, गुरु आ गए कहकर बुलाना शुरू कर दिया। इसका कोई मतलब नहीं है। लेकिन मेरा नाम बनारसी गुरु जरूर पड़ गया। बनारस में दर्जनों बार कार्यक्रम के लिए गया हूं। वहां की तमाम यादें जिंदा हैं। मेरा पहला कार्यक्रम रेडियो का था- बच्चों का कार्यक्रम। उस कार्यक्रम में कई जाने-माने कलाकार हिस्सा लेते थे और गायन-वादन करते थे। लोग दूर-दूर से सुनने आते थे कि चलो भाई, बच्चे बहुत अच्छा गा-बजा रहे हैं। इससे हम लोगों की भी हिम्मत बढ़ी कि हम गा-बजा सकते हैं। बाद में 1969 में मैंने इलाहाबाद छोड़ दिया और उड़ीसा (अब ओडिशा) पहुंच गया नौकरी करने। वहां बहुत सारे कार्यक्रम होते थे। वहां ओडिसी नृत्य देखने वाले बहुत से लोग होते थे, पर शास्त्रीय संगीत सुनने वाले लोग कम ही होते थे। 

मैंने ऐसे भी कार्यक्रम किए हैं, जब सुनने वाला कोई न था, और जो था, उसे भी लोग वापस बुला रहे थे। यह बात उस वक्त की है, जब मैं स्टेनोग्राफर था और उसके बाद ऑल इंडिया रेडियो में नौकरी के लिए कटक गया था। वहां मैं पहली बार बजा रहा था। मेरे साथ पंडित भुवनेश्नर मिश्रा थे। वह भी ओडिशा के बड़े नामी कलाकार थे। हम लोगों का कार्यक्रम एक बड़े मैदान में होना था। वहां बहुत सारे लोग बैठे हुए थे। हमारी प्रस्तुति से ठीक पहले डांस का कार्यक्रम था। डांस खत्म होने के बाद जब स्टेज खाली हुआ, तो अभी हम लोगों ने स्टेज पर बैठना शुरू किया ही था कि देखालोग उठकर जाने लगे हैं। तीन-चार सौ लोग एक साथ उठकर जा रहे थे। बस कुछ बच्चे बचे थे वहां, जो सो गए थे। जो लोग जा रहे थे, उनमें से किसी ने चिल्लाया- चलो जल्दी-चलो जल्दी। मेरे कान में भी यह आवाज गई। हम लोगों ने हाथ जोड़कर कहा कि भैया, आप लोग तो जा रहे हैं, इन बच्चों को तो रहने दीजिए। कम से कम इनको तो सुनने दीजिए। वह कार्यक्रम कभी भूलता नहीं मुझे। 

ऐसे ही एक बार मैं दिल्ली में बजा रहा था। शंकर लाल फेस्टीवल चल रहा था। मैं जब बजा रहा था, तभी लाइट चली गई। करीब आधे घंटे तक लाइट नहीं रही। मैंने कहा कि मैं ‘कंटीन्यू’ करूंगा और मैंने किया। लोग बैठे हुए थे। एक आदमी भी नहीं उठकर गया। यह तब की बात है, जब शंकर लाल फेस्टीवल ‘इनडोर’ होने लगे थे। इससे पहले यह कार्यक्रम खुले मैदान में हुआ करता था। लाइट जाने की घटना तब हुई, जब ‘इनडोर’ कार्यक्रम चल रहा था। मेरे साथ शफात बजा रहे थे। मुझे लगा कि अंधेरे में लोग कहां जाएंगे, इसलिए मैंने बजाना जारी रखा। फिर जैसे ही लाइट आई, मेरा फ्लूट ‘क्रैक’ कर गया। तब मुझे रुकना पड़ा। लोगों में बड़ा उत्साह था। वे ताज्जुब में थे कि मैंने कैसे बगैर साउंड सिस्टम और माइक्रोफोन के ‘कंटीन्यू’ किया होगा।  उस कार्यक्रम की याद भी अभी तक मेरे जेहन में ताजा है। उस दिन मैं धन्य हो गया। मुझे याद है, वह गरमी का दिन था। सब अंधेरे में बैठे हुए थे। भगवान ने शायद कहा होगा कि इसकी परीक्षा लेते हैं, कोई नहीं जाएगा। सारे सुनने वाले बैठे हुए थे। (जारी...)

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  • Web Title:famous flute player Hariprasad Chaurasia aritcle in Hindsutan on 19 august