DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हमारे लिए शाहिद भाई भगवान थे

धनराज पिल्लै, प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी

एक बार मेरे बडे़ भाई ने हमारे मोहल्ले के सभी लड़कों को ले जाकर मोहम्मद शाहिद भाई से मिलवाया कि ये सारे बच्चे हॉकी खेलते हैं और आने वाले समय में ये सब बडे़ खिलाड़ी बन सकते हैं। उस दिन शाहिद भाई के साथ सौमैया साहब भी थे। मुझे याद है कि शाहिद भाई को छूने के लिए वहां भीड़ थी। जिसने उनको छू लिया, वह मानता था कि उसने भगवान को छू लिया। मैं जब छोटा था, तब से शाहिद भाई को टीवी पर देखता था। मुझे 1982 का एशियन गेम्स याद है। तब मेरे घर पर डायनोरा का ब्लैक ऐंड व्हाइट टीवी था। शाहिद भाई मैदान के भीतर जो कुछ करते थे, हमारे मोहल्ले के बच्चे उसे दोहराते थे। मुझे बड़ा गर्व है कि मेरे बड़े भाई रमेश पिल्लै, शाहिद भाई के साथ इंडिया कैंप में रूम शेयर करते थे। रमेश भाई जब भी कैंप से आते थे, तो शाहिद भाई के बारे में एक-एक बात बताते थे। वह कैसे खेलते हैं, कैसे कपड़े पहनते हैं, क्या सोचते हैं, अपनी हॉकी को कैसे वह प्रैक्टिस के पहले सुधारते हैं? कैसे हॉकी को तेल में रखते हैं, जिससे हॉकी का ब्लेड चमकता रहे। उनका शॉट्र्स पहनने का ढंग, टी-शर्ट पहनने का तरीका या फिर मोजे पहनने का ढंग। सिनपैड पहनने का तरीका। वे सारी बातें मुझे बहुत प्रभावित करती थीं। मेरे भाई भी बोलते कि अगर हिन्दुस्तान में कोई खिलाड़ी है, तो मोहम्मद शाहिद है। जैसे आज सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान माना जाता है, वैसे ही तब मोहम्मद शाहिद की तूती बोलती थी। 

जब 1986 में बेंगलुरु में नेशनल हुआ, तो मैं सुबह पांच बजे उठकर अंधेरे में वहां के स्टेडियम के बाहर जाकर खड़ा हो गया कि मुझे मोहम्मद शाहिद और मर्विन फर्नांडीज को देखना है। मैं वहां सुबह पांच से सात बजे तक खड़ा रहा। बाद में जब मैं भी इंडिया के लिए खेलने लगा, तो शाहिद भाई खुद बोलते थे कि यह लड़का थोड़ा-बहुत मेरे जैसा खेलता है। मैं बहुत आम परिवार से आया था और मेरी तुलना शाहिद भाई से होती थी। मैंने तय किया था कि मुझे भी थोड़ा-बहुत, जितना मैं कर सकता हूं, उनके जैसा बनकर दिखाना पड़ेगा। दादा ध्यानचंद निश्चित तौर पर हॉकी के पितामह हैं। लेकिन हमने सिर्फ मोहम्मद शाहिद को देखा है। शाहिद भाई के साथ जितने भी बडे़ खिलाड़ी खेले, जैसे जफर इकबाल, मर्विन फर्नांडीज, जोकिम कारवाल्हो हो गए, सब महान खिलाड़ी हैं। जोकिम तो खुद मेरे पर्सनल कोच बन चुके थे। ये सब लोग बताते थे कि टूर के बाद कैसे मोहम्मद शाहिद के पीछे उनके फैन फॉलोवर्स पड़ जाते थे। कभी-कभार तो उनको स्टेडियम छोड़कर निकलना पड़ता था, क्योंकि लोग उन्हें घेर लेते थे। 

यह 2002 की बात है। एशियन गेम्स में हम लोगों की टीम फाइनल में आ गई थी। हम पाकिस्तान को हराकर आए थे। शाहिद भाई उस मैच में सरकार की तरफ से ऑब्जर्वर बनकर आए थे। सब नए-नए खिलाड़ी थे, जुगराज सिंह था, गगन अजीत सिंह था। तब तक शाहिद भाई का फेसकट काफी बदल गया था। जब वह मैदान में आए, तो मैंने अपना सिर उनके पैरों पर रख दिया कि इतना बड़ा खिलाड़ी हिन्दुस्तान की हॉकी टीम को इस तरह आकर मिल रहा है। मुझे आज भी याद है कि जब मैं उनके पैर छूकर ऊपर उठा, तो जुगराज मुझे देखने लग गया। उसने पूछा भी कि पिल्लै भाई, यह कौन हैं, जो आप उनसे इस तरह मिले? मैं बोला- अरे भाई, शाहिद भाई साहब हैं, मोहम्मद शाहिद। उसके बाद तो सभी लड़कों ने उनके पैर छुए। फिर मैंने उनसे कहा कि भाई साहब, आप आइए खिलाड़ियों से मिलिए, उनको बहुत अच्छा लगेगा। शाहिद भाई आए और उन्होंने सभी खिलाड़ियों से मुलाकात की। मुझे भी गले लगाया। 1989 में जब मैं इंडिया नहीं खेला था। नॉर्थ ईस्टर्न रेलवे से शाहिद भाई खेल रहे थे, महेंद्रा महेंद्रा से मैच था। उनकी टीम भी बहुत अच्छी थी। उस मैच में मैं बहुत अच्छा खेला। तब शाहिद भाई ने कारवाल्हो को कहा था कि इस लड़के को बनाना, यह आने वाले समय में जरूर कुछ बनेगा। मैच के पहले मैंने उनके पैर छुए, मैच के बाद उनके पैर छुए। तब तक हॉकी के बारे में थोड़ी समझ आ गई थी कि कौन किस स्तर का खिलाड़ी है। मैं उनसे मिलने का कोई मौका नहीं छोड़ता था। वह दिल्ली आएं या मुंबई, मैं जरूर मिलता था। उनके साथ बैठकर उनकी पुरानी यादें सुनता था। पूछता कि मैंने सुना है कि उस दौरे पर आपने ऐसा किया था- उस दौरे पर आपने वैसा किया था, क्या यह बात सही है? वह अपने अंदाज में कहते- हां बे धनराज, हां बे धनराज। पार्टनर उनका तकिया कलाम था। (जारी...)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Dhanraj Pillai article in HIndustan on 25 February