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त्वरित टिप्पणी: ‘आनंद का दिन’ और ‘नैतिक जीत’ के निहितार्थ

shashi shekhar

‘जो जीता वही सिकंदर’ और ‘हारे को हरिनाम’- ये दो ऐसी कहावतें हैं,जिन्हें हम चुनाव दर चुनाव पढ़ते-सुनते आए हैं। गुजरात के परिणामों ने इन्हें नए मायने दे दिए हैं। भाजपा जीत गई है, उसका मत प्रतिशत बढ़ा है पर सीटें गिरी हैं। कांग्रेस मत प्रतिशत और सीट वृद्धि के बावजूद सरकार बनाने में नाकाम रही है। दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए यकीनन यह ठिठककर सोचने का वक्त है।

पहले भारतीय जनता पार्टी की बात। वह चुनाव क्यों न जीते? नई दिल्ली की हुकूमत पर जब गुजरात से आई हुई एक शख्सियत काबिज हो, तो भारतीय जनता पार्टी के लिए गृह प्रदेश में हारने का क्या तुक? कुछ राजनीतिक समीक्षक ‘तेलुगु बिड्डा’ का उदाहरण देते हुए बात आगे बढ़ाते कि जीर्ण-शीर्ण नरसिंह राव जब प्रधानमंत्री पद पर विराजे, तो यही नारा आंध्र प्रदेश में उछला और कांग्रेस बहुमत से सत्ता पर काबिज हो गई। इस बार मामला ‘गुजरात गौरव’ का है। यहां जान लेना जरूरी है कि नरसिंह राव इस कदर शांत थे कि लोग उन्हें चुप्पा मान लेते। इसके उलट मोदी प्रखर वक्ता हैं और समर्थक उन्हें ‘पराक्रमी’ मानते हैं। वे ‘आक्रमण ही सुरक्षा’ के सिद्धांत के पक्षधर हैं।

उनके पास अमित शाह जैसे सिद्धहस्त सिपहसालार हैं। इन चुनावों के लिए शाह ने एक नई सोच दी थी- पीपी यानी पन्ना प्रमुख। इनका काम ‘संपूर्ण बूथ मैनेजमेंट’ था। जब देश और दुनिया में गुजरात से उठा वैचारिक गुबार चर्चा का विषय था, तब शाह और उनकी टीम चुपचाप चुनावी तैयारियों में जुटी थी। गुजरात में 40 फीसदी से अधिक शहरी मतदाता हैं, जो मोदी के समर्थक रहे हैं। भाजपा इससे आगे के क्षितिज गढ़ने की जुगत में थी।
 
आप सोच रहे होंगे कि अगर इतना सबकुछ भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में था, तो फिर कांग्रेस के पास जीत का सपना बुनने का हक कहां से आया?बता दूं, बहुत कुछ ऐसा था, जो देश की सबसे पुरानी पार्टी के पक्ष में जा रहा था। 22 साल की हुकूमत की वजह से भारतीय जनता पार्टी, ‘एंटी इनकंबेंसी’ का शिकार हो चली थी, उससे निपटने के लिए अहमदाबाद में मोदी और शाह की जोड़ी नहीं थी इसलिए वहां रह-रहकर सियासी भूचाल के झटके महसूस किए जाते रहे। पाटीदारों का आंदोलन इसकी सबसे बड़ी मिसाल है जिसमें पुलिस की गोली से 12 लोग मारे गए। हार्दिक पटेल इसी आंदोलन की उपज हैं। मोदी की विरासत संभालने वाली आनंदी बेन पटेल अपनी समूची परिपक्वता के बावजूद तरुणाई के इस जोश पर काबू नहीं पा सकीं। हाईकमान को उन्हें हटाना पड़ा और उनकी जगह विजय रूपानी आए। तय है, हालात भाजपा की गति को अवरुद्ध कर रहे थे।
 
कांग्रेस के लिए कुछ और भी अच्छी खबरें थीं। हार्दिक पटेल के अलावा ठाकोर समुदाय के अल्पेश और दलितों के बीच से उभरे जिग्नेश जैसे युवा उनकी ताल में ताल मिला रहे थे। भाजपा ने इसे जातिगत विग्रह की संज्ञा दी पर ये तिकड़ी तेज-तर्रार थी। कांग्रेस को इसका लाभ मिलना तय था। इसके अलावा मंदिरों में जानेवाले राहुल, सत्ता को जमकर ललकारने वाले राहुल और जनपक्षधर चेहरे वाले राहुल लोगों को लुभा रहे थे। पिछले चार सालों में ऐसा पहली बार हुआ जब कांग्रेस के तेवर इस कदर तल्ख पर लुभावने थे।
 
सनसनी और रोमांच के इस लम्बे सिलसिले की परिणति सामने है। भाजपा को 99 और कांग्रेस और सहयोगियों को 80 सीटें मिली हैं। यानी भाजपा को 16 सीटों का नुकसान हुआ है। कांग्रेस अपने मतप्रतिशत को बढ़ाने के साथ 16 सीटें बढ़ाने में कामयाब रही। हिमाचल में भी भाजपा बहुमत हासिल कर चुकी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के लिए यह ‘आनंद का दिन’ है। कांग्रेस हिमाचल की हार स्वीकारते हुए गुजरात के जनादेश को अपनी ‘नैतिक जीत’बता रही है।
 
सवाल उठता है कि अगर गुजरात के लोग गम और गुस्से से आंदोलित थे तो कांग्रेस इस लहर का समूचा लाभ क्यों नहीं उठा पाई? वजह साफ है- पार्टी का कमजोर प्रांतीय संगठन और जरूरी जुनून का अभाव। इसी के चलते कांग्रेस के लोग मतदाता को यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहे कि मोदी को उनके ‘होम-ग्राउंड’ पर हराया जा सकता है। कांग्रेस को जल्द से जल्द अपने संगठन को मजबूत करना होगा।
 
अब भाजपा पर आते हैं। यह ठीक है कि 2014 से अब तक मोदी-शाह की जोड़ी ने योगी आदित्यनाथ, रघुवरदास, त्रिवेन्द्र रावत और देवेन्द्र फणनवीस जैसे क्षेत्रीय सूरमाओं को पनपने का अवसर दिया है, पर उसे गुजरात में भी जोरदार क्षत्रप तलाशना होगा। यह आसान काम इसलिए नहीं है, क्योंकि अहमदाबाद में मोदी जी की रिक्ति को भर पाना हरेक के बस की बात नहीं। भाजपा की सरकार को उग्र आंदोलनों का सामना भी करना पड़ सकता है। हार्दिक पटेल ने हार की समूची तोहमत ईवीएम पर मढ़ते हुए अपना आंदोलन पूरे दमखम के साथ जारी रखने की घोषणा भी कर दी है।
 
मतलब साफ है कि इस चुनाव ने जीती हुई भाजपा को पूरे तौर पर सिकंदर नहीं बनने दिया और कांग्रेस को इतना हताश नहीं किया कि वह हरिनाम की शरण में चली जाए। ये परिणाम अगले साल आठ राज्यों के चुनावी रण पर भी असर डालने वाले साबित होंगे। 2018 के इन चुनावों के कुछ महीने बाद लोकसभा के वोट पड़ेंगे और जनमानस पर उनके परिणामों की छाया ताजी होगी।
 
जाहिर है दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए यह आत्मचिंतन का समय है।

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