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सियासी नारों से आगे का जहां

Hindustan Editor Shashi Shekhar

गुजरे हफ्ते की शुरुआती शाम कानपुर के सियासी हलकों में अचानक सनसनी मचनी शुरू हुई। ‘वाट्सएप’ पर अंग्रेजी में लिखा दो पंक्तियों का खत नेताओं, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और समाज के चुनिंदा लोगों के बीच घूम रहा था, जिसका मजमून था-

कानपुर के प्यारे मतदाताओ,
भारतीय जनता पार्टी के महासचिव (संगठन) श्री रामलाल ने आज मुझे सूचित किया है कि मुझे कानपुर या कहीं और से लोकसभा चुनाव नहीं लड़ना चाहिए।
(मुरली मनोहर जोशी)

खत के प्रेषक में भले ही नाम मुरली मनोहर जोशी का दर्ज था, पर उनके हस्ताक्षर नदारद थे। राजनीति के खिलाड़ी जानते हैं, बिना दस्तखत वाली चिट्ठी के भी गहरे सियासी मायने होते हैं। जाहिर है कि कानपुर में टिकट की घोषणा से पूर्व जोशीजी जता देना चाहते थे कि मुझे टिकट नहीं दिया गया है और मैं लालकृष्ण आडवाणी की तरह गुपचुप इस कड़वे सच को स्वीकार नहीं करूंगा। उन्हें यह कहने में भी संकोच नहीं था कि मेरा टिकट कटा है। जाहिर है, जाते-जाते प्रोफेसर जोशी कानपुर के नए भाजपा प्रत्याशी सत्यदेव पचौरी की राह में रोडे़ बिछा गए।

ऐसा नहीं है कि यह प्रतिरोध सिर्फ कानपुर में दिखाई पड़ा हो। माना जा रहा था कि दक्षिण बेंगलुरु से स्वर्गीय अनंत कुमार की पत्नी तेजस्विनी को भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ाया जाएगा। वह चुनावी समर की तैयारी में महीनों से जुटी थीं। राजनीति में पति के स्थान पर पत्नी अथवा अन्य किसी परिवारी जन को लड़ाना जन-सहानुभूति हासिल करने का आजमाया हुआ फॉर्मूला है, मगर जब सूची आई, तो श्रीमती कुमार का नाम नदारद था। पहले तो वह भड़कीं, पर बाद में उन्होंने इस फैसले को अंगीकार करते हुए कहा कि मुझे यह स्वीकार है, क्योंकि इसी से साबित होता है कि हम ‘पार्टी विद डिफरेन्स’ हैं। 

इसी तरह, अपने शहर पटना में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को भी कुछ लोगों ने काले झंडे दिखाए। बताया जाता है कि इन प्रदर्शनकारियों के पीछे पार्टी के एक राज्यसभा सदस्य की प्रेरणा थी। पता नहीं कैसे, उन्हें यह इलहाम था कि बगावती शत्रुघ्न सिन्हा की जगह कमल दल उन्हें पटना साहिब से उतारेगा। ये तीन उदाहरण नामचीन लोगों से संबंधित हैं। ऐसे छिटपुट विरोध जगह-जगह हुए, पर राष्ट्रीय मीडिया की नजर उन पर न पड़ सकी। पिछले दिनों अमित शाह जब आगरा में रैली कर रहे थे, तब 16वीं लोकसभा में फतेहपुर सीकरी का प्रतिनिधित्व करने वाले चौधरी बाबूलाल किरावली में पृथक पंचायत कर रहे थे। चौधरी बाबूलाल का टिकट काट दिया गया है। वह इलाके के फायर ब्रांड नेता माने जाते हैं और अभी तक उनके तेवर बगावती हैं।

यहां यह भी गौरतलब है कि जिस सूची से जोशीजी का नाम नदारद था, उसी में ‘डफली गर्ल’ जयाप्रदा का नाम शामिल था। जयाप्रदा ने एक दिन पहले ही भगवा पार्टी की सदस्यता ली थी। वह रामपुर से समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खां से मोर्चा लेंगी। कभी आजम खां ने उनको रामपुर से चुनाव लड़ाकर जितवाया था, पर राजनीतिक दोस्तियों और दुश्मनियों की मियाद अनिश्चित होती है। अपने निर्वाचन क्षेत्र से वफादारी भी समय-समय का फेर है। ऐसा न होता, तो दो बार पीलीभीत लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुकी मेनका गांधी अपने पुत्र वरुण के लिए सीट छोड़कर सुल्तानपुर न गई होतीं। वरुण पिछली बार सुल्तानपुर से सांसद थे, पर शायद उन्हें वहां की लड़ाई कठिन लगी और अब मेनका वहां अपने सियासी अनुभव और वजन का प्रयोग करती नजर आएंगी।

असंतोष के बगूले महज भाजपा में नहीं फूट रहे। अन्य दल भी इस महारोग के शिकार हैं। यही वजह है कि ऐन वक्त पर तमाम नेता दल, निर्वाचन क्षेत्र अथवा गुट बदलते नजर आ रहे हैं। उनकी परेशानी का एक और कारण है। मतदाता ने मुट्ठी बंद कर रखी है, लिहाजा कोई एक मुद्दा सियासी फिजां में बहुत देर तक असरकारी साबित नहीं हो रहा। यही नहीं, शहरों और गांवों के सियासी विमर्श में बहुत अंतर है। नगरीय मतदाता जहां एयर स्ट्राइक, पुलवामा और राष्ट्रवाद के साथ सियासी शख्सियतों की तुलना करता नजर आ रहा है, तो वहीं गांवों में मुद्दों की प्रधानता है। वहां का वोटर अपनी दिक्कतों के साथ जातीय स्वाभिमान को भी नहीं बिसराना चाहता। यही वजह है कि 2019 के चुनाव पुराने ढर्रे पर लौट रहे हैं। 
यह दुखद है।

भारतीय चुनावों और सियासी शख्सियतों पर गहरी नजर रखने वाली एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स यानी एडीआर ने 2018 के अक्तूबर-दिसंबर में एक सर्वे किया। उसमें उसने जो 10 प्रमुख मुद्दे पाए, वे वही हैं, जिन पर पिछले 70 साल से बहस चल रही है। ये मुद्दे हैं- रोजगार, स्वास्थ्य सेवा, स्वच्छ पेयजल, सड़क, सार्वजनिक परिवहन, सिंचाई, कृषि कर्ज, फसलों की बेहतर कीमत, कृषि सब्सिडी और कानून-व्यवस्था। अगर आप इन मुद्दों के आलोक में सियासी दलों के नारों को देखें, तो असलियत समझ में आ जाएगी। सियासी नारों से न तो गरीबी हटी, न हर हाथ को काम मिला और न हर खेत को पानी।

क्या 17वीं लोकसभा का चुनाव इस वंचना की अगली कड़ी साबित होने जा रहा है? ऐसा नहीं है। एक उदाहरण देता हूं। के चंद्रशेखर राव ने पिछले दिनों तेलंगाना विधानसभा का चुनाव दो-तिहाई से ज्यादा बहुमत से जीता है। उनकी बेटी कविता पिछली बार निजामाबाद निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा पहुंची थीं। इस बार उनके खिलाफ 178 किसानों ने नामांकन दाखिल कर दिया है। ये किसान इस बात से नाराज हैं कि वायदे के बावजूद हल्दी उत्पादकों के लिए बोर्ड का गठन नहीं किया गया। इससे कविता के सामने जो दिक्कत खड़ी हुई, वह अपनी जगह है, परंतु चुनाव आयोग को अभूतपूर्व परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इतने सारे प्रत्याशियों के लिए ईवीएम में जगह नहीं है। अब निजामाबाद जन-प्रतिरोध के साथ एक नया इतिहास रच देगा और वह होगा बैलेट पेपर से चुनाव का।

ये चंद उदाहरण चुनावी जंगजुओं की आंख खोलने के लिए पर्याप्त हैं। वे जान लें, एक सबल प्रतिरोध दूसरे का द्वार खोलता है। मतदाताओं की खिसियाई चुप्पी का दौर अब चुक रहा है और उनके लिए यह वक्त मूल मुद्दों पर लौटने का है।

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  • Web Title:Shashi Shekhar Hindustan Aajkal Column March 31