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मोल-तोल के दौर में लोकतंत्र

Hindustan Editor Shashi Shekhar

आजादी के साथ शुरू हुई भारत-गाथा इस समय गहन परीक्षणों के दौर से गुजर रही है। किसी की नजर में ये साल हमने यूं ही जाया कर दिए, तो कुछ अन्य इस कालखंड को फलदायी बताते हैं। बहस लोकतंत्र का आवश्यक तत्व है, पर तर्क कौशल के धनी हिन्दुस्तानी जरूरी मुद्दों को तार्किक परिणति तक पहुंचाने में अक्सर नाकामयाब हो जाते हैं। दरअसल, हमें यह महारोग 15 अगस्त, 1947 के शुरुआती लम्हों में ही लग गया था। जवाहरलाल नेहरू ने भारत की आजादी को रूपायित करते हुए जिस ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ की बात कही थी, वह अस्तित्व में आते ही वैचारिक कालाजार का शिकार हो गई। वजह? इस बहुलतावादी देश के लोग अपनी राष्ट्रीय अवधारणा के प्रति कितने भी भावुक हों, पर जब चुनने का वक्त आता है, तो वे अपनी सांस्कृतिक पहचान को तवज्जो देते हैं। इसीलिए हमारे चुनाव जातियों, संप्रदायों, भाषाओं, बोलियों और इलाकों के मोहताज होकर रह गए हैं।

सत्तरहवीं लोकसभा चुनाव के लिए जारी गतिविधियों को गौर से देखिए। आप पाएंगे कि सारे चुनावी समीकरण इन्हीं आधारभूत तत्वों पर टिके हुए हैं। कुछ उदाहरण। राष्ट्रीय राजनीति को छोड़िए, अपने सूबे की सियासत में भी ओमप्रकाश राजभर कोई बड़ा दखल नहीं रखते। वह एक बिरादरी के नेता हैं, जिसका पूर्वी उत्तर प्रदेश के विशिष्ट इलाके में दखल है। नतीजतन, वह योगी सरकार में काबीना मंत्री हैं और जब-तब भाजपा की नीतियों के प्रति असहमति जताकर सरकार के लिए छवि का संकट पैदा करते रहते हैं। इसके बावजूद चुनावों से ऐन पहले वह अपने दल के तमाम लोगों को सरकारी ओहदे और सुविधाएं दिलाने में कामयाब हो गए।

इसी तरह, अनुप्रिया पटेल ने पांच साल तक नरेंद्र मोदी की सरकार में सत्ता सुख भोगा। चुनाव आने से पहले उन्होंने भी आंखें दिखानी शुरू कर दीं। नतीजतन, वह अपनी दोनों सीटें बरकरार रखने में कामयाब हो गईं। यही नहीं, भाजपा ने बिहार में जद-यू और लोक जनशक्ति पार्टी को मन-मुताबिक सीटें मुहैया कराईं। इसकी वजह से उसे अपनी पांच जीती-जिताई सीटें न्योछावर करनी पड़ीं।

सुदूर महाराष्ट्र में भी यही कहानी हूबहू दोहराई गई। उद्धव ठाकरे पिछले पांच सालों से अपनी पुरानी पार्टनर भारतीय जनता पार्टी की सरकार को जलील करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे, फिर भी उन्हें मन-मुताबिक सीटें दी गईं। यकीनन, भगवा दल को नीतीश कुमार, उद्धव ठाकरे, अथवा रामविलास पासवान से कोई प्यार नहीं है। बात सिर्फ अधिक से अधिक सीटें जीतने की है, इसमें वह कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता। यही वजह है कि चुनाव की घोषणा होने से काफी पहले उसने इन सौदों पर अंतिम मुहर लगा दी थी।

भाजपा की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस भी ऐसी ही कोशिश कर रही थी, पर उसे ज्यादा मशक्कत करनी पड़ी। तमिलनाडु और महाराष्ट्र में उसे कोई दिक्कत नहीं हुई, पर कभी अपना गढ़ रहे उत्तर प्रदेश में देश की सबसे पुरानी पार्टी को अकेले सत्ता समर में उतरने को बाध्य होना पड़ रहा है। प्रियंका गांधी वाड्रा जब जबरदस्त जयकारों और तालियों के बीच प्रयाग में गंगा-पूजन कर रही थीं, तभी बसपा सुप्रीमो मायावती ने दो ट्वीट जड़ते हुए साफ कर दिया कि बसपा-सपा गठजोड़ में कांग्रेस का कोई स्थान नहीं है।

बिहार में पुराने सहयोगी राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव ने भी आंखें दिखाईं। कांग्रेस 11 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती थी, जबकि तेजस्वी अधिक से अधिक आठ सीटें देने पर राजी थे। इतना ही नहीं, वह सिर्फ उन निर्वाचन क्षेत्रों को छोड़ रहे थे, जो सामाजिक समीकरणों के लिहाज से संप्रग के लिए बहुत शुभ साबित होने वाले नहीं थे। अंतत: कांग्रेस को मिली नौ सीटों के साथ चुनावी गठबंधन हो गया।

जाहिर है, जो कांग्रेस तमिलनाडु, महाराष्ट्र, झारखंड और कर्नाटक में कामयाब थी, उसे दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार में खासा संघर्ष करना पड़ा। ये प्रदेश कितने महत्वपूर्ण हैं, यह बताने की जरूरत नहीं। देश की कुल जमा 543 में से लगभग 25 फीसदी यानी 127 सीटें यहां से आती हैं। इनमें से 111 भाजपा और उसके सहयोगी दलों के पास हैं। 

कांग्रेस और उसके साथियों के लिए यह एक अवसर था। उत्तर प्रदेश और बिहार में वे राज्य औरकेंद्र सरकारों के ‘एंटी इनकंबेन्सी’ का लाभ उठा सकते थे। गठबंधन में हुई देरी ने उनका रास्ता और कठिन कर दिया है। उत्तर प्रदेश में अकेले जूझने की नियति के दूरगामी परिणाम भले ही अच्छे हों, लेकिन क्या कांग्रेस भाजपा से सीधी टक्कर वाले नौ राज्यों में इतना बेहतरीन प्रदर्शन कर पाएगी कि यूपी-बिहार का टोटा पूरा हो सके?

सवाल उठता है कि चुनाव आने पर राष्ट्रीय दल इतने मजबूर साबित क्यों होते हैं? जवाब साफ है,क्षेत्रीय दलों और शख्सियतों ने इलाकाई अथवा जातीय आकांक्षाओं को इतना तूल दे दिया है कि राष्ट्रीय पार्टियां चुनाव जीतने के लिए उनसे समझौता करने पर मजबूर हो जाती हैं। इससे निपटने के लिए भाजपा और कांग्रेस को मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व उभारने की गंभीर कोशिश करनी चाहिए थी, जिसमें वे नाकामयाब रहे हैं। भाजपा नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही है, जबकि कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार की छत्रछाया में आगे बढ़ना चाहती है। चुनावी राजनीति की यह प्रवृत्ति सियासी ब्लैकमेलिंग के खतरे को चुनाव-दर-चुनाव सघन करती चलती है।

यहां यह बताने में हर्ज नहीं है कि देश में सर्वाधिक लंबे समय तक राज करने वाली कांग्रेस अगर नेहरू और इंदिरा के साये में आगे बढ़ती थी, तो उन्हें राज्यों के कद्दावर नेताओं का भी सहारा मिलता था। के कामराज, नीलम संजीव रेड्डी, एस निजलिंगप्पा, अजय कुमार मुखर्जी, मोरारजी देसाई, यशवंतराव चव्हाण, यशवंत सिंह परमार, देवकांत बरुआ आदि ऐसी ही शख्सियतें थीं। यह बात अलग है कि धीरे-धीरे व्यक्ति पूजा पनपती गई और इस तरह की शख्सियतों का क्षरण होता चला गया। आज के इलाकाई नेता उन्हीं की विरासत सम्हालते हैं, पर वे राष्ट्रीय दलों के साये में रहने की बजाय उनसे अपनी शर्तों पर समझौता करना पसंद करते हैं।

एक बहुलतावादी देश में हर क्षेत्र को प्रतिनिधित्व मिले, इससे किसी को इनकार नहीं, पर जब समझौते मौकापरस्ती पर आधारित हों, तो वे लोकतंत्र के लिए शुभ साबित नहीं होते। यही वह मुकाम है, जो चिंतित करता है। मैं ‘आइडिया ऑफ डेमोके्रसी’ का हश्र ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ जैसा नहीं देखना चाहता।

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  • Web Title:Shashi Shekhar Hindustan Aajkal Column March 24