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संतगण, कृपया ध्यान से सुनें

शशि शेखर

अकाल मृत्यु अक्सर अपने पीछे कई अनसुलझे सवाल छोड़ जाती है। मध्य प्रदेश के संत भय्यूजी महाराज की आत्महत्या एक ऐसी ही शोकपूर्ण घटना है। इससे आधुनिक समय, संतत्व और संवेदनाओं पर कई सवाल खडे़ हो गए हैं। 

अवतारों और संतों की पुरातन परंपरा है कि लोग आकुल-व्याकुल मन से उनके पास अंतर्मन में उपजते तापों की शांति के लिए जाते हैं। बुद्ध ने एक बार किसी से कहा था, तुम (लोग) भरे हुए मन से मेरे पास आते हो और बिल्कुल खाली हृदय लेकर जाते हो। बोलचाल के सामान्य मुहावरे का इस्तेमाल करें, तो इसे मन हल्का करना कहते हैं। यह पुराना सिलसिला है। वैचारिक उद्वेलन की स्थिति में हमेशा लोग अपनों को तलाशते आए हैं और जब निजी रिश्ते कष्टकारी बन जाते हैं, तो संत जनता का दुख-दर्द दूर करने का माध्यम बने हैं। इसीलिए किसी संत की आत्महत्या चौंकाती है।

भय्यूजी महाराज का जीवन वैचारिक विरोधाभासों से भरपूर था। वह एक साथ मॉडलिंग, समाज और वैराग्य के विपरीत ध्रुवों को जीते आए थे। उन्होंने संतत्व की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश की। कई गांव गोद लिए, जलाशयों का जीर्णोद्धार कराया और जलधाराओं की सुरक्षा के लिए तमाम कार्य किए। वह बोलते बहुत अच्छा थे, लिहाजा उनके प्रवचनों में अच्छी-खासी भीड़ जुटती। देखते-देखते उनके आश्रम बन गए। भक्तों की जमात बेतहाशा बढ़ती गई और मौकापरस्त सियासत को उनमें संभावनाएं नजर आने लगीं। 

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कुछ दिनों पूर्व जिन संतों को राज्यमंत्री का दर्जा देने के लिए चुना था, उनमें भय्यूजी महाराज भी एक थे। अड़ियल अन्ना हजारे को मनाने के लिए कांग्रेस ने भी उनका इस्तेमाल किया था। मध्य प्रदेश में भाजपा, तो महाराष्ट्र में तमाम कांग्रेसियों से उनकी अधिक छनती थी। भय्यूजी महाराज ने खुद को ऐसी स्थिति में खड़ा करना पसंद किया, जहां सांसारिकता, भौतिकता और अध्यात्म गड्ड-मड्ड हो जाते हैं। वह संन्यास की पुरातन परंपरा के अनुरूप सिर्फ त्याग और तप का ही आलाप नहीं भरते थे, बल्कि गृहस्थ जीवन का पालन करते हुए आप कैसे खुद को सहज-सरल बनाए रखते हैं, इस पर बल देते। पहली पत्नी की मृत्यु के बाद उन्होंने दूसरा विवाह कर लिया था। उनकी दूसरी पत्नी पेशेवर चिकित्सक हैं। पहली पत्नी से जन्मी इकलौती पुत्री को यह नागवार गुजरा।

शोहरत, दौलत और वैभव जिसका हमसाया बन चुके हों, वह खुद अपना भेजा उड़ा ले! यह सवाल से अधिक विस्मय का विषय है। उनके अब तक दो ‘सुसाइड नोट’ पुलिस को मिले हैं, जो उनकी मौत की गुत्थी को और उलझा देते हैं। उनके पास मिली एक डायरी में लिखा मिला कि ‘मैं बहुत तनाव में हूं, इसलिए छोड़कर जा रहा हूं?’ संसार का कोई धर्म आत्महत्या को जायज नहीं ठहराता। वह जिस सहजता व सरलता की बात करते थे, वह जीने के लिए प्रेरित करती है, फिर आत्महत्या क्यों? दूसरों के विवाद सुलझा देने वाले भय्यूजी अपने रिश्तों के अंधेरे बंद कोनों को रोशन करने में यकीनन, नाकामयाब साबित हुए। 

वजह जो भी हो, उनके अवसान के इस दुखद अवसर पर मैं आधुनिक संतत्व पर चर्चा करने की अनुमति चाहता हूं। 30-35 साल पहले एक बार नोएडा में महर्षि महेश योगी से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ था। उनकी सुरक्षा का सरंजाम देख मैं चौंक गया था। उस जमाने में राजनेता भी इतना तामझाम नहीं रखते थे। मैंने उनके एक प्रबंधक से प्रश्न किया था कि अगर ये संत हैं, तो इन्हें निर्भय और विमुक्त होना चाहिए। यह सब क्यों? उनका जवाब था कि विदेश में हिंदू धर्म का प्रतीक बन जाने के कारण ‘तमाम लोग’ इनसे नाराज हो गए हैं। इनका जीवन यूरोप में हमारे सनातन धर्म के लिए जरूरी है, इसलिए हमने ये सारे इंतजाम किए हैं। मेरी उनसे बहस हो गई थी। 

संसार के सभी आध्यात्मिक ग्रंथ कहते हैं कि संत वही, जो सांसारिकता से मुक्त है। ऐसे व्यक्ति को भला किस बात का भय? संसार में जिन लोगों को अवतार अथवा संत कहा गया है, उन्हें ये उपाधियां तभी मिलीं, जब वे काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह के जंजाल से मुक्त हो सके। बुद्ध, महावीर, गुरुनानक, शंकराचार्य, सब पर हमले हुए, पर उन्होंने सुरक्षा नहीं मांगी। और तो और, खुद मोहनदास करमचंद गांधी को 20 जनवरी, 1948 को मारने की कोशिश हुई थी। सरदार वल्लभभाई पटेल ने उनकी सुरक्षा बढ़ाने का आग्रह किया, पर गांधी ने यह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। महज 10 दिन बाद वह मार दिए गए। गांधी ने अपनी जान दे दी, पर उस तत्व को नहीं छोड़ा, जो जीवन-मृत्यु से विमुक्ति दिलाता है। महात्मा शब्द इसी से उपजता है। इसीलिए गांधी का शरीर मरा, नाम नहीं। यह वक्त का फेर है कि समूची दुनिया के सोचने का तरीका बदल गया है।

मैं अक्सर अपने बचपन को याद करता हूं। तब लोग आदर्श गढ़ते नहीं, जीते थे। हमारे चारों ओर जंग-ए-आजादी की ज्वाला में तपे हुए लोगों का जमावड़ा था। ऐसे महानुभावों के अनुभव प्रेरणा देते हैं। 1990 के दशक तक बलिदानी और नि:स्वार्थी लोग प्रतीक माने जाते थे। उनकी उपलब्धियां त्याग से जन्मी थीं, अब लोग उपलब्धियों के बाद त्याग करते हैं। स्टीव जॉब्स से लेकर अजीम प्रेमजी तक अब के त्यागी और समाजसेवी अपनी पेशेवर ऊंचाइयों को छूने के बाद हाशिए के लोगों पर नजर डालते हैं। यही वजह है कि अब स्कूली बच्चों के आदर्श बदल गए हैं। पहले देशभक्त अथवा सांसारिक सुखों का त्याग करने वालों की चर्चा होती थी, आज उन्हें अर्जित करने वाले चर्चित होते हैं। 1990 के बाद पनपे ‘आर्थिक उदारवाद’ ने भौतिक उपलब्धि को ही अंतिम चाहत साबित कर दिया है। 

इसके हिमायती आप से कुछ भी कहें, पर भूलिए मत उपलब्धियों की चाहत अक्सर कुंठाएं देती है और कुंठाओं से अवसाद उत्पन्न होता है। धरती के अन्य हिस्सों का भी यही हाल है। अवसाद तेज भागती इस दुनिया की नई महामारी है और अब इसके उपचारक यानी संत भी इसकी चपेट में आने लगे हैं। भय्यूजी इस वजह से भी याद किए जाएंगे। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि वक्त के इस कठिन दौर में आदमी का इंसान होना मुश्किल होता जा रहा है। 
आप क्या इसे इंसानियत के लिए खतरनाक नहीं मानते? 

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  • Web Title:Shashi Shekhar hindustan aajkal Column for 17 june