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कश्मीर में अगली अग्नि-परीक्षा

Hindustan Editor Shashi Shekhar

क्या आपने राजा मुहम्मद फारुक हैदर खान का नाम सुना है? वह पाक कब्जे वाले कश्मीरी भू-भाग के तथाकथित प्रधानमंत्री हैं। खान साहब पाकिस्तान के एक निजी टीवी चैनल पर एकालाप कर रहे थे कि भारत ने अपने हिस्सेके कश्मीर में जो कार्रवाई की है, उससे अब मैं सीमा के दोनों ओर के कश्मीर का अकेला चुना हुआ प्रधानमंत्री हूं। इस हैसियत से मैं अपने कश्मीरी बेटे-बेटियों से कहना चाहता हूं कि मेरे बच्चो, डरो मत। मैं तुम्हारी हिफाजत करूंगा। उनकी इस तकरीर पर हंसिएगा नहीं। उन्हें शेखियां हांकने के लिए ही बिना हुकूमत का हुक्मरां घोषित किया गया है। पाकिस्तान में इस समय खीझ और बौखलाहट का माहौल है। वहां के सत्ता-सदन ने भारत से कूटनीतिक और सांस्कृतिक नाता तोड़ लिया है। तिजारत पर रोक लगा दी है और समझौता  एक्सप्रेस के पहियों पर ब्रेक लगा दिए हैं। अब अगला चरण संयुक्त राष्ट्र सहित तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर छाती कूटने का है, पर उससे होगा क्या? 

वे जानते हैं कि नई दिल्ली ने यह फैसला समय और हालात को देखकर किया है। इस्लामाबाद इस वक्त मजबूरी के दौर से गुजर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दबाव में पाकिस्तान को अपनी आस्तीन में पाले गए जैश और लश्कर जैसे आतंकी संगठनों के दांत तोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। हाफिज सईद जेल में है और उस पर आतंकवादियों को आर्थिक सहायता देने का आरोप गुजरांवाला अदालत में सही पाया गया है। इमरान खान को अगर आगे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की इमदाद चाहिए, तो उन्हें ऐसे तत्वों का सफाया करना ही होगा। इस बार पाक प्रधानमंत्री आईएसआई के इशारे पर पीछे नहीं हट सकते। ऐसा करने पर पहले से गर्त में गोते खाती अर्थव्यवस्था पाताल की गहराइयों में समाने को मजबूर हो जाएगी।

यह ठीक है कि चीन के साथ पाकिस्तान की दोस्ती बरकरार है। बीजिंग ने जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अलग करने पर आपत्ति व्यक्त की है, परंतु इससे होगा क्या? ऐसी तोहमतें कूटनीति के बाजार में सामान्य हलचल तक नहीं पैदा कर पातीं, क्योंकि विश्व-बिरादरी के तकाजे बदल गए हैं। पता नहीं, आपने लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह का बयान ध्यान से सुना या नहीं। उन्होंने घोषणा की कि जब तक हम पाक अधिकृत कश्मीर और अक्साई चिन नहीं ले लेंगे, तब तक चैन से नहीं बैठेंगे। जानने वाले जानते हैं कि अक्साई चिन का चीन के लिए कितना महत्व है। इसी भू-भाग के दम पर उसने सीपेक (चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर) की घोषणा की थी। यह परियोजना परवान चढ़ने से पहले ही दम तोड़ती नजर आ रही है। फिलवक्त इसका काम रुका पड़ा है और इस्लामाबाद में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के नुमाइंदे खाता-बही जांच रहे हैं कि कहीं पाकिस्तान ने हमारी सहायता राशि से चीनी कर्जे की कुछ किस्तें तो नहीं निपटा दीं?

पाकिस्तान को बली मानने वाले मानते हैं कि इस समय वह अमेरिका की सबसे बड़ी जरूरत है। इसकी वजह यह है कि वाशिंगटन को अफगानिस्तान की पहाड़ी मरुभूमि में 841 अरब डॉलर गंवाने के बाद समझ में आया है कि यह युद्ध पहले दिन से बेमानी था। अमेरिका अब अफगानिस्तान को अपने हाल पर छोड़कर किसी भी तरह वापस आना चाहता है। इसका लाभ उठाते हुए इमरान और जनरल बाजवा की कुटिल जोड़ी ट्रंप प्रशासन पर दबाव बना सकती है कि आप कश्मीर मुद्दे पर हमारा सहयोग करें, ताकि हम अपनी फौजों का ध्यान उत्तर-पश्चिमी सरहदों पर लगा सकें। यह तभी होगा, जब कश्मीर में शांति कायम रहेगी। क्या यह तर्क कारगर साबित होगा?

यकीनन नहीं। अमेरिका समझ चुका है कि वैश्विक आतंकवाद में सक्रिय भूमिका निभाने वाला पाकिस्तान महज हमदर्दी हासिल करने के लिए आंसू बहाता है। उसको इमदाद का जो पैसा दिया जाता है, वह गरीबों के आंसू पोंछने की बजाय हत्यारों की फौज खड़ी करने में इस्तेमाल करता है। पाकिस्तान में चल रहे तमाम आतंकी कैंप और दहशतगर्दी की तंजीमें इसका उदाहरण हैं। अमेरिका और पश्चिमी मुल्कों ने पहले ही इसके खिलाफ दबाव बनाया है। मुद्रा कोष की टेढ़ी नजरें इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। इसीलिए पश्चिमी मुल्कों ने पाक की तमाम मिन्नतों के बावजूद भारतीय कदम की निंदा नहीं की। एस जयशंकर की अगुवाई में विदेश मंत्रालय के अफसर शायद पहले से ही इसका वातावरण बना चुके थे।

कुछ आशंकारथी कश्मीर मसले पर एक और जंग का डर जताते हैं। जो नहीं जानते, उनको बता दूं कि 1970 के दशक तक पाकिस्तान की प्रतिव्यक्ति सकल आय भारत से कहीं ज्यादा थी। चार जंगों और लंबे छायायुद्ध ने उसे दरिद्रता के कगार पर ला खड़ा किया है। यह इस उप-महाद्वीप का ऐसा अभागा देश है, जहां चार बार सैन्य विद्रोह हुए। एक प्रधानमंत्री को फांसी पर चढ़ा दिया गया, तो दूसरा आज जेल में जीर्ण-शीर्ण अवस्था में जिंदगी गुजार रहा है। ऐसे में, पाकिस्तान पांचवां युद्ध छेड़ने की स्थिति में प्रतीत कहां होता है?

तय है, मोदी सरकार ने यह फैसला देश, काल और परिस्थिति के आधार पर किया है। इसीलिए गए गुरुवार की शाम प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम संबोधन में कश्मीर की तरक्की का वायदा किया। उन्होंने उम्मीद व्यक्त की कि घाटी में हालात धीमे-धीमे सुधरते जाएंगे और लोगों की तकलीफें भी कम होती चली जाएंगी। नरेंद्र मोदी ने एक खास वायदा भी जम्मू-कश्मीर के अवाम से किया कि सब ठीक रहने पर  प्रदेश का पुराना ‘स्टेटस’ लौटा दिया जाएगा। यह आश्वासन तमाम शक-शुब्हे दूर करने के लिए काफी है। हालांकि, इम्तिहान का एक दौर बाकी है। घाटी और कारगिल में जब कफ्र्यू हटेगा, तब हालात समूचे तौर पर नियंत्रण में रखने होंगे। एक दिन बाद ईद है और सरकारी तंत्र की असली अग्नि-परीक्षा भी उसी दिन होगी।

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  • Web Title:Shashi Shekhar Hindustan Aajkal Column August 11