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नई उम्र की नई फसल पर नजर

Hindustan Editor Shashi Shekhar

चुनावी आश्वासनों की उस धुआंधार बारिश से एक बार फिर समूचा देश तरबतर है, जो हर पांचवें साल हमें भिगोती है। इस बार हर सियासी दल देश के करोड़ों युवा मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहा है। ये वायदे किस हद तक जमीन पर उतरेंगे? इस प्रश्न का उत्तर अभी नहीं दिया जा सकता, पर युवा अगर चुनावी विमर्श के केंद्र में हैं, तो इसे शुभ शकुन मानना चाहिए।

ऐसा होना ही था। पिछले कई चुनावों में यह सच्चाई उभरकर आई है कि पहली अथवा दूसरी बार वोट डालने वाले मतदाता निर्णायक स्थिति में हैं। आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं। 2014 के आम चुनाव में लगभग 10 करोड़ नए मतदाता जुडे़ थे। इनमें से करीब ढाई करोड़ 20 वर्ष से कम के थे और उन्हें पहली बार मतदान का हक हासिल हुआ था। उस चुनाव में कुलजमा 83.4 करोड़ वोटर पंजीकृत किए गए थे। इनमें से 52 फीसदी चालीस वर्ष से कम के थे। 

बताने की जरूरत नहीं कि यही वह वर्ग है, जिसके कंधों पर अपनी और देश के भविष्य के निर्माण की जिम्मेदारी है। इसी जमात को सही मार्गदर्शन और सहारे की जरूरत होती है। आंकडे़ उठा देखिए। दिनोंदिन धराशायी होती शिक्षा-व्यवस्था ने चरित्र और व्यक्तित्व निर्माण के शुरुआती उपादान को जर्जर बना दिया है। सामाजिक सुधार अब प्रोफेशनल एनजीओ तक सीमित होकर रह गए हैं। जाहिर है, नौजवानों को रास्ता दिखाने वाले ‘लाइट-हाउस’ बचे ही नहीं। 

पुरानी मान्यता है कि अगर भविष्य की राह धुंधली दिखे, तो अतीत पर नजर डालें। अपने इतिहास को समझने के लिए पहले लोग सार्वजनिक पुस्तकालयों में जाया करते थे। मुझे याद है, जब मैं मिर्जापुर में कक्षा दो का छात्र था, तब मेरे पिता मुझे चपरासी के साथ नारघाट स्थित एक वाचनालय में भेजा करते थे। किसी ने पूछा कि इतना छोटा बच्चा भला क्या पढ़ सकता है? इस पर उन्होंने कहा कि पढ़ेगा तो तब, जब वह इसका शऊर सीखेगा और इसके लिए सार्वजनिक पुस्तकालय से बेहतर कोई स्थान नहीं हो सकता। किताबों, लेखकों और वाचकों के प्रति उन दिनों उपजा सम्मान आज तक कायम है। वे पुस्तकालय ज्ञान के साथ संस्कार भी बांटते थे।

अफसोस! आजादी से उपजे लोकतंत्र के कर्णधारों ने बहुत-सी अच्छी रवायतों के साथ इन वाचनालयों की भी कमर तोड़ दी। अब सोशल मीडिया का जमाना है और इसके जरिए जो ज्ञान-गंगा बहाई जाती है, उसने ज्ञान के सम्मान को मिट्टी में मिला दिया है। हर रोज किसी नेता, इतिहास पुरुष अथवा भारतीय संस्कृति के बारे में ऐसी बेतुकी बातें हवा में उछाली जाती हैं कि पहले से जानलेवा वायु वैचारिक गंदगी से भी बजबजा उठती है। हांगकांग स्थित ‘काउंटरप्वॉइंट रिसर्च’ के मुताबिक, इस समय भारत में 43 करोड़ स्मार्टफोन उपभोक्ता हैं। इन स्मार्टफोन के साथ ही ‘वाट्सएप’ इन तक पहुंचता है। खुद ‘वाट्सएप’ संचालकों का दावा है कि भारत में 20 करोड़ लोग इस संदेशवाहक का सक्रिय तौर पर उपयोग करते हैं। कुल जमा 87 हजार ‘एक्टिव-ग्रुप’ ऐसे हैं, जो किस्म-किस्म के संदेशों को लगातार उगलते रहते हैं। चुनावी जंगजुओं के पास अपनी बात लोगों तक पहुंचाने का यह बेहतरीन जरिया है। 

यही वजह है कि हम रात और दिन के शाश्वत भेद को भुलाकर हर घड़ी तरह-तरह के ऑडियो, वीडियो और लिखित संदेश प्राप्त करते रहते हैं। इनमें फलां के ‘चरित्र’ से लेकर ढिकां तक की ‘काली-करतूतों’ का विस्तृत लेखा-जोखा होता है। यह सहज भारतीय मानसिकता है कि हम मुफ्त में मिले सामान और ज्ञान को डकारने में सुख का अनुभव करते हैं। यह सुख अब महंगा पड़ रहा है, क्योंकि हमारी नई नस्ल असत्य अथवा अद्र्धसत्य को स्वीकार करने के लिए सम्मोहित की जा रही है। 

यह खतरा कितना विकराल है, इसको इन आंकड़़ों के अक्स में देखें। भारत में कुल 90 करोड़ मतदाता इस बार मताधिकार के लिए पंजीकृत हुए हैं, जिनमें पहली बार वोट डालने वाले नौजवानों की संख्या करीब डेढ़ करोड़ है। इन सभी की उम्र 18-20 वर्ष के बीच है। इस तथ्य का पोस्टमार्टम करने पर मालूम पड़ता है कि बिहार, पश्चिम बंगाल राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक नए मतदाताओं के नाम दर्ज किए गए हैं। ये पांचों राज्य लोकसभा को 235 सदस्य सौंपते हैं। इसका एक आशय यह भी है कि ये राज्य अगली सरकार बनाने में बड़ी भूमिका अदा करेंगे, क्योंकि लोकसभा सांसदों की कुल तादाद का लगभग 43 फीसदी हिस्सा यहीं से चुनकर जाएगा। 

इन राज्यों के जमीनी हालात दयनीय हैं। किसान यहां आत्महत्या करते हैं, महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं, बेरोजगारों का सबसे बड़ा तबका भी इसी धरती से आता है और सामाजिक असमानता हो अथवा सामंती मानसिकता, इनका सर्वाधिक दुष्प्रभाव इन्हीं क्षेत्रों में दिखता है। विरोधाभास देखें, देश के सर्वाधिक प्रधानमंत्री भी इन्हीं इलाकों से आए हैं। इसके बावजूद यह दुर्दशा! क्यों? इस सवाल का जवाब ढूंढ़ने चलेंगे, तो ऐसे कई लेख लिखने पडे़ंगे, पर यह सच है कि यहां के नौजवान देश की अगली सरकार चुनने में अहम भूमिका अदा करेंगे। इन्हीं लोगों को सरकारी तवज्जो की अधिकतम आस भी होगी। वे अपने हालात से असंतुष्ट हैं और अपना अगला वोट इस उम्मीद से देंगे कि उनकी समस्याओं का हल अगले पांच वर्षों में निकाल लिया जाएगा। क्या उनकी उम्मीदों को पांव मिलेंगे? आसमानभेदक आश्वासनों की यह बारिश तो अच्छे आसार नहीं दिखाती। ऐसी बारिशें सत्तानायकों के लिए मतों की बाढ़ तो लाती रही हैं, पर मतदाता के हिस्से बस हताशा आती है। ऐसे में, सोशल मीडिया के अदृश्य कीमियागर उन्हें अटकाने-भटकाने में कामयाब हो सकते हैं।

यहां सम्माननीय दार्शनिक ज्यां पाल सात्र्र याद आ रहे हैं। 1968 में पेरिस के छात्र आंदोलन के साथ कदम मिलाते समय उन्होंने कहा था- ‘जब आप जीत की तफसील से वाकिफ होते हैं, तो इसे हार से अलग करना मुश्किल हो जाता है।’ 

वह सही थे। वोटर सोचता है कि हार-जीत तय करने का हक उसके हाथ है, पर किसी भी दल की जीत अब तक उसे सिर्फ खीझ भरी हार देती आई है। क्या यह चुनाव इस मामले में परिवर्तनकारी साबित होगा?

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  • Web Title:Shashi Shekhar Hindustan Aajkal Column April 7