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नेतागण, कृपया भाषा का संयम बरतें

शशि शेखर

मैंने 14 दिसंबर की शाम हफ्तों बाद राहत की सांस ली। वजह? गुजरात में चुनाव के दौरान जिस तरह की शब्दावली उपयोग में लाई जा रही थी, उससे मन उचट गया था। राजनीति, दुर्नीति बन जाए, तो यही होता है। अगर आप सोचते हैं कि कल चुनाव के नतीजों के बाद देश भर में पसरी उत्तेजना शांत पड़ जाएगी, तो माफ कीजिएगा, आपका आकलन सत्य से परे है। 

आजकल जिस अंदाज में चुनाव लड़े जाते हैं, उसका असर लोगों के दिलो-दिमाग पर देर तक रहता है। भरोसा न हो, तो पिछले तमाम चुनावों पर नजर डाल देखिए। पिछला लोकसभा चुनाव बड़ी तेजी और तुर्शी के साथ लड़ा गया था। नतीजतन, दिल्ली की हुकूमत बदल गई। यह सिलसिला भारतीय राजनीति में नए व्याकरण की शुरुआत साबित हुआ। तब से अब तक राजनीति के चाल, चरित्र और चेहरे में जबर्दस्त फर्क आया है। अब सत्ता पाने के बाद भी हमारे नेता अर्थहीन मुद्दों के तंदूर को सायास गरमाए रहते हैं। 

मैं यहां किसी पार्टी या राजनेता विशेष की चर्चा नहीं कर रहा, पर इसका दुष्परिणाम सामने है। भारतीय लोक ने जब से मुद्दों की बजाय नेताओं और उनकी नेतागिरी पर ध्यान देना शुरू किया है, तभी से उसकी दिक्कतों में चुनाव-दर-चुनाव इजाफा होता गया है। 

यह सच है कि आजादी के बाद आयोजित पहले चुनाव से अब तक हमारे राजनेता विकास और सामाजिक मजबूती की बातें तो करते हैं, मगर उन्हें जमीन पर उतारने की बजाय वे अपने अगले चुनाव की व्यवस्था में लग जाते हैं। कुछ इसके लिए अपना या पार्टी का खजाना भरने में जुट जाते हैं, तो अन्य अलग-अलग किस्म की दीवानगी पैदा करने की कोशिश करते हैं। इसके लिए जाति, धर्म और इतिहास की मन-माफिक व्याख्याएं कुछ इस अंदाज में परोसी जाती हैं कि लोगों का ध्यान असली मुद्दों से भटक जाए।

यही वजह है कि स्वतंत्रता के 70 साल बाद हमारे यहां गरीब उसे माना जाता है, जो हर रोज 32 रुपये से कम कमाता है। अब आप ही बताइए, इतने रुपये में दो जून की रोटी मयस्सर है क्या? फिर आदम और हव्वा की संतानों को जीने के लिए भोजन के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए, 32 रुपये रोज में वह कतई संभव नहीं। जिस देश में हर रोज करीब 16 प्रतिशत लोग खाली पेट सोने को अभिशप्त हों और भूख से मौत जहां तकनीकी मुहावरों का शिकार हो जाए, वहां मायूसी पसरनी स्वाभाविक है। आप सोच रहे होंगे कि मैंने यहां मुहावरे के साथ तकनीकी शब्द का इस्तेमाल क्यों किया? बताता हूं।

आपने अक्सर सड़कों पर लावारिस लाशें पड़ी पाई होंगी। उनके शरीर पर कोई घाव नहीं होता, फिर भी काल उन्हें लील चुका होता है। यही वे लोग हैं, पोस्टमार्टम के दौरान जिनकी आंतें सिकुड़ी मिलती हैं। अन्न का कोई चिह्न वहां नहीं होता। अगर कोई बोलता है कि वे भूख से मारे गए, तो प्रशासन जवाब देता है कि नहीं वे बीमारी से मरे, क्योंकि बिना भोजन मौत को सिद्ध करना आसान नहीं। कोई ऐसे बेगैरत लोगों से पूछे कि अकाल काल के गाल में समा जाने वाला क्या भारत का नागरिक नहीं था? क्या जिंदा रहने लायक अन्न पर उसका अधिकार नहीं था? यह मसला चुनाव का मुद्दा क्यों नहीं बनता?
मुझे अक्सर बचपन में देखी उपकार फिल्म का संवाद याद आता है- राशन पर भाषण बहुत है, लेकिन भाषण पर राशन कोई नहीं। फिल्म के प्रदर्शन की इस साल 50वीं जयंती थी। इतने वर्षों में हालात बदल जाने चाहिए थे, पर दुर्भाग्य देखिए, इस डायलॉग की तल्ख सच्चाई जस की तस कायम है। यह दुर्गति इसलिए है कि हम हर चुनाव में आंकड़ों की बाजीगरी और खोखली बयानबाजी का जो नंगा तमाशा देखते हैं, उसे शपथ लेते ही हमारे सत्तानायक बिसरा देते हैं। 

आत्मघाती उन्माद लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है, इसे फैलाने का जुर्म सभी पार्टियों के हिस्से आता है। 
वे ऐसा क्यों करते हैं? इस सवाल के जवाब में दो अनुभव बांटना चाहता हूं। 1985 में राजीव गांधी की अभूतपूर्व जीत के उत्साह से लबरेज एक युवा सांसद से मेरी वैचारिक मुठभेड़ हो गई थी। तब तक चुनाव के दो बरस बीत चुके थे, पर उनका ‘यूफोरिया’ कायम था। बातचीत के दौरान मैंने उनसे पूछा कि आपकी सरकार अपेक्षा के अनुसार काम नहीं कर रही है क्या? जवाब मिला, काम की कद्र किसे है? इंदिरा गांधी ने रायबरेली के लिए क्या नहीं किया, फिर भी वहां के लोगों ने उन्हें हरा दिया। चुनाव काम नहीं, लहर के बूते जीते जाते हैं। जब चुनाव आएगा, तब कोई ‘फंडा’ तलाश लेंगे। बताने की जरूरत नहीं कि कांग्रेस अगला चुनाव हार गई। 

अगली बार दिल्ली के सिंहासन पर सत्य और ईमानदारी का चोला ओढे़ हुए विश्वनाथ प्रताप सिंह काबिज थे। उनकी पार्टी से एक और नौजवान जीते थे। कभी वह पत्रकार होते थे, इसीलिए हम नौजवान खबरनवीस उन्हें अपना दोस्त मानते। एक शाम तरन्नुम में उन्होंने कहा कि तुम जो हमेशा काम-काम चिल्लाते रहते हो, इसका कोई लाभ नहीं। राजा (वी.पी. सिंह) ने हवा बना ली और हम सब जीत गए। आगे ऐसा कर पाएंगे तो जीतेंगे, नहीं तो जय रामजी की। अगले चुनाव में उनसे और उनकी पार्टी से मतदाताओं ने वाकई राम-राम कर ली। राजीव गांधी के करीबी भी 1989 में चुनाव हारने के बाद कहीं खो गए थे। 

काश, जन-विश्वास तोड़ने वाले हर नेता के साथ यही होता! 
पर हमारे सियासतदां जरूरत से ज्यादा समझदार हैं। उन्होंने रणनीति बदल ली है। अब वे सत्ता पाने से पहले जो भाषा बोलते नजर आते हैं, वह चुनाव के बाद उलट जाती है। जम्मू-कश्मीर का उदाहरण लें। महबूबा मुफ्ती जब विपक्ष की बेंच पर बैठा करती थीं, तब उनके सुर कैसे होते थे! पत्थरबाजी और आतंकवाद पर उनके उद्गारों पर समझदार लोग नाक-भौं सिकोड़ते नजर आते, लेकिन अब उनकी बोली बदल गई है। इसी तरह, जनाब फारुख अब्दुल्ला, जो कि भाजपा और कांग्रेस, दोनों की गलबहियां डाल चुके हैं, अब उसी जुबान का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसे कल तक मुफ्ती परिवार के लोग बोला करते थे।  है न उलटबांसी? नेताओं की वैचारिक गुलाटियां समूचे देश में चलन का स्वरूप धारण कर चुकी हैं। उन्होंने न केवल देश, संस्कृति, गरीबी और भूख का मजाक उड़ाया है, बल्कि रह-रहकर मुल्क की सुरक्षा को भी खतरे में डाला है। 

आप गुजरात चुनाव के दौरान सतही बयानबाजी पर नजर डाल देखिए। रह-रहकर पदों, शख्सियतों और आस्थाओं पर असह्य चोट की गई। हमारे सियासतदां सोचते क्यों नहीं कि इस डिजिटल युग में वे जो बोलते अथवा करते हैं, वह हमेशा के लिए दर्ज हो जाता है। आज से हजार साल बाद अगर कोई जिज्ञासु इन्हें देखे, सुने अथवा पढे़, तो क्या उसके मन में यह सवाल नहीं उठेगा कि द्वापर युग के महाभारत और 21वीं शताब्दी में लड़े गए चुनावों में कोई अंतर नहीं था? क्या हिन्दुस्तानियों की जेहनियत युग और समय बदल जाने के बावजूद नहीं बदलती? जाहिर है, हमें अपनी इस हतभागिता से मुक्ति पानी होगी, पर कैसे? 

आइए, कामना करें कि कल गुजरात में जो भी जीते, वह कुर्सी संभालने के बाद अपने वायदों और दावों का सम्मान करे। लोकतंत्र को कायम रखने के लिए यह जरूरी है। 

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