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हिंदी पर हाय-हाय छोड़िए

shashi shekar

मेरी यादों में सितंबर 2012 की वह दोपहर जैसे नक्श हो गई है। दक्षिण अफ्रीका की व्यावसायिक राजधानी जोहानेसबर्ग में धरती के विभिन्न कोनों से आए हिंदीप्रेमी नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन के मौके पर इकट्ठा थे। इस सम्मेलन के मीडिया सत्र की अध्यक्षता करने का मौका मुझे मिला था। मुख्य अतिथि थे मणिशंकर अय्यर। उस दोपहरी अय्यर ने अपने भाषण में कहा था कि इससे अच्छा कोई दिन नहीं हो सकता, जब बिहार से तमिलनाडु के किसी गांव में गए शख्स से वहां के लोग हिंदी में पूछें, ‘भाई कैसे हो?’ इसी तरह, यदि कोई तमिलभाषी बिहार के किसी गांव में पहुंच जाए, तो उससे पूछा जाए, ‘नींग एपड़ी इरिकेल?’

अय्यर के ये विचार सुनते समय मुझे लगा था कि इस शख्स के बारे में भले ही कोई कुछ भी कहे, पर इस समय यह बिल्कुल सही बोल रहा है। जैसा कि नाम से जाहिर है, मणिशंकर अय्यर तमिल मूल के हैं। उनका जन्म लाहौर में हुआ, वह तमिल और हिंदी के साथ बेहतरीन पंजाबी तथा उर्दू भी जानते हैं। काश! अन्य हिन्दुस्तानी भी अपनी मातृभाषा के अलावा एकाधिक भारतीय भाषा की समझ रख पाते! उस समय उठी यह पुलक भरी कसक बिसरा गई होती, अगर कुछ विघ्न संतोषियों से पाला न पड़ा होता।

सत्र की समाप्ति के बाद भीड़ से अचानक कुछ नौजवान उपजे और उन्होंने मुझसे पूछा कि मणिशंकर अय्यर कहां है? मुझे उनकी तैश-भरी वाणी अमर्यादित लगी। मैंने पूछा, क्या हुआ? उनमें से एक ने कहा कि यह भला कौन-सी बात हुई कि वह हिंदीभाषियों से तमिल बोलने की उम्मीद कर रहा है? मैंने फिर पूछा कि यदि तमिलभाषी हिंदी बोलें तो? उनका जवाब था, ‘वह तो बोलनी ही चाहिए।’ देश के हर नागरिक का कर्तव्य है कि वह हिंदी को जाने। यह हठपूर्ण रवैया हमारी हिंदी के लिए अच्छा नहीं है।

भाषाएं और बोलियां उन रिश्तेदारों की तरह होती हैं, जिन्हें अपनाया जाता है। उन्हें थोपना अच्छा नहीं होता। हमारे हिन्दुस्तान ने तो आजादी से पहले ही इसका स्वाद चख लिया था। 1937 में, जब मद्रास प्रेसीडेंसी में कांग्रेस की सरकार गठित हुई, तो सी राजगोपालाचारी ने स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य कर दी। पेरियार और तमाम तमिलवादी नेताओं ने उसका मुखर विरोध किया। आंदोलन उग्र हो चला। पुलिस को कई जगह बल प्रयोग करना पड़ा। एकाधिक व्यक्ति को जान भी गंवानी पड़ी। तब से अब तक इस प्रदेश में तमिल पार्टियां हिंदी का विरोध करती आई हैं।

हमारी संसद तक इस हंगामे से अछूती नहीं रही। लंबे बहस-मुबाहिसे के बाद 1968 में ‘ऑफिशियल लैंग्वेज रिजॉल्यूशन’ पारित किया गया। इसके तहत हिंदीभाषी राज्यों में हिंदी के साथ कोई अन्य भारतीय भाषा पढ़ाई जानी थी और अहिंदीभाषी राज्यों में स्थानीय भाषा और अंग्रेजी के साथ हिंदी का पठन-पाठन होना था। यह त्रिभाषा फॉर्मूला पूरे देश ने अपनाया, पर तमिलनाडु अपनी जिद पर अड़ा रहा।

यकीनन, भारतीयों को भारत के और अधिक नजदीक लाने के लिए यह कारगर फॉर्मूला था। 1971 में छठी कक्षा में दाखिले के वक्त मुझे भी तीन विकल्प दिए गए थे। तेलुगू, कन्नड़ या बांग्ला? उन दिनों हम इलाहाबाद के टैगोर टाउन में रहते थे, जहां बंगालियों की बहुतायत थी। मैंने बांग्ला चुनी और अगले तीन साल उसकी शुरुआती बारीकियों को समझने का अवसर हासिल किया। बरसों बाद आज ये पंक्तियां लिखते वक्त सुकून से कह सकता हूं कि इसने मुझे न केवल महान बांग्ला भाषा से परिचित कराया, बल्कि वहां के अमर साहित्य को पढ़ने की रुचि जागृत की। इस साहित्य ने किशोरावस्था में मुझे नई दृष्टि दी। मेरे जैसे हजारों किशोर थे, जो इन भाषाओं के जरिए भारत को समझ-बूझ रहे थे।

अब आते हैं मौजूदा समय पर। प्रतिरोध बढ़ता देखकर केंद्र सरकार ने सफाई दे दी कि हम हिंदी को किसी पर भी थोपना नहीं चाहते। सियासत भाषाओं के मामले में हमेशा एक कदम आगे और दो कदम पीछे की नीति अपनाती रही है। इसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ा है। हमारी पीढ़ी के हिंदीभाषी जब आंखें खोल रहे थे, तभी लोहिया ने ‘अंग्रेजी हटाओ’ आंदोलन की शुरुआत की थी। तमाम लोग भावनावश अंग्रेजी का बहिष्कार कर बैठे। सुनने में अच्छा लगता था कि सोवियत संघ, चीन, फ्रांस अथवा जर्मनी ने अगर बिना अंग्रेजी के इतनी तरक्की कर ली, तो हिन्दुस्तान हिंदी के साथ आगे क्यों नहीं बढ़ सकता, पर इसका नुकसान हुआ।

अल्प अंग्रेजी ज्ञान की वजह से हिंदीभाषियों को रोटी-रोजगार के कई मोर्चों पर आगे चलकर जटिलताओं का सामना करना पड़ा। ठीक वैसे ही, जैसे तमिलभाषी जब दिल्ली अथवा देश के उत्तरी या पश्चिमी हिस्सों में जाते, तो उन्हें कर्नाटक अथवा अविभाजित आंध्र के मुकाबले अधिक दिक्कत पेश आती। हम अपनी भाषा पर गर्व करें, उसे प्यार करें, यह बहुत अच्छा है, पर अगर हम अन्य भाषाओं के लिए दरवाजे बंद कर देंगे, तो ज्ञान की उम्मीदों की रोशनी भी बंद हो जाएगी।

2011 की जनगणना के आंकडे़ इस मामले में आंखें खोलने वाले हैं। जारी दशक की शुरुआत में देश में हिंदी बोलने वालों की तादाद 52 करोड़ को पार कर गई थी। 2001 से 2011 के बीच इसमें करीब दस करोड़ का इजाफा हुआ था। अब अगली जनगणना 2021 में होगी, पर यह तय है कि बढ़ोतरी की रफ्तार जारी रहेगी। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि लोगों ने रोजगार के सिलसिले में अपने पुराने आग्रहों को तोड़कर नए बनते-उभरते महानगरों की ओर रुख किया है। जनगणना के पिछले आंकड़ों के अनुसार, दक्षिणी क्षेत्रों में हिंदी, उड़िया और असमिया भाषा बोलने वालों की संख्या 33 फीसदी तक बढ़ी है। जाहिर है, हैदराबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, जैसे शहरों के वाणिज्यिक उभार के बाद देश के पूर्वी और उत्तरी लोगों की आमद में इजाफा हुआ है।

भाषाओं के मामले में होने वाले अकादमिक बहस-मुबाहिसे में एक सत्य अक्सर जान-बूझकर बिसरा दिया जाता है, वह हैं बॉलीवुड की फिल्में। मुंबई में बनने वाली हिंदी फिल्मों ने अपनी कला और आकर्षण से पूरे देश में हिंदी के प्रसार में जबरदस्त भूमिका अदा की। एक समय था, जब हम रजनीकांत, मोहन लाल, रेखा, हेमा मालिनी अथवा श्रीदेवी जैसे अभिनेता-अभिनेत्रियों को इन फिल्मों के जरिए जान सके। अब वक्त के बदलाव के साथ दक्षिण का सिनेमा भी हमारे बीच लोकप्रिय हो रहा है। बाहुबली  हिंदी में भी डब हुई थी और उसने कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। स्पष्ट है कि भाषाओं का काफिला अपने तरीके से बढ़ता आया है और ऐसे ही बढ़ता जाएगा। हम भारतीयों को कम से कम इस मामले में अपने नेताओं की कोई जरूरत नहीं है। 

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  • Web Title:Shashi Shekhar column Aajkal in Hindustan on June 9