DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आजादी के बहाने अबोधों पर हमला

शशि शेखर

‘न्यूज रूम’ में काम करने के कुछ फायदे-नुकसान हैं। लाभ- खबरें अपेक्षाकृत जल्दी मिल जाती हैं। हानि- पत्रकारों की संवेदनाओं पर इन समाचारों का दुष्प्रभाव सबसे पहले पड़ना शुरू हो जाता है। एक बानगी। दक्षिण कश्मीर के शोपियां में पत्थरबाजों द्वारा 40 मासूम बच्चों की बस पर पथराव की खबर जैसे ही मोबाइल फोन पर उभरी, मैं संताप और क्षोभ से भर उठा। भला कौन अस्पताल के बेड पर पडे़ मासूमों के भयभीत चेहरे, उन पर गुजरी दहशत को बयां करती बस की टूटी खिड़कियों और सीटों पर बिखरे कांच की तस्वीरें सबसे पहले देखना चाहेगा?

16 दिसंबर, 2014 को जिन लोगों ने पेशावर के स्कूल पर हमला कर 132 बच्चों को गोलियों से भून दिया था, वे आतंकवादी थे। इसके बावजूद किसी को उनसे ऐसी घिनौनी हरकत की उम्मीद न थी। कश्मीर में जिन लोगों ने स्कूल-बस पर पथराव किया, वे दहशतगर्द नहीं, उसी इलाके के नौजवान थे। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे अपने आस-पड़ोस की जिम्मेदारी उठाएंगे, पर उन्हें अपने पड़ोस में पल रहे मासूमों पर जुल्म ढाते हुए कोई हिचक न हुई। क्यों?

इस घटना के बारे में बस के चालक और उसमें सवार बच्चों ने जो बयान दिए, वे अंदर तक झकझोर देते हैं। पत्थरबाजों ने पहले स्कूल जाती बस को घेरा। ड्राइवर से कहा, वापस जाओ। चालक ने हाथ जोड़कर चिरौरी की कि बच्चों को स्कूल जाना है। ये तो आपके पास-पड़ोस के हैं। जाने दीजिए। वे खफा हो गए। उन्होंने बस को चारों ओर से घेरकर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। बच्चों का कहना है कि उन्होंने उनकी ओर उंगलियों से इशारा कर-कर के कहा कि इसको मारो, उसको निशाना बनाओ। 

तय है कि घाटी का जहरबाद इतना बढ़ चुका है कि अब वहां लल्लेश्वरी की कविताओं और सूफी फकीरों की यादों के हवाले से अमन का रोमानी संदेश देने वालों से कहना ही होगा कि या तो इनको रोकिए अथवा खत्म हो जाने के लिए तैयार हो जाइए। यहां साफ कर दूं। कश्मीरियों को भारतीय सुरक्षा बलों से नहीं, बल्कि अपनी आस्तीन में पल रहे इन सांपों से ज्यादा खतरा है। शोपियां की घटना का अकेला सबक यही है। यह हाल तब है, जब पिछले दिनों सूबे की मुखिया महबूबा मुफ्ती ने 2008 से अब तक पत्थरबाजी के आरोप में ‘बुक’ किए गए लोगों को आम माफी दे दी। 
यहां एक बुनियादी फर्क पर ध्यान देने की जरूरत है। पेशावर के हत्यारे घोषित आतंकवादी थे। उन्हें मालूम था कि वे आज नहीं तो कल मार गिराए जाएंगे, पर शोपियां के बच्चों और उनके परिजनों को जिंदगी भर के लिए खौफजदा कर जाने वाले हमलावर जानते हैं कि सियासत आज नहीं तो कल अपने रहम-ओ-करम का छाता उनके ऊपर तान देगी। यही वजह है कि वे उद्दंड और आक्रामक हैं। यही वजह है कि घाटी में अब पत्थरबाजों की दूसरी पीढ़ी पाकिस्तान के पैसे पर फल-फूल रही है। कश्मीर की सूबाई सरकार उनके खात्मे के लिए कितनी गंभीर है, इसका अंदाज उसकी कार्यप्रणाली से लगता है। 

पत्थरबाजों को आम माफी देते समय सोचा जाना चाहिए था कि ये पाकिस्तान पोषित एजेंसियों की सुस्पष्ट नीति की उपज हैं। वजह?  पत्थरबाजी के आरोपियों को आतंकवादी बनाने में आसानी होती है। पुलिस से बचने की फिराक में अधकचरे दिमाग के ये लोग आसानी से ‘हैंडलर्स’ के हत्थे चढ़ जाते हैं। वे उनकी हिफाजत के नाम पर उनका ‘ब्रेनवाश’ करते हैं और फिर कुछ दिनों बाद हथियारों के साथ उनके फोटो सोशल मीडिया पर शाया होते पाए जाते है। बुरहान वानी और हाल ही में मारा गया समीर टाइगर भी शुरुआत में पत्थरबाज हुआ करते थे। 

वक्त आ गया है, जब कश्मीर की सरकार अपने नौजवानों को समझाए कि अब दुनिया की हवा बदल रही है। जब दुनिया भर के विद्रोही आंदोलन शांति के तरीकों और रास्तों को अपनाने की ओर बढ़ रहे हैं, तो भला कश्मीरियों को ‘इंतिफादा’ का ख्वाब दिखाने का क्या मतलब? सियासी गोलबंदियों, अलगाववाद व दहशतगर्दी की जुगलबंदियों और आए दिन की नाकाबंदियों ने घाटी के लोगों की जिंदगी हराम कर दी है। शोपियां की घटना के बाद आम कश्मीरियों को भी सोचना होगा कि जो लोग हमारे बच्चों पर पत्थर बरसा सकते हैं, हमारे नौजवानों को घर से खींचकर भून सकते हैं, वे रहनुमा नहीं हो सकते। 

अगर इस भावना ने तेजी पकड़ी, तो दहशतगर्द आमजन की सहानुभूति खोते जाएंगे और अलग-थलग पड़ जाएंगे। सौभाग्य से इसके शुरुआती संकेत मिल रहे हैं। घाटी में कुछ नौजवान जिस तरह तंजीमें छोड़कर कानून की शरण में लौटे, वह उम्मीद जगाता है। बुरहान वानी और समीर टाइगर भी सेना के हाथ तभी चढ़ सके, जब स्थानीय लोगों ने उनकी मुखबिरी की। श्रीनगर की हुकूमत अगर ईमानदारी से आतंकवादियों के अनैतिक कामों को अवाम के बीच शिद्दत से उजागर करे, तो यह भावना जोर पकड़ सकती है।

महाभारत की एक कथा याद आ रही है। द्रोणाचार्य मारे जा चुके थे। उनका पुत्र अश्वत्थामा क्रोध में उन्मत्त हुआ घूम रहा था। इसी बावरेपन में उसने ऐषिक नाम की शक्ति का प्रयोग किया। नतीजतन, अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहा शिशु मृतपिंड में तब्दील हो गया। यह बात अलग है कि श्रीकृष्ण के आशीष से वह पुनर्जीवित हो उठा और आगे चलकर भारत का सम्राट बना। इसी घटना की वजह से उसका नाम परीक्षित पड़ा, पर युद्ध के 10वें दिन घटे इस वाकये ने कौरवों की रही-बची नैतिक सत्ता का हरण कर लिया। अगर कोई समझता है कि दुर्योधन के वध के साथ पांडवों की जीत हुई, तो वह गलत है। कौरव ऐसी हरकतों के कारण पहले से अपने नैतिक अधिकार गंवाते जा रहे थे। महाभारत का अंतिम संघर्ष सिर्फ परिणति थी। क्या आपको नहीं लगता कि शोपियां जैसी बेवकूफियां दहशतगर्दों के सैद्धांतिक दावों की कलई खोल रही हैं। उन पर निर्णायक प्रहार का वक्त आ चुका है। महबूबा को सिर्फ सार्थक पहल करनी है।

पर हो इसका उल्टा रहा है। कभी महबूबा मुफ्ती पाकिस्तान से वार्ता का आलाप भर देती हैं, तो कभी उमर अब्दुल्ला को पत्थरबाजों की हरकतों में आजादी की चाहत दिखने लगती है। इससे दहशत के आकांक्षियों को बल मिलता है। इस प्रवृत्ति पर रोक लगनी चाहिए।

Twitter Handle: @shekharkahin 
शशि शेखर के फेसबुक पेज से जुड़ें
shashi.shekhar@livehindustan.com

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Shashi Shekhar column Aajkal in Hindustan on 6 may