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मोदी के अवसर और चुनौतियां

Hindustan Editor Shashi Shekhar

गई 23 मई की सुबह और शाम में जमीन-आसमान का अंतर था। सुबह जब ‘इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन्स’ की सील खुलनी शुरू हुई, तो समूचे देश में बेचैनी भरी जिज्ञासा थी। नरेंद्र मोदी के समर्थकों से ज्यादा विपक्षी आशान्वित थे। उन्हें लगता था, कोई चमत्कार उनके पक्ष में घटित होने वाला है। शाम होते-होते संशय का सारा कुहासा छंट चुका था। भारतीय गणराज्य ने नरेंद्र मोदी को पहले से कहीं अधिक आस-विश्वास के साथ सत्ता सौंप दी थी।

मैं इसे 48 साल बाद घटित हुआ राज-योग नहीं मानता। भारत के 90 करोड़ से अधिक मतदाताओं  के बहुमत ने मोदी में अपनी आस्था व्यक्त की है। उनकी दूसरी पारी की शुरुआत में ही आशंकाओं और शंकाओं के बबूल रोप देना उन करोड़ों मतदाताओं की उम्मीदों का अपमान होगा, जिन्होंने इस जनादेश को जना है। नरेंद्र मोदी ने सिर्फ सियासी जुगत से यह मुकाम हासिल नहीं किया है। इसके पीछे वे कल्याणकारी योजनाएं भी हैं, जो देश के गरीब-गुरबा को अपने आसपास साकार होती नजर आईं। उन्हें लगा कि अगर अगले पांच साल यही गति जारी रही, तो शायद हमारे दिन बहुर जाएंगे।

यकीनन, मोदी आम आदमी की आसमान फाड़ उम्मीदों से उपजी चुनौतियों से वाकिफ हैं, इसीलिए उन्होंने ऐतिहासिक जीत के बाद अपने पहले भाषण में भाजपा कार्यकर्ताओं को ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा याद दिलाया। उन्होंने यह भी कहा कि इस जीत से हमें और विनम्र होना चाहिए और यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे कंधों पर अधिक जिम्मेदारी आ गई है। उन्होंने एनडीए का नेता चुने जाने के बाद भी भारतीय संविधान को नमन कर साबित किया कि वे इस जीत को दर्प नहीं विनम्रता से स्वीकार करते हैं। 2014 के नरेंद्र मोदी 2019 में समता भी, ममता भी के सिद्धांत पर चलने को दृढ़ प्रतिज्ञ हैं।

आप याद करें। पिछले कई वर्षों से वह साल 2022 की बात करते रहे हैं। वह हमारी स्वतंत्रता की हीरक जयंती का वर्ष होगा और इस अवसर पर वह चाहते हैं कि भारत का कोई नागरिक बिना आवास के न हो। उसके पास पोषण के लिए पर्याप्त पैसा हो और तन ढंकने के लिए कपड़े। उनकी बातों से जाहिर है कि वह 2022 को एक ऐसा मुकाम मानते हैं, जहां से भारत के सभी लोग रोटी, कपड़ा और मकान की मूलभूत आवश्यकताओं को प्राप्त करने में सफल हों और यहीं से देश नई ऊंचाइयों पर पहुंचने की कुव्वत हासिल करे। यह लक्ष्य आसान नहीं है।

भारत जैसे बहुलतावादी देश में समस्याएं भी तरह-तरह के चेहरे लेकर आती हैं। नरेंद्र मोदी को पूर्व, उत्तर और पश्चिमी राज्यों ने सिर-आंखों पर बैठाया है। दक्षिण के जिन राज्यों ने मोदी लहर को रोका है, वे पहले ही तरक्की की कई सीढ़ियां चढ़ चुके हैं। उत्तर और दक्षिण का यह द्वैत खतरनाक है, इतना खतरनाक कि आशंकावादी इसे विघटनकारी तक बताते हैं। इस असमानता को दूर करने के लिए उत्तर भारत के बीमारू राज्यों में पारदर्शी और ईमानदार प्रशासन की स्थापना करनी होगी। नीतियों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा और इसकी भी जवाबदेही तय करनी होगी कि केंद्र अथवा राज्य सरकार के खजाने से निकली पाई-पाई उपयुक्त योजनाओं पर खर्च हो। कहने-सुनने में यह बात बहुत अच्छी लगती है, पर सच है कि बेईमानी एक ऐसी कुटेव है, जिसके प्रति आम आदमी अरुचि दिखाता जरूर है, पर मौका पड़ने पर बहती गंगा में प्राय: हर कोई हाथ धो लेना चाहता है।

नियम-कायदों के जरिए ईमानदारी थोपना आसान है, पर इसे राष्ट्रीय चरित्र बनाना मुश्किल। स्वच्छ भारत, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ आदि सामाजिक आह्वानों के जरिए प्रधानमंत्री ने जिस कोशिश को 2014-15 में शुरू किया था, उसे मुकाम तक पहुंचाने का समय आ गया है। आमजन के मानस में परिवर्तन का यह नुस्खा आजमाया हुआ है। अब्राहर्म ंलकन हों या  गांधी अथवा मण्डेला की सफलताएं ऐसे ही सामाजिक सरोकारों पर टिकी हुई थीं।

प्रधानमंत्री ने अपनी ‘विक्ट्री स्पीच’ में यह भी कहा कि हमने सेक्युलरिज्म पर देश के विमर्श को बदलने में सफलता अर्जित की है। कुछ लोगों के मन में सवाल घुमड़ने लगे होंगे अब, जब आने वाले दिनों में सत्तारूढ़ मोर्चे को राज्यसभा में भी बहुमत मिल जाएगा, तो क्या राम जन्मभूमि, अनुच्छेद-370, समान सिविल कोड जैसे पार्टी के पुराने एजेंडे पर भी जोर-शोर से काम शुरू होगा? यदि ऐसा होता है, तो क्या देश का अमन-ओ-अमान कायम रह पाएगा? मोदी खुद भी जानते हैं कि भारत जैसी उभरती हुई महाशक्ति घरेलू मोर्चे पर अपनी मर्जी के फैसले सिर्फ इसलिए नहीं ले सकती, क्योंकि समूची दुनिया की निगाहें हमारे ऊपर लगी रहती हैं। विदेशी कंपनियों का निवेश भारत को चाहिए और इसके लिए दुनिया की रीति-नीति का पालन करना आवश्यक है। उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल की शुरुआत विकास से की थी। उम्मीद है वे अपनी पार्टी के बकवादियों पर बंदिश लगाकर इस दिशा में आगे बढ़ते रहेंगे।

देश की समृद्धि के लिए पड़ोसियों से अच्छे रिश्ते और आंतरिक मोरचे पर शांति की सर्वाधिक जरूरत है। उम्मीद है, भाजपा अब घाटी में ‘महामिलावट’ के मोह में नहीं फंसेगी और जरूरत पड़ने पर चोट के साथ मरहम की नीति का पालन करेगी। घाटी की घटनाएं उत्तर पूर्व और माओवादियों के मामले में हासिल की गई कारगर उपलब्धियों पर पानी फेरती आई हैं। पांच वर्ष का भरा-पूरा कार्यकाल इस नासूर के इलाज के लिए का़फी है। इसीसे जुड़ी है पाकिस्तान से रिश्तों की गुत्थियां। उम्मीद है नरेन्द्र मोदी के अगले चुनावी भाषण दुश्मनी बराबर करने की बजाय दोस्ती कायम करने पर आधारित होंगे। आजतक कोई प्रधानमंत्री जो नहीं कर सका, उसे पूरा कर दिखाने का अवसर उनके पास है।
उनसे यह अपेक्षा इसलिए की जा सकती है क्योंकि वे कई मामलों में खुद को अनूठा साबित कर चुके हैं।

मोदी आजाद भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने दक्षिणपंथी दल का प्रतिनिधि होने के बावजूद जनकल्याणकारी योजनाओं में खुद को जनवादी कहने वालों  को पीछे छोड़ दिया। यही वजह है कि बंगाल के वामपंथी काडर ने भाजपा को अपना अंतिम आश्रय मान लिया। वहां से वामपंथी मोरचे का एक भी सदस्य लोकसभा के लिए नहीं चुना गया। केरल में भी सिर्फ एक सीट पर उन्हें सफलता हासिल हुई। तमिलनाडु में अगर वे चार सीट जीत सके तो उसके पीछे द्रमुक सहित कई दलों का गठबंधन था। लाल सलाम पेश करने वाले ऐसे दर-बदर हो जाएंगे आधा दशक पहले तक ऐसा सोचना तक नामुमकिन था।

कहने की जरूरत नहीं कि जवाहरलाल नेहरू के बाद इंदिरा गांधी को ही कुछ वक्त के लिए ऐसी जन स्वीकार्यता हासिल हुई थी। नरेन्द्र मोदी के पास अब अवसर है और समय भी जब वे अपनी लकीर को किसी भी पूर्व प्रधानमंत्री से लंबी खींच सकते हैं।

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  • Web Title:Shashi Shekhar column Aajkal in Hindustan on 26 may