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हिंदी और भारत का अश्वमेध

शशि शेखर

‘हम भारत की संतान हैं और भारत भूमि हमारी मां, इस नाते हम पुत्र धर्म का निर्वाह करते हुए हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए भारत के प्रयासों का समर्थन करते हैं।’ पोर्ट लुई स्थित अभिमन्यु अनत सभागार में मॉरीशस के रक्षा, रोड्रिग्स और मार्गदर्शक मंत्री सर अनिरुद्ध जगन्नाथ ने जब यह भावना व्यक्त की, तो वहां उपस्थित लोगों ने देर तक तालियां बजाकर उनका खैरमकदम किया। क्या यह एक मंझे हुए राजनेता का रस्मी बयान था? 

दूर से देखने पर ऐसा ही लगता है, क्योंकि पूरी दुनिया में सियासतदां इस तरह की बातें लोगों को झांसा देने के लिए करते हैं, पर नहीं, मॉरीशस में ऐसा नहीं है। भोजपुरी और भारतीयता ने हजारों किलोमीटर दूर बसे इस द्वीपदेश को हमसे जोड़ रखा है। इसका जीवंत उदाहरण दोनों देशों द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित 11वां विश्व हिंदी सम्मेलन था। वहां सिर्फ पोर्ट लुई के हुक्मरान नहीं, बल्कि पूरे देश के नुमाइंदे उमड़ पड़े थे। इसके बरक्स अगर जोहानिसबर्ग में आयोजित नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन को याद करता हूं, तो बड़ा फर्क पाता हूं। वहां की सरकार ने भी आयोजन को भव्य बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, पर स्थानीय जन की भागीदारी दाल में नमक बराबर थी। वहां हम प्रतिभागी खुद को अजनबियों और अजनबीयत से घिरा पाते। 

मॉरीशस में इसका ठीक उल्टा था। 

एक उदाहरण। मुझे कुछ खरीदना था। मैंने भारतीय दूतावास के कर्मचारियों से जब परामर्श किया, तो उन्होंने कहा कि आप किसी भी दुकान में बेहिचक चले जाइए। आपको लगेगा ही नहीं कि आप पराए मुल्क में हैं। यहां बड़ी संख्या में लोग हिंदी समझते और बोल लेते हैं। ऐसा हुआ भी। डिपार्टमेंटल स्टोर में हमें आशा से अधिक आत्मीयता प्राप्त हुई। यही नहीं, आप्रवासी घाट पर जब हमने अंग्रेजी में सवाल पूछे, तो गाइड की भूमिका निभा रही युवती ने कहा कि आप चाहें, तो मैं हिंदी में बात कर सकती हूं। आप्रवासी घाट वर्ल्ड हेरीटेज का हिस्सा है। भारत से गए गिरमिटिया यहीं से मॉरीशस की सरजमीं पर कदम रखते थे। तब से अब तक रोजी-रोटी के सिलसिले में मॉरीशस सहित तमाम देशों में हिंदीभाषियों का बसर करना जारी है। यह उन उद्यमशीलों का ही पुण्य प्रताप है कि 140 देशों में हिंदी धड़ल्ले से इस्तेमाल होती है और यह एक अरब, 20 करोड़ से अधिक लोगों की समझ में आने वाली भाषा है। हिंदी को महज आमजन की बोलचाल मानना भूल होगी। इसमें अनंत संभावनाएं छिपी हुई हैं। बस, हमें अपनी आंखों की पट्टी हटाकर आगे चल पड़ना है।

मॉरीशस को ही लें। इस संभावनाशील देश का सामरिक और आर्थिक महत्व है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद अपनी यात्राओं के दौरान वहां के लोगों से भावनात्मक जुड़ाव रखने के लिए आस्था के प्रतीक गंगा तालाब पर मूर्ति अनावरण अथवा पवित्र पीपल के पेड़ को रोपकर संदेश देने की कोशिश कर चुके हैं कि हमारा धर्म और संस्कृति साझा है। विश्व हिंदी सम्मेलन भी ऐसा ही प्रयास था। इसके अलावा, भारत मॉरीशस के विकास में भी बड़ी भूमिका अदा कर रहा है। हम वहां मेट्रो बना रहे हैं और इससे पहले अच्छी सड़कें बनाने सहित तमाम काम कर चुके हैं। यहां बताना जरूरी है कि मॉरीशस में भारतीयों द्वारा बनाई गई सड़कें हमारे देश की सड़कों से कहीं बेहतर हैं। 

हालांकि, मैं मानता हूं कि सिर्फ भाषा, धर्म, संस्कृति अथवा विकास के कुछ संसाधनों को जुटाकर दूरगामी लक्ष्य हासिल नहीं किए जा सकते। क्यों न भारत मॉरीशस और इस तरह के अन्य देशों में मेडिकल, इंजीनियरिंग और इस तरह के तकनीकी दक्षता वाले अन्य कॉलेजों की स्थापना करे, जहां नौजवान पीढ़ी खुद को आत्मनिर्भर बनाने की योग्यता हासिल कर सके? कई मुल्कों में बसे भारतवंशियों को हम ‘ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया कार्ड’ देते हैं। इस सर्टिफिकेट को पाने वाले भारत में नौकरी या व्यापार कर सकते हैं। आवासीय भूमि खरीद सकते हैं, और भी तमाम हक-हुकूक हासिल कर सकते हैं। कृषि भूमि की खरीद अथवा वोट डालने के अधिकार पर रोक जरूर है, पर यथायोग्य योग्यता हासिल कर वे भारत और अपने देश, दोनों का भला करने के काबिल तो हो ही सकते हैं। यदि हम ऐसी नई पीढ़ी को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएं, तो इससे न केवल दोनों मुल्कों का भला होगा, बल्कि हमारी सांस्कृतिक-सामाजिक एकता भी मजबूत होगी। अतीत में उपनिवेशवादी देश ऐसा कर चुके हैं। अमेरिका आज उन्हीं की बोई फसल काटकर संसार का सबसे शक्तिशाली मुल्क बना हुआ है। अगर हम खुद को विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनाना चाहते हैं, तो हमें भी यह राह पकड़नी होगी।

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि चीन इस रास्ते पर चल भी पड़ा है। चीन ने ओबोर (वन बेल्ट वन रोड इनिशिएटिव) और ‘सी पैक’ के जरिए अपने देश और देशवासियों के लिए दीर्घकालिक व्यवस्था करनी शुरू कर दी है। वहां के सत्तानायक जानते हैं कि आर्थिक प्रगति के उजलेपन के पार्श्व में अंधेरा भी छिपा होता है। तरक्की की चाहत रखने वालों को सोचना ही होता है कि अगर मंदी आ गई, तो वे उससे कैसे  निपटेंगे?

आवश्यकता पड़ने पर अपने प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को कहां शिफ्ट करेंगे? जनसंख्या के विस्तार के साथ नई पीढ़ी को नए अवसर कैसे मुहैया करवाएंगे? अधिक से अधिक देशों को खुद से जोड़कर उनके प्राकृतिक एवं मानव संसाधनों का अपने हित में उपयोग कैसे करेंगे? चीन यह कर रहा है, पर भारत को अभी यह करना बाकी है। 

क्यों न इसकी शुरुआत उन देशों से की जाए, जो भावनात्मक तौर पर हमसे जुडे़ हैं? इस अश्वमेध में हम अगर हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं की संतानों को भी ले लें, तो फिर सफलता में शक की गुंजाइश ही नहीं बचती।

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  • Web Title:Shashi Shekhar column Aajkal in Hindustan on 26 august