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भारत विरोध अब आसान नहीं

शशि शेखर

बरसों पहले। यूरोप की एक ‘परगेटरी’ के धुंधलके में विचरते हुए कुछ सवाल मन में कौंधे थे। आत्मपीड़न के जरिए क्या परपीड़न के पापों से मुक्त हुआ जा सकता है? क्यों संसार के तमाम पुराने धर्म प्रायश्चित के बेहद कठोर तरीकों का विधान करते आए हैं? गलतियां क्या सिर्फ इंसानों से होती हैं? समाज और सरकारें भी तो भूलें करती आई हैं। अकेले इंसान के लिए तो परगेटरी है, पर समाज या सरकार के लिए? उनकी पाप-मुक्ति का रास्ता क्या है? 

कुछ आधुनिक हुकूमतों और हुक्मरानों ने सार्वजनिक क्षमा याचना के जरिए यह नेक कोशिश की है। मसलन, कनाडा की सरकार ने 1914 में हुई कामागाटा मारू त्रासदी के लिए 2016 में माफी मांगी। इसी तरह, जापानी सैनिक दस्तों ने कोरियाई और चीनी महिलाओं के साथ जो वहशियाना हरकतें की थीं, उनके लिए 2015 में क्षमा याचना की गई। जलियांवाला बाग के नृशंस हत्याकांड के लिए हिन्दुस्तानियों का एक धड़ा ब्रिटेन सरकार से क्षमा याचना की मांग कर रहा है। हो सकता है, भविष्य में वे इसे सुन लें और जनरल डायर के कुकृत्यों से अंग्रेज एक कौम के नाते हाथ धो सकें। कुछ लोग पूछते हैं कि क्या इस तरह की क्षमा याचना का कोई अर्थ होता है? वह भी तब, जब इतिहास की कंदराओं में गुम हो चुकी घटनाओं के पीड़ितों की पीढ़ियां तक उन्हें भुला चुकी हों? ऐसा कहते समय वे भूल जाते हैं कि यह कोई कूटनीतिक पहल नहीं, प्रायश्चित है। हर प्रायश्चित एक संकल्प की उपज होता है कि हम किसी भी हालात में अपनी पुरानी भूलों को नहीं दोहराएंगे।

हिन्दुस्तानी हुक्मरां भी ऐसा साहस दिखा चुके हैं। जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार ने जिस समय आकार लिया, उस वक्त ज्ञानी जैल सिंह देश के राष्ट्रपति हुआ करते थे। वह इतने व्यथित हो गए थे कि उस सैन्य कार्रवाई के दौरान ही स्वर्ण मंदिर जाने पर अड़ गए थे। इंदिरा सरकार ने किसी तरह उन्हें रोका, फिर भी 13 जून को वह वहां पहुंच गए। ज्ञानीजी यहीं नहीं रुके। जब अकाल तख्त ने उन्हें तनखैया घोषित किया, तो उन्होंने सिख गुरुओं से माफी मांगी। अकाल तख्त ने उनका मान रखा और 24 दिन के भीतर ही उन्हें तनखैया के आरोप से मुक्त कर दिया। ‘तख्त’ ने जैल सिंह जैसी नरमी बूटा सिंह को नहीं बख्शी। उन्हें न केवल तख्त के समक्ष हाजिर होना पड़ा, बल्कि जूते साफ करने की सजा भी भुगतनी पड़ी। प्रधानमंत्री बनने के बाद मनमोहन सिंह ने भी संसद में ऑपरेशन ब्लू स्टार के लिए अपना संताप जाहिर किया था। हमारे देश के सिखों ने इसे स्वीकार भी किया और बीती ताहि बिसारकर आगे की सुधि लेनी शुरू कर दी। आज वे हर क्षेत्र में परचम लहराते हुए देश की आन-बान-शान बढ़ा रहे हैं। 

आप सोच रहे होंगे कि मैं लोगों की याददाश्त की पिछली परतों में सोई पड़ी इन घटनाओं को क्यों जगा रहा हूं? वजह है कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडेव के आगमन से उपजा विवाद। उनके भारत दौरे ने बीते हफ्ते देश में उन तमाम चर्चाओं को सतह पर ला दिया, जिन्हें हम काल के प्रवाह के हवाले कर चुके थे। ट्रुडेव के कनाडा में कुछ ऐसी घटनाएं घट रही हैं, जिन्होंने नई दिल्ली के हुक्मरानों के कान खडे़ कर दिए हैं। वहां के कुछ गुरुद्वारों में भारतीय दूतावास के अधिकारियों और अन्य महत्वपूर्ण लोगों का प्रवेश वर्जित कर दिया गया है। यह उन मुट्ठी भर लोगों की साजिश है, जो खालिस्तान के नाम पर दुकानदारी चलाना चाहते हैं। यह मामला इसलिए संवेदनशील माना जा रहा है, क्योंकि खालिस्तान आंदोलन की अगुवाई करने वाला जगजीत सिंह चौहान कभी वहीं की सरजमीं से भारत में जहर बोता था। वह तो बाद में भारत लौट आया, पर उसके बोए बबूल अब सरसब्ज हो गए हैं। उन्हें काबू में रखना ट्रुडेव की हुकूमत का काम है। विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने उन्हें समझाने की हरचंद कोशिश की, पर उनकी सरकार का रवैया अब तक सर्द बना रहा है। जिस तरह ट्रुडेव के ‘डिनर’ में जसपाल अटवाल को आमंत्रित किया गया, वह भी आशंका पैदा करता है। अटवाल को पंजाब के एक मंत्री पर जानलेवा हमले के लिए 20 बरस की सजा सुनाई गई थी। वह कनाडा में खालिस्तान समर्थकों की जमात का हिस्सा है। भारत के कड़े विरोध के बाद कनाडाई उच्चायोग ने अटवाल का आमंत्रण निरस्त कर दिया। खुद ट्रुडेव ने इस पर खेद व्यक्त किया। 

जस्टिन ट्रुडेव के भारत दौरे के दौरान यह चर्चा उभरी कि उनके प्रति सरकार ने वह गरमजोशी नहीं दिखाई, जिसके लिए उसे जाना जाता है। इजरायल के बेंजामिन नेतन्याहू के लिए नरेंद्र मोदी परंपराएं तोड़कर खुद हवाई पट्टी पर उनका स्वागत करने पहुंच गए थे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नेतन्याहू को स्वयं ताजमहल दिखाया था, पर ट्रुडेव का स्वागत एक राज्य मंत्री ने किया। आगरा में भी उनकी अगवानी महज जिलाधिकारी ने की। हकीकत कुछ भी हो, पर इतना तय है कि भारत का मौजूदा निजाम यह जानता है कि कौन किस व्यवहार का पात्र है। कनाडा के प्रधानमंत्री को इसका एहसास पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान बखूबी हो गया होगा। उन्हें न केवल कनाडा में फल-फूल रहे भारत द्रोही आतंकवादियों की सूची सौंपी गई, बल्कि स्पष्ट शब्दों में बता दिया गया कि हम राष्ट्रहित से कोई समझौता नहीं करेंगे। इस दौरान राजनीति के पर्यवेक्षकों को यह जानकर अच्छा लगा कि कांग्रेस और भाजपा ने सियासी टकराव भुलाकर राष्ट्रहित में एक ‘लाइन’ ली। ट्रुडेव ने भी इसे महसूस किया होगा कि कांग्रेस के अमरिंदर सिंह उसी सुर में बोल रहे थे, जो उन्हें बाद में दिल्ली में सुनाई पडे़। समूची दुनिया को यह जान लेना चाहिए कि हम हिन्दुस्तानी दलगत दलदल में भले ही फंसे दिखाई पड़ें, पर जब देश की बात आती है, तो हमेशा एक आवाज में बोलते हैं।

उम्मीद है, टोरंटो पहुंचकर जस्टिन ट्रुडेव सबसे पहले उन तत्वों का इलाज करेंगे, जो भारत के एक राष्ट्रपति और एक प्रधानमंत्री की उस क्षमा याचना को स्वीकार करने को तैयार नहीं, जो उन्होंने अपने पद पर रहते हुए की थी। ऐसे तत्वों को कोई तो बताए, परगेटरी पश्चाताप की आग में झुलस रहे इंसानों के लिए होती है, तरक्की की तेज रफ्तार में दौड़ रहे उन राष्ट्रों के लिए नहीं, जो सबको साथ लेकर चलते हैं।

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  • Web Title:Shashi Shekhar column Aajkal in Hindustan on 25 February