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आदिवासी अधिकार के नाम पर

शशि शेखर

जिस समय कश्मीर का अलगाववाद पूरे देश में चिंता का विषय बना हुआ है, ठीक उसी समय झारखंड के कुरूंगा गांव में एक दूसरा दृश्य दिख रहा है। वहां एक शिलालेख पर लिखा है-   

‘भारत में गैर आदिवासी दिकु, विदेशी केंद्र सरकार को शासन चलाने और रहने का लीज एग्रीमेंट 1969 ई. में ही समाप्त हो गया है।’
‘वोटर कार्ड (मतदान पहचान पत्र) और आधार कार्ड (आम आदमी का अधिकार कार्ड) आदिवासी विरोधी दस्तावेज हैं।’
‘आदिवासी लोग भारत देश के मालिक हैं, आम आदमी या नागरिक नहीं।’
‘भारत में जनादेश (वोट मतदान) नहीं, बंधारण (संविधान-ग्राम सभा) सर्वोपरि है।’- सुप्रीम कोर्ट।

अंग्रेजों के जमाने से आदिवासी इन शिलालेखों को पत्थलगड़ी कहते आए हैं। यह आदिम समाज की ऐसी परंपरा है, जिसका प्रयोग शादी-विवाह, जन्म-मृत्यु, सामाजिक बहिष्कार अथवा आबादी के सीमांकन के लिए होता रहा है, पर इन दिनों इसकी आड़ में एक नया हंगामा शुरू हो गया है। 

पिछली 3 जून को झारखंड के खूंटी जिले में सैकड़ों आदिवासियों की उपस्थिति में ‘अखिल आदिवासी सरकार’ के मुख्यालय की नींव रखी गई। इस मौके पर मंच से रक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग के गठन का एलान किया गया। आदिवासियों को यह भी बताया गया कि हम बहुत जल्दी ग्रामसभा स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय की शुरुआत करने जा रहे हैं। यही नहीं, वहां बैंक ऑफ ग्रामसभा की भी शुरुआत होगी। 

मतलब साफ है। कुछ लोग नहीं चाहते कि आदिवासियों को सरकार द्वारा पोषित अथवा संचालित संस्थानों से शिक्षा अथवा अन्य सुविधाएं हासिल हों। वजह? नई तालीम अपने साथ आधुनिक विचारों का सैलाब लाती है। ऐसे लोगों को परंपरा के नाम पर उकसाना आसान नहीं होता। यहां राजा राम मोहन राय को याद करना उचित होगा। परदेस की शिक्षा और आबोहवा का ही असर था कि यह शख्स सती-प्रथा के खिलाफ उठ खड़ा हुआ। ऐसे लोगों को परंपराओं के हवाले से आम जन पर हुकूमत करने वाले तोता-चश्म कभी स्वीकार नहीं करते। झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के साथ भी ऐसा ही किया जा रहा है। यही नहीं, रवायत के स्वघोषित ठेकेदार भी नहीं चाहते कि आधुनिक चिकित्सा के कदम वहां पड़ें, क्योंकि इससे बहुत लोगों की ओझाई खतरे में पड़ जाएगी। ग्रामसभा बैंक की स्थापना के जरिए आदिवासियों का धन मौजूदा बैंकिंग प्रणाली तक पहुंचने से रोकने की भी कवायद की जा रही है। फिर रक्षा विभाग! भला वह क्या करेगा? यह तो भारतीय संप्रभुता को सीधी चुनौती है।

इन लोगों का मकसद क्या है?

इसका जवाब जानना है, तो पहले इनके नेता के बारे में जान लें। गुजरात के तापी जिले में एक गांव है कटास्वान। वहां कुंवर केसरी सिंह का मठ है। ये सज्जन अपना पूरा नाम एसी कुंवर सिंह बताते हैं। पत्थलगड़ी के समर्थक इन्हें दादा साहब कहा करते हैं और अब तक की तमाम पत्थलगड़ियां इन्हीं के दिशा-निर्देश पर संचालित होती आई हैं। ये ‘नॉन-जूडिशियल लॉ’ और ‘नेचुरल लॉ’ को ही मानते हैं। इतने मात्र से आप समझ गए होंगे कि इस आंदोलन के कर्ताधर्ता आदिवासियों को किस दिशा में हांकना चाहते हैं? इस आंदोलन को यदि कोई सिर्फ एक ‘स्थानीय हलचल’ मानता है, तो वह गलत है। दादा साहब और उनके हरकारे संविधान की जिस पांचवीं अनुसूची का हवाला देते हैं, उसके तहत आदिवासी बहुल इलाकों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। ये प्रावधान झारखंड समेत दस राज्यों के विस्तृत भू-भाग पर लागू होते हैं। झारखंड के 13 जिले इसमें पूर्णत: और तीन आंशिक रूप से शामिल हैं। क्या अब भी आपको यह बताने की जरूरत रह बची है कि इस बगावती तेवर की शुरुआती चिनगारियां कैसा दावानल जन सकती हैं?

सवाल उठता है कि खूंटी के उदबुरू गांव में 3 जून को ही यह आयोजन क्यों किया गया? आयोजकों का दावा है कि उनके ‘भगवान’ बिरसा की यही असली जन्मतिथि है। वे 15 नवंबर की जन्मतिथि को सरकारी ‘प्रोपेगंडा’ बताते हैं। संयोगवश बताता चलूं कि 1984 की 3 जून को ही ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ की शुरुआत हुई थी। भारतीय भूमि पर सेना को अपने लोगों के खिलाफ इससे पहले इतनी बड़ी कार्रवाई संचालित नहीं करनी पड़ी थी। इस कार्रवाई की वजह यह थी कि धर्म के नाम पर संत जरनैल सिंह भिंडरावाले की अगुवाई में कुछ लोगों ने हरमंदिर साहिब पर कब्जा जमा लिया था। 

पंजाब पर आतंकवाद के खूनी पंजे की जकड़न का यह चरमोत्कर्ष था, पर इसकी हत्यारी हथेली को राष्ट्र के लिए सांघातिक बनाने में बरसों की साजिशों का खाद-पानी लगा था। धर्म के कंधों पर सवार आतंकवाद कितना मारक और असरदार हो सकता है, दुनिया को इसका अंदाज 24 अप्रैल, 1980 को निरंकारी गुरु बाबा गुरुवचन सिंह की हत्या से लगा था। तभी तय हो गया था कि अब भिंडरावाले खुद को सत्ता और संविधान से इतर साबित करने पर आमादा है। अगर उसको इस मुकाम तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया गया होता, तो ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ की नौबत नहीं आती, पर इतिहास में किंतु-परंतु अथवा काश की कोई गुंजाइश नहीं होती। इतिहास के पन्नों पर दर्ज इबारतें बस इतना बयां करती हैं कि अमुक नायक अपनी किन गलतियों से कैसे खलनायक या नौटंकी के जमूरे में तब्दील हो गया। 

बताने की जरूरत नहीं कि देश का आदिवासी इलाका पहले से रक्त स्नान को अभिशप्त है। माओवादियों ने लंबे समय तक यहां हुकूमत की है, जिसके चलते आदिवासियों तक 21वीं शताब्दी की विकास की रोशनी कभी नहीं पहुंची। खुफिया एजेंसियों को शक है कि आदिवासियों को एक बार फिर परंपरा के नाम पर दिग्भ्रमित किया जा रहा है। इसके पीछे विदेशी एजेंसियों और माओवादियों की सांठ-गांठ भरी साजिशें हो सकती हैं। यही लोग 1980 में भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी बी डी शर्मा और आईपीएस बंदी उरांव द्वारा पुनर्जीवित की गई पत्थलगड़ी परंपरा को हथियाने की कोशिश कर रहे हैं। शर्मा और उरांव की पत्थलगड़ी में बाहरी लोगों के आने की मुमानियत नहीं थी। हक-हुकूक को हासिल करने के एक आंदोलन को बगावती मोड़ देने की कोशिशों के नतीजे जम्हूरियत के लिए भले नहीं होते। समूची अनिच्छा से मुझे एक बार फिर खालिस्तान आंदोलन का उदाहरण देना पड़ रहा है। शुरुआत में इसे भी संस्कृति और समाज के लिए रचा गया था, पर भिंडरावाले जैसे लोगों ने उसे सियासत का खिलौना बना दिया। 

जिस तेजी से इस तथाकथित आंदोलन को हवा दी जा रही है, उससे आशंका पैदा हो रही है कि इसे जंगल की आग की तरह विस्तार देने का ताना-बाना बुना जा चुका है। संबंधित राज्य सरकारों को समझ लेना चाहिए, यह वक्त लोक-लुभावन भाषणबाजी का नहीं, बल्कि समस्या के सामाजिक और सियासी समाधानों की तलाश का है। भरोसा न हो, तो वे पंजाब त्रासदी के पन्ने पलट देखें, उनका दृष्टिदोष दूर हो जाएगा।
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