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इस भस्मासुर से खुद ही बचें

शशि शेखर

देश के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक मिश्र के खिलाफ संसद में महाभियोग लाने की सियासी दलों की कोशिश के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह से कुतर्क किया जा रहा है, वह डराता है। ऐसा लगता है, जैसे हमारे देश का सामाजिक विमर्श रास्ता भटक गया है। 

एक जागृत लोकतंत्र में सवाल उठने लाजिमी हैं। कभी-कभी कुछ आरोप भी लग सकते हैं। कुछ गलतफहमियां भी पैदा हो सकती हैं, पर बदनीयती न हो, तो उन पर आसानी से पार पाया जा सकता है। यह पहला मौका है, जब प्रधान न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिश की जा रही है। बेहतर होता कि हम इसके लिए संसदीय बहस का इंतजार करते। अगर हर राह चलता सर्वोच्च संस्थाओं पर टिप्पणी करने लगेगा, तो फिर उनका वकार क्या रह जाएगा? बिना वकार के न कोई संस्था चल सकती है, न सरकार और न ही राष्ट्रीय संप्रभुता। 

ऐसा लगता है, जैसे हम सिर्फ हंगामा खड़ा करने के आदी होते जा रहे हैं और संसार के सबसे बडे़ लोकतंत्र के पास भय, भूख और गरीबी से निपटने का कोई सार्थक संवाद नहीं है। अगर कोई यह पता लगाने की कोशिश करे कि पिछले दस दिनों में इस विशाल देश ने क्या किया, तो उसका एक ही जवाब होगा कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाला देश सिर्फ कीचड़ की होली खेलने में व्यस्त-मशगूल रहा। 

कठुआ के पैशाचिक बलात्कार से बात शुरू करता हूं। यह ध्रुव सत्य है कि एक मासूम बच्ची के साथ कई दिन तक दुष्कर्म होता रहा। कोई भी भलामानस इस तथ्य से इनकार नहीं करेगा कि इस धत्कर्म में शामिल नर-पिशाचों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए, पर पुलिस ने जब कुछ लोगों को गिरफ्तार किया, तो लोग आरोपितों के पक्ष में सड़कों पर उतर आए। क्यों? क्या जनशक्ति इंसाफ का रुख तय कर सकती है? 1789 की राज्य क्रांति के बाद फ्रांस में अगले कुछ वर्ष तक ऐसा ही होता रहा। न्यायतंत्र पर भीड़तंत्र हावी हो गया। इसका खामियाजा वहां के लोगों ने ही भुगता। 

बेहतर है कि हम अदालतों पर भरोसा करें और न्यायाधीशों को अपना काम करने दें।

जनता के उबाल मात्र से अगर सामाजिक बुराइयों पर लगाम लग सकती, तो अखबारों में छपी दुष्कर्म की खबरें हमारे सवेरे के सुहानेपन पर कालिख न पोता करतीं। ये पंक्तियां लिखते वक्त जो अखबार मेरे सामने पसरा है, उसकी हेडलाइन खून से सराबोर है। एटा में एक दिन पहले ही विवाह समारोह में सात वर्षीय बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई। अगर पीड़ित अथवा पीड़क, दोनों का संप्रदाय एक न होता, तो इस त्रासदी को भी हम शायद कठुआ जैसी कुतार्किक जंग में तब्दील कर देते। ऐसा करते समय हम यह क्यों भूल जाते हैं कि इस देश में हर रोज 100 से ज्यादा बलात्कार होते हैं। हर घंटे में करीब पांच बच्चे शारीरिक शोषण का शिकार होते हैं। इन विकृतियों का हल खोजने की बजाय हम कैसी बहस में उलझ गए? इसी का परिणाम है कि संयुक्त राष्ट्र संघ तक ने हमारी लानत-मलामत कर डाली। 

सिर्फ बलात्कार ही क्यों, हम हिन्दुस्तानी जैसे हर संवेदनशील मुद्दे पर अपनी तर्क-बुद्धि खोते जा रहे हैं। देश के 11 राज्यों में अचानक उमड़ पडे़ नगदी संकट को भी तार्किक व्याख्या की बजाय थोथी बहस के हवाले कर दिया गया। इससे सरकार की उलझनें और लोगों की मुश्किलें दुरूह से दुरूहतर हो गईं। याद करें, कुछ महीने पहले से अफवाह उड़नी शुरू हुई थी कि राष्ट्रीयकृत बैंक दिवालिया हो रहे हैं। उनमें जमा आपका पैसा सुरक्षित नहीं है। इसी के साथ यह सूचना भी तिरने लगी कि दो हजार रुपये का नोट बंद किया जा रहा है। सरकार ने समय रहते इसका खंडन किया, मगर सोशल मीडिया पर निरर्थक आशंकाएं हवा में उछाली जाती रहीं। नतीजा, बैंकों में नगदी जमा करने की प्रक्रिया सुस्त पड़ गई। इसके साथ ही बड़ी संख्या में लोग रुपये की निकासी और संचय में जुट पडे़। ऐसे में, रिजर्व बैंक की अगुवाई में नगदी के वितरण में जो तत्परता दिखाई जानी थी, वह शायद नहीं दिखाई गई। उधर, बैंकों के दिवालियेपन की बेबुनियाद खबरें उड़ाकर इस संकट को आपदा में तब्दील करने की कोशिश की गई। लिहाजा सरकारी तंत्र की अधिकांश ऊर्जा अब इस आपदा को नियंत्रित करने में लगी है। 

सवाल उठता है कि ऐसी अफवाहें कौन उड़ा रहा है? क्या यह कुछ सनकी लोगों की कारस्तानी है अथवा अदृश्य शक्तियां इससे वाबस्ता हैं?

‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ की एक खोजबीन आपसे साझा करने की इजाजत चाहूंगा। इस स्थापित संवाद समिति के ललित के झा ने न्यूजर्सी निवासी दिलीप मस्के से बातचीत के दौरान पाया कि अमेरिका, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, मध्य-पूर्व आदि देशों में सौ से अधिक दलित कार्यकर्ताओं ने ‘आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस’ और ‘जियोग्राफिक इनफॉरमेशन सिस्टम’ का सहारा लेकर दो अप्रैल को भारत बंद का सफल आयोजन किया था। मस्के का दावा है कि इस दलित दस्ते ने पिछले तीन वर्षों के दौरान तीन से पांच लाख अमेरिकी डॉलर खर्च कर सोशल मीडिया पर उपलब्ध जरूरी जानकारियां जुटाईं, जिनमें से कुछ डाटा लंदन की एक कंपनी से भी खरीदा गया। वह कंपनी क्या कैंब्रिज एनालिटिका थी? यह पूछे जाने पर मस्के का जवाब था- ‘सर्टेनली नॉट।’ 

मस्के के अनुसार, उनका मकसद देश की सौ चुनिंदा लोकसभा सीटों को टारगेट करना है। इसके साथ ही राजनीतिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण छह राज्यों- उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, गुजरात और महाराष्ट्र पर उनकी नजर है। यह दलित ग्रुप चाहता है कि 2019 के चुनावों में एआई और जीआईएस की सहायता से इन अति महत्वपूर्ण सीटों पर चुनाव परिणामों को प्रभावित करके अपने पक्ष में कर लिया जाए। पिछले तीन सालों की मेहनत के दौरान वे कितने सफल रहे हैं, इसके परीक्षण के लिए उन्होंने गुजरी दो अप्रैल को भारत बंद का आयोजन किया, जो सफल रहा। मेरे पास मस्के की बातों को सही, गलत या अतिरंजित कहने का कोई प्रमाण नहीं है, परंतु इशारा साफ है कि सोशल मीडिया ऐसा भस्मासुर बन चुका है, जिस पर प्रकाशित अनजान लोगों के विचारों अथवा सूचनाओं से प्रभावित होने से पहले हमें अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना होगा। अगर कुछ लोग इसके जरिए आम चुनाव को प्रभावित करना चाहते हैं, तो यह भी संभव है कि भारत के दुश्मन मुल्क हमारी सामाजिक और सामरिक सुरक्षा पर भी हमला करने का प्रयास करें। 

अब आप ही बताइए। इस विकट वक्त में क्या यह भी बताने की जरूरत है कि कृपया अपनी आंख और कान खुले रखें? सोशल मीडिया पर अंधा भरोसा खतरनाक साबित हो सकता है।

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  • Web Title:Shashi Shekhar column Aajkal in Hindustan on 22 april