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नए सियासी मॉडल की दरकार

शशि शेखर

अप्रैल-मई 2019 का यह आम चुनाव अपने गर्भ में कैसी अथवा किसकी सरकार छिपाए हुए है? मुझे इस सवाल की बनिस्बत वह यक्ष प्रश्न महत्वपूर्ण लगता है, जो गुजरते चुनाव ने इस देश की रूह पर टांक दिया है। क्या भारतीय राजनीति से शील, संकोच, स्वाभिमान, समर्पण, सहमति, सौहार्द और साहचर्य की संभावनाएं हमेशा के लिए खत्म हो गई हैं? मिथकीय कथाओं और चरित्रों में मुंह छिपाकर संतोष खोजने वाले भले ही महाभारत को स्थाई नियति मानकर संतोष की सांस ले लें, पर यह सच है कि जिंदा कौमों को अतीत की नहीं, भविष्य की सोचनी होती है।

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि हमने उल्टी राह पकड़ रखी है। हर दल के नेता चुनाव-दर-चुनाव गडे़ मुर्दे खोद निकालने में मसरूफ हैं। यह सिलसिला डराता है। नौजवानों के इस देश को भविष्य का साफ खाका चाहिए। इसके लिए राजनीतिक दलों में आम सहमति होना जरूरी है, पर हो क्या रहा है? किसान, मजदूर, महिलाएं, मजलूम राजनीतिक महारथियों के लिए महज सियासी मोहरे बनकर रह गए हैं। रक्षा-प्रतिरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर भी जैसा कोलाहल सुनाई पड़ता है, वह हमारी गंभीरता नहीं, बल्कि थोथी वाचालता की मुनादी करता प्रतीत होता है। 

पहले की सरकारों और नेताओं ने जो भी अच्छा-बुरा किया हो, मगर एक बात तय है कि ऐसे मुद्दों पर एक अलिखित सहमति हुआ करती थी। आपको 52 साल पीछे ले चलने की इजाजत चाहूंगा। बात 1967 की है। 1962 में चीन से मिली पराजय से शर्मसार और 1965 की भारत-पाक लड़ाई से आर्थिक रूप से क्षत-विक्षत भारत की सेना को एक अघोषित जंग लड़ने के लिए बाध्य होना पड़ा था। चीन सीमा स्थित नाथू ला पर लाल सेना ने कुछ हिमाकत की थी। जवाब में भारतीय फौज के दस्तों ने निर्णायक कार्रवाई की। 300 से ज्यादा चीनी भून दिए गए। हमारे भी 65 रणबांकुरे शहीद हुए। 14,200 फीट की ऊंचाई पर लड़ी गई यह लड़ाई दोनों देशों के बीच आखिरी बड़ी झड़प थी। चीन समझ गया कि हमारी फौज का साहस अदम्य और तेवर यथावत हैं। कुछ गुर्राहटों से आगे की कोई हरकत प्राणलेवा साबित होगी। उन्होंने खुद को वहीं तक सीमित कर लिया।
भारतीय राजनीति में वे शील भरे दिन थे। इस खबर को फैलाने की बजाय दबा दिया गया। बरसों तक देश के अधिसंख्य जन इससे नावाकिफ रहे। नतीजतन, दोनों देशों के बीच कड़वाहट नहीं बढ़ी और कूटनीतिक मंचों पर भी भारत को अपनी बात रखने में आसानी हुई। अधिकतर सैनिक कार्रवाइयां इसी एहतियात की तलबगार होती हैं, पर बदलती दुनिया ने आत्मघाती केंचुल धारण कर ली है। 

ऐसा नहीं है कि सिर्फ भारत में प्रतिरक्षा संबंधी मामले सड़कों और गलियों में चर्चा का विषय बनते हैं। द्वितीय विश्व-युद्ध से 1983 तक ब्रिटेन में भी ऐसे मामलों में ‘ओमाता’ (एक इटालियन शब्द, जिसका अर्थ होता है गोपनीयता का सिद्धांत) का पालन किया जाता था। अमेरिकी बड़बोलापन अब वहां भी हावी हो गया है। इसका नतीजा 10, डाउनिंग स्ट्रीट अथवा ह्वाइट हाउस में बैठे हुक्मरानों को फौरी तौर पर भले ही लुभाता हो, पर शेष दुनिया में असंतोष को उग्र करता जाता है। यही वजह है कि ओसामा बिन लादेन के खात्मे को ‘लाइव’ देखने वाले ओबामा अल-कायदा को खत्म नहीं कर पाए। तमाम हमलों के बावजूद ‘दाएश’ आज भी कत्ल-ओ-गारत मचाने की हैसियत रखता है। कोलंबो में गत दिनों हुआ हमला इसका उदाहरण है। 

विकसित देशों की सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के शब्द जब आग उगल रहे हों, तब कुछ हुक्मरां आश्चर्यजनक तौर पर अमन-अमान की रखवाली करते नजर आते हैं। न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा सेहतमंद लोकतंत्र का ऐसा ही स्तंभ हैं। पिछली 15 मार्च को जब एक सिरफिरे ने क्राइस्टचर्च की मस्जिद में 51 नमाजियों को हलाक कर डाला, तो वह आश्चर्यजनक तौर पर संयम से काम लेती दिखाई दीं। उन्होंने अपने पहले भाषण में ही कहा कि हम हमलावर की पहचान घोषित नहीं करेंगे। यही नहीं, विपक्ष को विश्वास में लेकर उन्होंने तमाम ऐसे कदम उठाए, जिनसे इस प्रकार के जघन्य कांडों की पुनरावृत्ति रोकी जा सके। वह यहीं नहीं रुकीं। काले रंग का दुपट्टा ओढ़कर जेसिंडा शोकसभा में भी गईं। पूरी दुनिया के मीडिया ने उनका यह फोटो प्रमुखता से छापा। विश्व जनमत ने उनकी इस नेक पहल को सराहा, पर विभाजन की राजनीति के अभ्यस्त हुक्मरां क्या इसे स्वीकार करेंगे? 

अब भारत में लौटता हूं। उरी की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से सेना, सैनिक और सैन्य कार्रवाइयां लगातार विवादों के केंद्र में रही हैं। चुनावों को जंग मानने वाले हमारे जंगजू नेता क्यों भूल जाते हैं कि सैन्य पराक्रम का अधिकांश हिस्सा सिर्फ गोपनीय दस्तावेजों अथवा जवानों के प्रशिक्षण तक सीमित होना चाहिए। वे यह भी बिसरा देते हैं कि साउथ ब्लॉक में हुकूमत कोई भी चला रहा हो, पर वह अंतत: होता मुल्क का नुमाइंदा ही है। यह ध्रुव सत्य है कि अब तक के हर प्रधानमंत्री ने देश की रक्षा के लिए कोई न कोई सार्थक कदम जरूर उठाया है। बेहतर हो कि हम सरहदों के पार बैठे लोगों की चर्चा करने की बजाय, उन लोगों पर बात करें, जिनसे देश बनता है। 

ऐसा नहीं है कि सिर्फ प्रतिरक्षा मामलों में हुक्मरानों को सर्वानुमति की जरूरत होती है। कई बार प्राकृतिक आपदाओं अथवा मूलभूत समस्याओं से निपटने के लिए भी सभी दलों ने सहमति दिखाई है। ओडिशा पर पिछले दिनों कहर बरपा गए ‘फेनी’ से बचाव का कार्य सर्वसहमति की ऐसी ही मिसाल बना। यह चुनाव एक ऐसा अवसर था, जब सभी दलों को कम से कम रोटी-रोजगार जैसे मुद्दों पर ऐसे एका को बढ़ाना चाहिए था, पर ऐसा न हो सका।

भारत के लोग जब पिछले छह चरणों के दौरान अपने मताधिकार का प्रयोग करने घर से निकले, तो भले ही उनके मन में कितने भी अच्छे भाव रहे हों, पर क्या एक भी ऐसे नेता का प्रतिबिंब उनकी आंखों के सामने था, जिसने सियासत के सर्वोच्च मानदंडों का पालन किया हो?

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  • Web Title:Shashi Shekhar column Aajkal in Hindustan on 19 may