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राजीव तब तक खरा सोना बन चुके थे

शशि शेखर

1983 की उस खुशनुमा सुबह हम राजीव गांधी के सामने बैठे थे। स्थान था उनके संसदीय क्षेत्र अमेठी में स्थित गौरीगंज का डाक बंगला। सुबह सात बजे के आस-पास का वक्त और डाइनिंग टेबल पर बैठे राजीव ने टोस्ट पर मक्खन लगाते हुए नफासत से पूछा कि आप क्या पसंद करेंगे? अनौपचारिकता के रस में  सराबोर वह एक औपचारिक ‘इंटरव्यू’ था। मेरे प्रश्न जितने सीधे थे, उनके जवाब उतने ही सरल और स्पष्ट। 

बाद में गौरीगंज से इलाहाबाद का रास्ता तय करते वक्त मैं और मेरे छायाकार साथी देर तक उनके बारे में बात करते रहे। हम एकमत थे कि देश में एक भला और नौजवान नेता उभर रहा है। यदि उन्हें परिपक्व होने का समय मिला, तो एक अच्छे प्रधानमंत्री साबित होंगे। उन दिनों नेहरू-गांधी परिवार का सितारा हिन्दुस्तानी राजनीति के फलक पर बीचोबीच चमक रहा था। पौने दो साल के अंतराल को छोड़ दें, तो इंदिरा गांधी डेढ़ दशक से प्रधानमंत्री थीं। देश की राजनीति उनके इर्द-गिर्द घूमती और ऐसे में उनके राजनीतिक वारिस के लिए इसके अलावा कुछ और सोचना नामुमकिन था। 

हम लोगों के मन में राजीव गांधी को जानने-समझने की उत्कंठा इसलिए भी ज्यादा थी, क्योंकि वह राजनीति के लिए अपनी मां की पहली पसंद नहीं थे। संजय गांधी ने सियासत की शुरुआत 1970 के दशक से ही कर दी थी। कांग्रेस की रीति-नीति में उनका खासा दखल था, पर एक हवाई दुर्घटना उनको असमय लील गई थी। राजीव उन दिनों इंडियन एयरलाइन्स में पायलट थे। आम मध्यवर्गीय भारतीयों जैसी सहज-सरल जिंदगी उन्हें और उनके छोटे से परिवार को रास आती थी। हालात ऐसे बने कि उन्हें राजनीति के गंदे तालाब में कूदना पड़ा। इसके साथ ही संजय और राजीव की मूल प्रकृति में बड़ा फर्क था। हमारे कौतूहल की असली वजह भी यही थी। 

क्या पता था कि कुछ महीने बाद इंदिरा गांधी भी हादसे की शिकार हो जाएंगी और राजीव अचानक प्रधानमंत्री बन जाएंगे? क्या आपको नहीं लगता कि राजीव गांधी के जीवन में संयोगों से ज्यादा दुर्योगों की भूमिका थी? एक दुर्घटना ने उन्हें राजनीति में ला दिया, दूसरी ने प्रधानमंत्री की कुरसी तक पहुंचाया और तब किसी को अंदाज न था कि काल का क्रूर चक्र उन्हें इसी दृष्टि से देख रहा है। मुझे अच्छी तरह याद है कि 21 मई, 1991 की उस रात जब श्रीपेरंबदूर से उनकी क्रूर हत्या की खबर आई, तो आगरा स्थित हमारे अखबार के किसी भी कर्मचारी को उसकी सत्यता पर भरोसा नहीं हो रहा था। 

कुछ ही दिन पहले तो वह ताजनगरी आए थे और वहां खबरनवीसों को उनका नया रूप दिखाई पड़ा था। हुआ यह था कि रामलीला मैदान की चुनावी जनसभा के बाद वह जनता से मिलने के लिए मंच से नीचे उतर आए थे। खुफिया ‘अलर्ट’ था कि उनकी जान को खतरा है। उत्तर प्रदेश पुलिस के लोग उनकी सुरक्षा के लिए दिल्ली से प्रदीप गुप्ता की अगुवाई में आए अंगरक्षकों के साथ जद्दोजहद कर रहे थे। उसी दौरान राजीव ने देखा कि एक बुजुर्ग महिला उन तक पहुंचने की कोशिश कर रही है, पर पुलिस का दारोगा उसे रोक रहा है। उन्हें गुस्सा आ गया था और वह उत्तर प्रदेश पुलिस के उस उप-निरीक्षक से अपेक्षा के विपरीत कड़ा बर्ताव कर गए थे। आज के नेताओं की छोड़िए, उन दिनों भी राजनीतिज्ञों द्वारा ऐसी हरकतें आम थीं, पर वह राजीव गांधी थे। उस रात उन्होंने अपना पश्चाताप साथियों से बार-बार साझा किया। सहयोगियों ने कहा- जो हो गया, सो हो गया। जाने दीजिए। पर नहीं, उन्होंने उस दारोगा को अगली सुबह सर्किट हाउस बुलाया और निजी तौर पर क्षमा याचना की। इस बड़प्पन से वह दारोगा अभिभूत हो गया था। बाद में, आंखों से छलकते आंसुओं और रुंधे गले के साथ उसने पत्रकारों से कहा था कि काश! हर नेता इन जैसा हो जाए। 

वह यकीनन औरों से अलग थे, इसीलिए सतर्कता बरतने की खुफिया सूचनाओं के बावजूद ‘अपने लोगों’ से मिलने के लिए उतावले रहते और इसी वजह से उन्होंने जान गंवाई। जो भूल गए, उन्हें याद दिला दूं। उस समय देश में आम चुनाव हो रहे थे। केंद्र और विभिन्न राज्यों की एजेंसियों के पास ‘इनपुट’ था कि उन पर लिट्टे अथवा खालिस्तान समर्थक आतंकवादी हमला कर सकते हैं। हर जनसभा से पहले उन्हें चेताया जाता कि आप खुद को अधिक ‘एक्सपोज’ न करें। तमिलनाडु में खतरा कुछ अधिक था। वह इस तथ्य को जानते थे, फिर भी उन्होंने वहां का दौरा टालने की कोशिश नहीं की। उस समय ‘स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप’ (एसपीजी) सिर्फ प्रधानमंत्री की सुरक्षा मुहैया कराती थी। उनकी हत्या के बाद सरकार ने इसका दायरा बढ़ाया। अब यह प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्रियों, उनके परिजनों और गांधी परिवार की हिफाजत करती है। यह एक बेहतरीन सुरक्षा इकाई है और इसके अस्तित्व में आने के बाद किसी प्रधानमंत्री पर कोई बड़ा हमला नहीं हुआ है। 

राजीव गांधी पर मंडरा रहे खतरे के मद्देनजर उनकी सुरक्षा के समुचित इंतजाम क्यों नहीं किए गए? इस सवाल का आज तक सटीक उत्तर नहीं मिल सका है।

यह तो राजीव गांधी के व्यक्तित्व का निजी पहलू था, पर बतौर प्रधानमंत्री उन्होंने कई ऐसे काम किए, जो उनके बेहतरीन हुक्मरां होने की मुनादी करते रहेंगे। पंजाब में अमन, उत्तर-पूर्व में शांति और देश की दूरसंचार तथा कंप्यूटर क्रांति उन्हीं की देन है। सियासत उनकी मूल प्रकृति का हिस्सा नहीं थी, इसीलिए उन्हें समझने में देर लगी कि राजनीति वंचनाओं का दुर्ग होती है। यही वजह है कि उनके सलाहकारों ने उन्हें प्रेस पर पाबंदी अथवा श्रीलंका में जरूरत से ज्यादा आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्हें दूसरों से ज्यादा अपनों से दुख मिला। अगर उनमें सियासी शातिरपना होता, तो शायद बोफोर्स की दलदल में भी न फंसते, मगर ऐसा कौन सा राजनेता है, जिस पर दाग नहीं लगे? 

हुकूमत उस काजल की कोठरी का दूसरा रूप है, जिसमें कदम रखने पर दामन बेदाग रह ही नहीं सकता। संसार के समस्त सत्तानायकों को इसका दंश भोगना पड़ा है। राजीव गांधी भी इसका अपवाद न थे। इस वक्त अगर वह जिंदा होते, तो कल अपने जीवन के 75वें वर्ष में प्रवेश कर रहे होते। उन्हें उस दौर में असमय जाना पड़ा, जब वह संघर्षों की आग में तपकर खरा सोना बन चुके थे और देश को उनकी जरूरत थी।

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